रविवार, सितंबर 13, 2009

हिंदी-दिवस..! एक दर्पण...

साल के प्रत्येक 14 सितम्बर को "हिंदी-दिवस" मनाया जाता है... क्यों मनाया जाता है, कहना मुश्किल है... लेकिन मनाया जाता है... शायद इसीलिए मनाया जाता है क्योंकि 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने एक मत से यह निर्णय लिया कि हिन्दी ही भारत की राजभाषा होगी... इसी महत्वपूर्ण निर्णय के महत्व को प्रतिपादित करने तथा हिन्दी को हर क्षेत्र में प्रसारित करने के लिये सन् 1953 से संपूर्ण भारत में 14 सितंबर को प्रतिवर्ष "हिन्दी-दिवस" के रूप में मनाया जाता है... स्वतंत्र भारत की राजभाषा के प्रश्न पर काफी विचार-विमर्श के बाद यह निर्णय लिया गया जो भारतीय संविधान की धारा 343(1) में लिखा है: संघ की राज भाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी होगी... संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रूप अंतर्राष्ट्रीय रूप होगा... और हर सरकारी संस्था अपने लेखन कार्यों में इसका उपयोग करेगी... बस यहीं आकर बात ख़त्म हो जाती है... संविधान में हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दे दिए जाने के कारण ही हम "हिंदी-दिवस" मनाते आ रहे हैं... और 14 सितम्बर के दिन सरकारी कार्यालयों का आलम तो देखने लायक होता है... हर सरकरी दफ्तर में हिदी से संदर्भित ढेर सारे आयोजन किये जाते हैं... भाषण, निबंध लेखन, परिचर्चा इत्यादि... चलिए कुछ भी हो... एक दिन ही सही लेकिन "बेचारी हिंदी" की लज्जा तो रख ली जाती है... मैं यह नहीं कहना चाहता की "हिंदी-दिवस" महज़ सरकारी दफ्तरों का एक तामझाम है... मैं तो सरकारी कर्मचारियों का ह्रदय से आभारी हूँ... कि वो कम से कम हमारी मातृभाषा की इतनी इज्ज़त तो कर रहे हैं... ये सभी पूरे एक दिन हिंदी की पूजा करते हैं... पूरे एक दिन हिंदी पर ही इनका ध्यान होता है... लेकिन ज़रा सोचिए कि हमारे देश की यह कैसी विडंबना है कि हिंदी यानि राष्ट्रभाषा की महत्ता महज़ सरकारी दफ्तरों तक ही सीमित है... क्यों बजरंग दल, शिवसेना और ऐसे ही तमाम "कथित समाज सुधारक दल" इसका प्रचार प्रसार नहीं करते... ये दल और सेना जिस तरह से मंत्रियों का पुतला जलाते हैं... जिस तरह से Velentines Day का विरोध करते हैं उस तरह से हिंदी भाषा की महत्ता का गुणगान क्यों नहीं करते..? आज नौकरी के हर क्षेत्र में हिंदी को प्रधानता क्यों नहीं दी जाती..? क्यों हिंदी भाषियों की उपेक्षा की जाती है..? अन्य जगहों पर भी "हिंदी-दिवस" क्यों नहीं मनाया जाता..? क्यों हम एक दूसरे से मिलने पर केवल अंग्रेजी के शब्दों को संबोधन के रूप में इस्तेमाल करते हैं..? बस यही तो समस्या है... इन प्रश्नों के उत्तर अगर मिल जाएँ तो आप समझ जाएँगे कि केवल 14 सितम्बर ही हिंदी के गुणगान का दिन नहीं है... फिर तो हर एक दिन "हिंदी-दिवस" मनाया जाने लगेगा... महज़ एक दिन नहीं!

उफ़! ये विवशता...

संविधान के जाल में हिरनी सी लाचार...
किसी अँधेरी नीति की हिंदी हुई शिकार...

शनिवार, सितंबर 12, 2009

ये कोई तुम सा है के तुम हो..?

जिस सिम्त भी देखूँ नज़र आता है के तुम हो
ऐ जान-ए-जहाँ ये कोई तुम सा है के तुम हो

ये ख़्वाब है ख़ुश्बू है के झोंका है के पल है
ये धुंध है बादल है के साया है के तुम हो

देखो ये किसी और की आँखें हैं के मेरी
देखूँ ये किसी और का चेहरा है के तुम हो

इक दर्द का फैला हुआ सहरा है के मैं हूँ
इक मौज में आया हुआ दरिया है के तुम हो

वो वक़्त न आये के दिल-ए-ज़ार भी सोचे
इस शहर में तन्हा कोई हम सा है के तुम हो

बुधवार, सितंबर 09, 2009

न मंदिर में सनम होते...

न मंदिर में सनम होते, न मस्जिद में खुदा होता
हमीं से यह तमाशा है, न हम होते तो क्या होता

न ऐसी मंजिलें होतीं, न ऐसा रास्ता होता
संभल कर हम ज़रा चलते तो आलम ज़ेरे-पा होता
ज़ेरे-पा: under feet

घटा छाती, बहार आती, तुम्हारा तज़किरा होता
फिर उसके बाद गुल खिलते कि ज़ख़्मे-दिल हरा होता

बुलाकर तुमने महफ़िल में हमको गैरों से उठवाया
हमीं खुद उठ गए होते, इशारा कर दिया होता

तेरे अहबाब तुझसे मिल के भी मायूस लॉट गये
तुझे 'नौशाद' कैसी चुप लगी थी, कुछ कहा होता


रचनाकार: नौशाद लखनवी

शनिवार, सितंबर 05, 2009

वो जिधर जाए जन्नत उधर देखिये!!

उनकी नजरे-करम का असर देखिये!
प्यार देता हुआ, हर वशर देखिये!!
..............देखती तक न थी जिसको कोई नजर!
........................बेकरार देखने हर नज़र देखिये!!
उनकी नजरे-करम छु गई है जिसे!
उसको बदला हुआ हर कदर देखिये!!
..............उसने सोना बनाया है लोहे को छु!
..............वह दमकता देखेगा जिधेर देखिये!!
उनकी नजरे-करम पर जिसे फक्र है!
उसको भटका, इधर न उधर देखिये!!
...............प्यार देता देखेगा सभी को अरे!
..............प्यार से छल-छलाता जिगर देखिये!!
देखिएगा उसे अपना सुख बाटते!
दुःख बाटने को नजरो को तर देखिये!!
..............बस यही है फरिश्तो की पहचान भी!
..............वो जिधर जाए जन्नत उधर देखिये!!


आप सभी को शिक्षक दिवस की तहेदिल से शुभकामनाएं!!!

शुक्रवार, सितंबर 04, 2009

मुबारक ज़िंदगी के वास्ते...

झलक यूँ यास में उम्मीद की मालूम होती है।
कि जैसे दूर से इक रोशनी मालूम होती है॥
मुबारक ज़िंदगी के वास्ते दुनिया को मर मिटना।
हमें तो मौत में भी ज़िंदगी मालूम होती है॥

रज़्म रदौलवी

रविवार, अगस्त 30, 2009

शिद्दत से आज दिल ने...

घर जिसने किसी ग़ैर का आबाद किया है
शिद्दत से आज दिल ने उसे याद किया है

जग सोच रहा था कि है वो मेरा तलबगार
मैं जानता था उसने ही बरबाद किया है

तू ये ना सोच शीशा सदा सच है बोलता
जो ख़ुश करे वो आईना ईजाद किया है

सीने में ज़ख्म है मगर टपका नहीं लहू
कैसे मगर ये तुमने ऐ सैय्याद किया है

तुम चाहने वालों की सियासत में रहे गुम
सच बोलने वालों को नहीं शाद किया है


शनिवार, अगस्त 29, 2009

ज़िन्दगी तूने बहुत रोज़ बचाया मुझको...

जब कभी धूप की शिद्दत ने सताया मुझको
याद आया बहुत एक पेड़ का साया मुझको

अब भी रौशन है तेरी याद से घर के कमरे
रोशनी देता है अब तक तेरा साया मुझको

मेरी ख़्वाहिश थी कि मैं रौशनी बाँटूँ सबको
ज़िन्दगी तूने बहुत जल्द बुझाया मुझको

चाहने वालों ने कोशिश तो बहुत की लेकिन
खो गया मैं तो कोई ढूँढ न पाया मुझको

सख़्त हैरत में पड़ी मौत ये जुमला सुनकर
आ, अदा करना है साँसोंका किराया मुझको

शुक्रिया तेरा अदा करता हूँ जाते-जाते
ज़िन्दगी तूने बहुत रोज़ बचाया मुझको


रचनाकार: मुनव्वर राना

सोमवार, अगस्त 24, 2009

मुझे माफ़ करना...

मैं जानता हूँ मेरी वजह से तुम दुखी हो. तुम ये बात स्वीकार नहीं करोगी लेकिन ये सच है कि कहीं न कहीं मैंने तुम्हें परेशानी में डाल दिया है. ग़लती मेरी है, मुझे तुम्हें मजबूर नहीं करना चाहिए था. मेरी भावनाओं को समझने के लिए तुमने खुद की भावनाओं की कुर्बानी देदी. मुझे ख़ुशी देने के लिए तुमने खुद की खुशियाँ कुर्बान कर दीं. मुझे पता है कि मुझे माफ़ भी नहीं किया जा सकता. मैंने तो झट तुमने माफ़ी मांग ली लेकिन शायद मैं ये भूल गया कि "माफ़ी मांगने से ज्यादा कष्टदायक होता है माफ़ करना!" मैं ये भी जानता हूँ कि तुम दुखी होने के बावजूद भी मेरे बारे में, मेरी ख़ुशी के बारे में ही सोच रही हो. तुम्हारी यही बातें तो मुझे रह-रहकर रुलाती रहती हैं. तुम ऐसी क्यों हो? ऐसा क्यों करती हो तुम? तुम्हें मेरी इतनी चिंता क्यों है? क्यों तुम हमेशा मुझे खुश देखना चाहती हो? ये सवाल अगर मैं तुमसे करुँ तो तुम यही कहोगी न कि "मैं जानता हूँ!" सच भी तो है. मैं जानता हूँ कि तुम ऐसा क्यों करती हो? पर अगर तुम्हारी जगह कोई और होता तो शायद मेरे लिए इतना नहीं करता! करता भी तो वो महज़ एक औपचारिकता होती..! बस! अब और नहीं! बहुत हो चुका! मैं तुम्हें और अधिक दुखी नहीं देख सकता. तुमसे मेरी गुज़ारिश है कि मुझे और कुश रखने की कोशिश मत करो. मैं ये चाहता हूँ कि तुम हमेशा खुश रहो. मेरी चिंता छोड़ दो. मेरे लिए चिंता का सबसे बड़ा कारण तुम्हारा मेरे लिए चिंता करना है. जब भी मैं ये सोचता हूँ कि तुम मेरे बारे में कितना सोचती हो तो मेरे पास पलकें भिगोने के आलावा और कोई रास्ता नहीं बचता. और हाँ! सबसे अहम् बात : आजतक मेरी वज़ह से जानते हुए या अनजाने में तुम्हें कोई भी हुआ है तो मुझे माफ़ कर देना. मैं जानता हूँ कि मैं तुम्हारे उन दुखों को कम नहीं कर सकता लेकिन मेरी ये कोशिश ज़रूर रहेगी कि आने वाले समय में अब तुम्हें कोई दुःख. कोई परेशानी न हो..!

हमेशा ही तुम्हारा
"राम"

जीने की तमन्ना कौन करे..?

मरने की दुआएँ क्यूँ मांगूँ ,
जीने की तमन्ना कौन करे|
यह दुनिया हो या वह दुनिया,
अब ख्वाहिश-ए-दुनिया कौन करे|

जो आग लगाई थी तुमने,
उसको तो बुझाया अश्कों से|
जो अश्कों ने भड़्काई है,
उस आग को ठन्डा कौन करे|


दुनिया ने हमें छोड़ा जज़्बी,
हम छोड़ न दें क्यूं दुनिया को|
दुनिया को समझ कर बैठे हैं
अब दुनिया दुनिया कौन करे||


रविवार, अगस्त 23, 2009

तुमने मेरे पथरीले घर में क़दम रखा..!

तुमने मेरे पथरीले घर में क़दम रखा
और वहाँ से एक मीठे पानी का झरना फूट पड़ा



मैं इस करिश्मे से ख़ुश हूँ और परेशान भी
अगर मुझे मालूम होता कि इस ख़ुशी की एवज़ में
उदासी तुम्हारे दिल में घर कर जाएगी
तो मैं...

गुरुवार, अगस्त 20, 2009

मुस्कुराने की आदत कविताएँ..!

आदत बना लो
हमेशा मुस्कुराने की।
कठिनाई परेशानी में
किसी के काम आने की।
परिश्रम से कर्तव्य से
जी न चुराने की।
जरा-जरा सी बात पर
हल्ला न मचाने की।
निन्दा न करने की
चुगली न करने की।
किए हुए वादे को
हमेशा निभाने की |


साभार : वेबदुनिया (The First Hindi Web Portal)

मंगलवार, अगस्त 18, 2009

संस्कारों की पाबन्दी और दिखावे का धुंध...

इंसान को अपनी ज़िन्दगी में न जाने कितने समझौते करने पड़ते हैं... कभी ख़ुद के लिए, कभी औरों के लिए तो कभी पता नही किसके लिए... लेकिन समझौता करना एक आदत बन जाती है। इंसान जब बच्चा होता है तो उसे अपने माता पिता के लिए समझौता करना पड़ता है, जब कुछ बड़ा होता है और स्कूल में जाता है तो शिक्षक के लिए, किसी से दोस्ती करता है तो दोस्तों के लिए भी समझौता करना पड़ता है। फ़िर एक दिन आता है जब उसकी शादी हो जाती है, शादी के बाद पत्नी के लिए उसे समझौता करना पड़ता है। धीरे-धीरे वक्त बढ़ता है और उसके बच्चे हो जाते हैं, फ़िर बच्चों के लिए समझौता... नवजात अवस्था, लड़कपन, किशोरावस्था, जवानी और यहाँ तक कि उम्र का अन्तिम पड़ाव बुढापा भी समझौता करने में ही बीत जाता है। फ़िर सोचिए कि इंसान की निजी ज़िन्दगी, उसकी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं और तमाम अभिलाषाएं कहाँ गुम हो जाती हैं? सवाल कठिन है लेकिन इतना भी कठिन नही कि ज़वाब न हो? इसका भी ज़वाब है... और ज़वाब ये है कि उसकी सारी उमर संस्कारों के बंधन में बंधकर रह जाती है और उसे अपनी निजी ज़िन्दगी का एहसास ही नही हो पाता, वह तमाम उम्र उन्ही संस्कारों को निभाने का दिखावा करता है और उसकी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं उसी दिखावे की धुंध में कहीं गुम हो जाती हैं और उसकी तमाम उम्र उन्हें तलाशने में गुज़र जाती है लेकिन धुंध इतना गहरा हो जाता है कि कुछ भी हाथ नहीं आता, सिवा दो गज ज़मीन और एक टुकडा कफ़न के...

शनिवार, अगस्त 15, 2009

तुम मुझसे जुदा नहीं...

आज उसने फिर मुझे निराश कर दिया. मैंने उसे कितनी बार कहा है कि तुम मुझसे झूठ मत कहा करो, लेकिन वो मानती ही नहीं. पता नहीं क्यों उसे मुझसे झूठ बोलना बहुत भाता है. मैंने उसे ये भी बहुत बेहतरी से समझाया है कि देखो मैं अपनी ज़िन्दगी की बड़ी से बड़ी कड़वी बात सुन सकता हूँ, सह सकता हूँ लेकिन तुम्हारा एक झूठ मैं बर्दाश्त नहीं कर सकता. वह कई बार उल्टे मुझसे ही पूंछ बैठती है कि आप ऐसा क्यों कहते रहते हैं..? अरे! इसमें पूछने वाली कोई बात है क्या..? तुम बहुत अच्छे से जानती हो कि मैं ऐसा क्यों कहता हूँ. हम जिस रिश्ते को मजबूती देने जा रहे हैं, उसकी आधारशिला है हम दोनों के बीच विश्वास का होना. अगर हमारे बीच विश्वास नहीं होगा तो हम इस रिश्ते को लेकर दो कदम भी साथ नहीं चल पाएँगे. हमें ज़िन्दगी भर साथ चलना है और अगर संभव हो सका तो ज़िन्दगी के बाद भी साथ-साथ चलेंगे. पर अगर वो मुझसे ऐसे झूठ कहते रहेगी तो मैं कहाँ तक इस रिश्ते को मजबूती दें पाऊंगा..? खैर! मैं उस पर कोई दबाव भी तो नहीं डाल सकता..! ये वो भी बहुत अच्छे से जानती है. न तो मैं कभी उससे ज़बरदस्ती कोई बात कह सकता हूँ. इस बात का भी उसे बहुत अच्छे से पता है. मुझे ये पता है कि वो तभी झूठ बोलती है जब उसमे मेरी कोई बेहतरी जुडी होती है. उसने मुझसे कई बार कहा भी है. मैंने भी उसे बहुत दफा समझाया है कि देखो अगर मेरी अच्छाई के कारण तुम्हें झूठ बोलने के लिए मजबूर होना पड़े या तुम झूठ बोलो तो ये मुझे कतई रास नहीं आएगा. मैं कभी नहीं चाहूँगा कि मेरी भलाई के लिए तुम्हें झूठ का सहर लेना पड़े. लेकिन जब भी वो मेरी भलाई के बारे सोचती है तो उसे मेरी बातों कि भी कोई परवाह नहीं होती. वो वाकई में बेहद मासूम है. तभी तो उसकी मासूमियत मेरी पलकें भिगो देती है. जब कभी उदास होती है और मैं उससे पूछता हूँ कि क्या हुआ? तो झट से आंसू पोंछते हुए बोलेगी - किसे क्या हुआ? कुछ भी तो नहीं!! मैं बिलकुल ठीक हूँ. जबकि उसे बहुत अच्छे से पट होता है कि मैं ये बहुत अच्छे से जानता हूँ कि मुझे उसकी उदासी कि वज़ह मालूम है. फिर भी वो खुद अपनी जुबान से बोलकर मुझे परेशान नहीं करना चाहती. उसकी इन्ही बातों ने आज मुझे रुला दिया. आज मेरी अंतरात्मा ने मुझसे कहा कि मैं बेहद स्वार्थी हूँ. मैं स्वार्थी हूँ इसलिए क्योंकि वो मेरी ख़ुशी के लिए खुद दुखों के समुन्दर में छलांग देती है. मैं स्वार्थी हूँ क्योंकि ख़ुशी को मेरा पता बताने के लिए वो ग़मों का स्वागत अपनी चौखट पर करती है. मैं स्वार्थी हूँ क्योंकि उसे मेरी ख़ुशी के लिए रोना पड़ता है.क्यों आखिर क्यों..?? वो ऐसा क्यों कर रही है..? वो क्यों मेरे बारे में सोचती है..?? वो ये क्यों नहीं सोचती कि मैं भी उसकी उतनी ही परवाह करता हूँ जितना कि वो मेरा..!!

बुधवार, अगस्त 12, 2009

अंधियारी रात और उजियारे की आस...

कई दिनों से मेरा मन मेरे दिमाग पर हावी हो रहा है. कारण जानने की कोशिश की तो कुछ ख़ास हाथ नहीं आया. बस बेबसी और मायूसी के सिवा. मैंने अपने मन पर काबू पाने के सारे उपाय अपना लिए लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. रोज़ रात को यह सोचकर सोता हूँ कि अगली सुबह एक नई ताजगी और स्फूर्ति के साथ दिन की शुरुआत करूंगा लेकिन हर अगली सुबह ठीक वैसी ही होती है जैसे कि पिछली सुबह थी, उदास और ग़मगीन. धीरे-धीरे समय बीतता जा रहा है और समय के साथ बढ़ता जा रहा है तनाव. एक ऐसा तनाव जो पता नहीं कब ख़त्म होगा. खत्म होगा भी या नहीं..? ये वक्त की बात है, फिलहाल तो यह ख़त्म होने का नाम ही ले रहा है. इतना तनाव मेरे जीवन में कभी नहीं आया. शायद इसीलिए मैं ज़रा विचलित सा हो गया हूँ. क्या ऐसा सबके साथ होता है या फिर मैं इसका पहला शिकार हूँ..? हालाँकि खुद के बनाए हुए रिश्तों को निभाने के लिए इतना तनाव झेलना लाजिमी है. माँ, बाप, भाई, बहन जैसे रिश्ते तो खून के रिश्ते हैं, इन्हें तो रोकर या हंसकर, मरकर या जीतेजी निभाना ही पड़ेगा, लेकिन खुद के बनाए हुए, निजी रिश्तों को निभाने के लिए बहुत सारी झंझटों और अनावश्यक तनावों का सामना करना पड़ता है. इन रिश्तों को हंसते हुए और जीतेजी ही निभाना पड़ता है. फिलहाल तो वही कर रहा हूँ. शायद कोशिशों में कुछ कमी है. इसीलिए वक़्त मुझसे ज़रा आगे है. खैर! अब जब दिल लगाने की जुर्रत कर ही ली है तो अंजाम की परवाह करना कायरता होगी. मैं महज़ तनाव के गिरफ्त में जकडा हुआ हूँ. हारा नहीं हूँ और न ही हारूँगा. अगर इस रिश्ते की बुनियाद मैंने रखी है तो इसे एक बेहतर अंजाम तक पंहुचाकर ही दम लूँगा. इसमे कई रोडे आएँगे, मैं इससे भलीभांति परिचित हूँ. इसके लिए मैंने अपने मन को तैयार करना भी धुरु कर दिया. बस दुआ कीजिए कि मेरा मन मेरे आदेशों का पालन करे और वक्त आने पर मुझे मार्गदर्शित करे. बाकी मैं संभाल लूँगा.
शुभरात्रि!!!

गुरुवार, अगस्त 06, 2009

काश! ये न होता..??





क्यों किसी की याद रुलाती है बार-बार?
क्यों किसी की याद सताती है बार-बार?

जो साथ हो दिल में उमड़ती है ख्वाहिशें!
जो दूर हो तो पलकें भीगती हैं बार-बार?

परछाइयों में भी उसका ही चेहरा उभरता है!
सूरज की रौशनी में भी दिखता उसी का प्यार!

कुछ सोचकर अचानक सिहर जाता है ये दिल!
क्यों हर घडी तुम्ही पे आता है ये बार-बार?

हर बार कहता हूँ कि भुला दूंगा अब तुम्हें!
पर सच कहूं तो झूठ ही कहता हूँ बार-बार!

रविवार, अगस्त 02, 2009

इस पराए शहर में...

कई साल पहले

अपने समय के

तमाम जवान लड़कों की तरह

मैं भी निकला था घर से

झोले में कुछ

काग़ज के टुकड़े डालकर

पर छोड़िए

इस कहानी में

कुछ भी नया नहीं है

आप बतलाइये

आप कब

और क्यों आए

इस पराये शहर में।॥?

शनिवार, अगस्त 01, 2009

कॉलेज का तीसरा दिन और...

बात उन दिनों की है जब मैंने अपने Home Town डिंडोरी के एकमात्र महाविद्यालय सीवी कॉलेज में BSc फर्स्ट इयर में दाखिला लिया था. मैं पत्रकारिता जगत और पत्रकारिता के कोर्स में आने से पहले BSc का छात्र था. कॉलेज में तीसरा दिन था. मैंने अभी तक किताबे नहीं खरीदी थी. इसलिए महज़ एक कोरे पन्नो वाली कापी लेकर Chemistry की क्लास में बैठ गया. आगे लिखने से पहले मैं बता दूं कि स्कूल लाइफ में मेरा रिकार्ड एकदम साफ़ था यानि पढने लिखने के साथ-साथ अन्य गतिविधिओं में भी मैं A+ ग्रेड लाता था (मात्र डांसिंग छोड़कर). मेरी क्लास में लगभग सभी क्लासमेट्स 12th के ही थे. सब मुझे बहुत अच्छे से जानते थे. हमारी क्लास में Chemistry रचना मेडम पढाती थी. उन्होंने सबसे पहले नए छात्रों का Intro लिया फिर Logrithem पढाना शुरू किया. हमारी क्लास में रचना मेडम का पहला दिन था. इसलिए उन्होंने Basic से पढाना शुरू किया. सबसे पहले उन्होंने Log10 का मान पूछा. हम में से बहुतों को उसका मान मालूम था लेकिन नई नवेली मेडम को देखकर कोई भी हाथ नहीं उठा पाया. मैं भी नहीं. हम लोग न तो उनके स्वभाव से परिचित थे और न ही उनकी बोली-भाषा से. इसलिए हम सभी चुप बैठे थे और अपना नंबर आने का इंतज़ार कर रहे थे. मैं भी उन्ही में से था और सोच रहा था की मेडम मुझसे पूछें। काफी देर हो गई पर मेरा नम्बर नहीं आया. अचानक मेरा ध्यान क्लासरूम से निकल बाहर क्रिकेट ग्राउंड की ओर चला गया और मैं खिड़की से बाहर झाँककर Match देखने लगा. ठीक उसी वक़्त मुझे ऐसा सुनाई पड़ा मानो किताबों का ज़िक्र चल रहा है. मेरे एक मित्र ने भी मुझसे ऐसा ही कुछ कहा. उसी समय मेडम की मेरी ओर निगाहें पड़ी. मैं बाहर की ओर झांकता हुआ उन्हें खेल देखने में व्यस्त नज़र आया. उन्होंने बड़ी जोर से मेरा नाम पुकारते हुए Log10 का मान पूछा! चूंकि मेरा ध्यान कही और था और ठीक उसी वक़्त किताब खरीदने का ज़िक्र हो रहा था तो मुझे ऐसा लगा जैसे मेडम मुझसे किताबों के बारे में पूछ रही हैं. मैंने झट ही उत्तर दिया - No Maam! मेरा No कहते ही मेरे सारे क्लासमेट्स टकटकी लगाए मेरी ओर देखने लगे. उनके चेहरे पर आश्चर्य की छाया थी. वो सोच रहे थे की जिसने हमें Log का पूरा Table याद कराया है वही Log10 का मान नहीं बता पा रहा है. लेकिन बात तो कुछ और ही थी. खैर! मेडम को मेरा उत्तर सटीक नहीं लगा और उन्होंने मुझे ust Get Out Of The Classroom का आदेश दें डाला. इतना सुनते ही मैं दंग रहा गया और अपने चारों ओर देखने लगा. ठीक उसी वक़्त एक ने झट ही मुझसे कहा - भाई! मेडम Log10 का मान पूछ रही हैं. मैंने मेडम को कोई सफाई न देते हुए Log10 is equal to ONE कहते हुए क्लासरूम से बाहर निकल गया.

यादें...!


यादें... यादें दो तरह की होती हैं; एक अच्छी यादें, दूसरी बुरी यादें. अच्छी यादें उन खुशबूदार फूलों की तरह होती हैं जिन्हें अगर कोई हमारी तरफ फेंकता है तो वो हमारी धडकनों से टकराकर हमारी रूह को तक महका देती हैं. बुरी यादें; बुरी यादें उन कंटीले पत्थरों की तरह होती हैं जो हमसे टकराकर एक अनकहा और कभी न भुला सकने वाला दर्द पैदा करती हैं. पर विडंबना ये है कि हम मनुष्य हैं और हमारी ज़िन्दगी इन दोनों यादों के बगैर नहीं चल सकती.

बुधवार, जुलाई 29, 2009

कैसे कह दूँ कि वो पराया है...

जिसका साँसों ने गीत गाया है
कैसे कह दूँ कि वो पराया है
याद बे इख्तियार आया है
मेरी रग-रग में जो समाया है
कैसा रिश्ता है उस से क्या मालूम
जिसने ख्वाबों में भी रुलाया है
ऐसे सहरा से है गुज़र जिसमें
दूर तक पेड़ है न साया है
बंद पलकों में उसकी हूँ मैं 'ज़हीन'
उसने मुझको कहाँ छुपाया है

मंगलवार, जुलाई 28, 2009

सभ्यता की शक्ल...

आज हर होनी अनहोनी हो रही है।
सभ्यता की शक्ल रोनी हो रही है॥

बढ़ रही है खजूरों की ऊँचाई।
हर गुलाबी नस्ल बौनी हो रही है॥

अब साँसों का कोई शौक नही...

अब साँसों का कोई शौक नही, परवश लेते हैं।
जिन्हें दूध देकर पालो वो खेल-खेल में डंस लेते हैं॥

आ लगी अब ज़िन्दगी शर्मिंदगी की मोड़ पर।
जिन बातों पर रोना आए, हम उन पर अब हंस देते हैं॥

धिक्कार सौ सौ बार...

धिक्कार सौ-सौ बार इस इंसान को।
नीलाम करने जो खड़ा ईमान को॥

स्वर्ण की लंका की सुरक्षा के लिए अपनी।
इसी ने पत्थरों में बो दिया भगवान् को॥

रविवार, जुलाई 26, 2009

अब न आरजू है, न तमन्ना है कोई...

न आरजू है न तमन्ना है कोई।
अब इस दिल को दिल मिल गया कोई॥


इंतज़ार था सदियों का मेरे जीवन में।
उसे एक झटके में पूरा कर गया कोई॥

अक्सर सोचता रहता था मैं तन्हाई में।
मैं तन्हा क्यों हूँ, मुझे आज तक क्यों नही मिला कोई॥

वो क्या आई ज़िन्दगी में फूल खिल गए लाखों।
सूखे बाग़ में एक प्यार का पौधा लगा गया कोई॥

अब अगर ये सपना है तो ये सदा रहे मेरा।
जो भी हो पर प्यार का मुझे खाब दिखा गया कोई॥

आज इस दिल की धडकनों को धड़कना सिखा गया कोई॥
मेरी आंखों में मोहब्बत के प्यारे ख्वाब सज़ा गया कोई॥

शनिवार, जुलाई 25, 2009

कुछ कम है...

ज़िन्दगी जैसी तमन्ना थी नहीं कुछ कम है.
हर घड़ी होता है एहसास कहीं कुछ कम है..

घर की तामीर तसव्वुर ही में हो सकती है.
अपने नक़्शे के मुताबिक़ ये ज़मीं कुछ कम है..

बिछड़े लोगों से मुलाक़ात कभी फिर होगी.
दिल में उम्मीद तो काफ़ी है यक़ीं कुछ कम है..

अब जिधर देखिये लगता है कि इस दुनिया में.
कहीं कुछ चीज़ ज़ियादा है कहीं कुछ कम है..

आज भी है तेरी दूरी ही उदासी का सबब.
ये अलग बात कि पहली सी नहीं कुछ कम है..


रचनाकार: शहरयार

गुरुवार, जुलाई 23, 2009

आदमी की पीड़ा...

वक्त के धरातल पर
जम गई हैं
दर्द की परतें
दल-दल में धंसी है सोच
मृतप्रायः है एहसास
पंक्चर है तन
दिशाहीन है मन
हाडमांस का
पिजरा है मानव
इस तरह हो रहा है
मानव समाज का निर्माण
अब
इसे चरित्रवान कहें
या चरित्रहीन
कोई तो बताए
वो मील का पत्थर
कहाँ से लाएं
जो हमें
"गौतम", "राम", "कृष्ण" की राह दिखाए..?

ज़िन्दगी क्या है..?

ज़िन्दगी फ़क़ीर बनके रह गई

साँस की लकीर बनके रह गई

ऐसा भी क्या गुनाह था

कि पीर-पीर...

द्रौपदी का चीर बनके रह गई॥!..?

आओ! जश्न मना लो...

हम सहस्राब्दी में आ गए
बेबसी, बेकारी, भुखमरी
जिल्लतें, दर्द और ग़म भी
हमारे साथ-साथ
यहॉ तक आ गए
समय चीखकर
कह रहा है
इस व्यवस्था को
बदल डालो
नेता कहते हैं
हमारी करतूतों पर
परदा डालो
आओ!
सहस्राब्दी का जश्न मना लो...

मंगलवार, जुलाई 21, 2009

वक़्त बदलेगा, मंज़र भी बदल जाएँगे...

आज सुबह से ही वो बहुत परेशान थी। मैं अपने बिस्तर पर सोया हुआ था। सुबह के लगभग ग्यारह बजे होंगे कि मेरे सेलफोन की घंटी बजी। मैंने देखा उसी का मिस्ड काल था। मैंने वापस फोन किया। उधर से एक परेशान सी आवाज़ में उसने मेरा हालचाल पूछा। मैंने अपनी सलामती बताई और उससे काल करने का कारण पूछा। बड़ी ही सहमी सी आवाज़ में उसने मुझे अपनी समस्या बताई। उसकी समस्या सुनकर मैंने उसे समझाते हुए कहा कि इन बातों का कोई औचित्य नही है। इसलिए इन बातों को भूल जाओ। पर उसने एक ऐसी बात कह दी कि मैं फ़िर कोई ज़वाब न दे सका। उसकी बातों में उलझता जा रहा था। उसकी बातों में छिपे सवालों का मैं कोई ज़वाब नही दे पा रहा था। मैं उसे ठीक वैसे ही समझाते जा रहा था जैसे प्रवचन या सत्संग कार्यक्रम में कोई साधू या स्वामी जी कहते हैं कि "सदा सत्य बोलो, झूठ बोलना पाप है।" अब आप ही बताइए उस वक़्त जब मो मुझसे अपनी परेशानी साझा कर रही है तब इन बातों का अस्तित्व कहाँ तक है? कोई आपसे अपनी समस्याएं बता रहा है और आप उसे प्रवचन सुना रहे हैं तो आपसे उसकी अपनी परेशानी साझा करने का क्या मतलब है? उसने मुझसे कहा कि "आपके और मेरे रिश्ते को लेकर मैंने कुछ असहनीय बातें सुनी हैं। आप तो लड़के हैं और आप इन बातों का उत्तर समाज को बेफिक्री से दे सकते हो लेकिन मैं तो लड़की हूँ न, और एक लड़की के लिए यह सब सुन पाना कितना दुखद होता है इसका अंदाजा एक लड़की ही लगा सकती है। जबकि मैं जानती हूँ कि आप मेरे लिए कितना महत्व रखते हैं और लोग जैसी बातें कर रहे हैं वैसा कतई नही है। इस बात में ज़रा भी सच्चाई नही है। मुझे आपकी चिंता अधिक है। इसलिए मेरा मन इस बात को गंवारा नही करता करता और परेशान हो जाता है।" सच! कितनी मासूमियत है इन लाइंस में? बस उसकी इसी मासूमियत ने ही तो मुझे निरुत्तर कर दिया था। उसकी इन सारी बातों के बदले मैंने सिर्फ़ इतना ही कहा कि "तुम जानती हो न, कि हमारा रिश्ता क्या है? जब हम दोनों (जिन्हें रिश्ता निभाना है) को पता है कि हमारा रिश्ता ग़लत नही है तो फ़िर लोगों के कह देने भर से कि हमारा रिश्ता सही नही है, क्या हमारा रिश्ता बदल जाएगा या फ़िर ग़लत हो जाएगा क्या?" मेरी इस बात से शायद उसे कुछ तसल्ली हुई। उसकी बातों से मुझे परेशानियों का जाना स्पस्ट समझ में आया। उसके बोलने का लहजा भी बदला और फ़िर वो धीरे-धीरे सामान्य होने लगी। उसकी परेशानी तो लगभग जा चुकी थी या फ़िर अब तक जा चुकी होगी होगी लेकिन मैं अभी तक उसकी मासूम बातों और निःस्वार्थ सवालों के बीच ख़ुद को फंसा हुआ महसूस कर रहा हूँ। ईश्वर से मेरी यही प्रार्थना है कि उसकी सारी परेशानिया मुझे देदें और मेरे सारे उल्लास, मेरी सारी खुशियाँ उस तक पहुँचा दें!!! क्योंकि मैं भले ही उसके लिए इस दुनिया का एक हिस्सा हूँ, पर मेरे लिए वो ही पूरी दुनिया है...

सोमवार, जुलाई 20, 2009

एक "चाँद" आसमान से विदा हो गया...


महज़ सत्रह दिन बाद यानि चार अगस्त को उनका जन्मदिन आने वाला था। अभी जून की ग्यारह तारीख की शाम को ही उन्होंने मुझसे बात की थी। उस दिन वो काफी खुश थे। फोन पर "हेलो" बोलते ही उन्होंने कहा "छोटे! खुशखबरी है!" मैंने खुश होते हुए कहा "क्या भैया?" उन्होंने कहा "तेरे भाई ने PSc का प्री एग्जाम पास कर लिया है। अब दुआ कर कि मेन्स में भी पास हो जाऊँ! और सुन एक और खुशखबरी है! SBI में भी मेरा सेलेक्शन हो गया है! मैं ख़ुशी से झूम उठा और कहा कि वाह! भैया क्या बात है!! CONGRATULATIONS! अब तो मिठाई की बनती है! उन्होंने उतनी ही ख़ुशी से कहा "अब इसमें कौन सी बड़ी बात है। मैं 25 जुलाई को जबलपुर आ रहा हूँ न! मिलते हैं! इसके बाद उन्होंने मेरी पढाई के बारे में पूछा और फिर इधर-उधर कि बातें होने लगी।
दिन था 18 जुलाई का, शनिवार! मैं अपने ऑफिस में कंप्यूटर स्क्रीन पर नज़रे गडाये उनके ब्लॉग http://swasamvad.blogspot.com/ पर उनकी रचनाएँ पढ़ रहा था। सच में कितना प्यारा लिखते थे वो। जादू था उनकी लेखनी में। उस वक़्त रात के लगभग साढ़े दस हो रहे थे। अचानक मेरे सेलफोन की घंटी बजी। मेरे एक दोस्त रमन का काल था। काल मिस हो जाने के बाद मैंने कालबैक किया। अमूमन काल कनेक्ट होने के बाद HELLO ही सुनाई देता है लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। उस तरफ से रमन की घबराई हुई आवाज़ से निकले हुए शब्द थे "कुछ खबर मिली क्या?" मैंने बड़ी व्याकुलता और भय से पूछा "क्या?" उसने कहा "'विकास भैया' की DEATH हो गई"। इतना कहना हुआ ही था कि मेरे तो पैर ही ठंडे पड़ गए। एक पल के लिए मुझे लगा कि मेरे शरीर से मेरी आत्मा विदा हो गई। पैरों तले ज़मीन खिसक गई और मैं हतप्रभ रह गया। उन्हें इस संसार से विदा हुए अभी कुछ ही घंटे हुए हैं। अभी भी उनकी वो हंसती-मुस्कुराती सूरत मेरे दिमाग में क़ैद है और मुझे, मेरे मन को बार-बार रुला रही है। वो भोपाल में रहकर PSc MAINS की तयारी कर रहे थे.
शनिवार, 18 JULY का दिन उनके और हम सभी के लिए एक "काला दिन" था। भोपाल के पास ही मिसरौद रोड पर एक सड़क हादसे में उनकी और हमारे एक अन्य सीनियर संकल्प रंजन शुक्ला की दर्दनाक मौत हो गई। ईश्वर इतना भी कठोर हो सकता है, मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी? खैर! वो जितनी उम्र लेकर आये उतना ही जिए। अंत में मेरे प्यारे "विकास भैया" के लिए इतना ही कहूंगा कि
"कुछ लोग हैं जो वक़्त के सांचे में ढल गए, कुछ लोग थे जो वक़्त के सांचे बदल गए।" अब वो भौतिक रूप से तो हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी स्मृतियाँ सदा ही हमारे बीच रहेंगी। प्यारे भैया आपको हम सभी छोटे भाइयों, आपके चाहने वालों और आपके तमाम साथियों की ओर से "अश्रुपूरित श्रद्धासुमन"। आप अगले जनम में जहाँ भी जाएं, हमेशा खुश रहें और आपको हमारी भी उम्र लग जाए...
"ये कौन चला श्रृंगार करके? बहार क्यों लजा गई?बस इतनी सी बात है, किसी की आँख लग गयी, किसी को नींद आ गयी!!!

शनिवार, जुलाई 18, 2009

घर से निकले थे हौसला करके...

सच ही कहा गया है कि इंसान अपने मन का कैदी, मन का गुलाम होता है। किसी वस्तु या व्यक्ति या अन्य किसी चीज़ को पाने के लिए एक बच्चे की तरह मचल जाता है। Object कोई भी हो, उसके लिए Subject एक ही रहता है और वह Subject होता है "जो चाह लिया है उसे पाना है"। क्या पाना है यह हुआ Object और कैसे पाना है यह Subject हुआ। तो किसी भी चीज़ को चाह लेने के बाद बस पाना है और पाकर रहना है, यही उसका यानि मन का ध्येय बन जाता है। यह तो हुई "ऐकिक" प्रकार की गुलामी। अब बात आती है इंसानी मन की भावनाओं की; बात शुरू करता हूँ आज के परिवेश यानि Culture को लेकर! आज हम अपने चारों ओर देखते हैं कि पश्चिमी सभ्यता हम पर पूरी तरह हावी है। यह भी कह सकते हैं कि हमने इसे ख़ुद पर हावी होने दिया है। कुछ ऐसे भी इंसान हैं जो इसे हावी होने का कोई मौका ही नही देते , पर उनकी संख्या अँगुलियों पर है। हाँ! तो मुद्दे कि बात यह है कि आज का युवा अपने "मन" को एक ऐसे ढलान पर उतार देता है जो सीधे किसी "खूबसूरत लड़की" पर जाकर ख़त्म होता है। हमारे युवा मित्र ने एक लड़की पसंद कर ली और उसे इम्प्रेस करने में लग गए। बंधू कि किस्मत ने साथ दिया और लड़की ने भी उनको पसंद कर लिया। फोन पर बातें भी होने लगी। मिलने लगे और साथ-साथ घूमना-फिरना भी शुरू हो गया। बात बहुत आगे बढ़ गई और दिन-ब-दिन नजदीकियां भी बढ़ने लगी। भाई उस लड़की की यादों में खो गया। अब उसे उस लड़की के अलावा न दिखाई देता है और न ही कोई समझ में आता है। सारे रिश्ते-नाते, घर-परिवार एक तरफ़ और वह लड़की एक तरफ़। न जाने उस लड़की में ऐसा क्या है, जिसने उसे घर-परिवार तक को भूलने पर विवश कर दिया। खैर! जो भी हो पर हमारा यह युवा मित्र "प्यार" की जाल में फँस गया है। अब उसे सिर्फ़ वही लड़की चाहिए। वह उस लड़की को चाहने लगा है। इतना चाहने लगा है उसे सिर्फ़ उसी की चाहत है। यहाँ पर हमारे मित्र का Subject है वह लड़की और ऑब्जेक्ट है उसे पाना। फिर अचानक पता नही क्या हो जाता है ? जो लड़की हमारे युवा मित्र को घर-परिवार से भी बढ़कर लगने लगती है वाही अब उसके "मन" को नही भा रही है। वाह! भाई क्या बात है ? अब हमारे मित्र की वह "ऐकिक" प्रकार की गुलामी खत्म होने लगती है। अब वह जकड़ता जाता है "अनैक्षिक" गुलामी में। किसी ने पूछा अबे अचानक तुझे क्या हो गया? तो हमारा युवा मित्र बहुत ही उदासी से ज़वाब देता और कहता है यार! कल मैंने उसके सेल पर किसी लड़के का मेसेज देखा! मैसेज पढ़कर मेरा दिल रो पड़ा यार, ऐसा मैसेज था। बस फ़िर मैंने ठान लिया की अब न तो उससे बात करूंगा और न ही कोई मैसेज भेजूंगा। दिल तो नही मान रहा हमारे मित्र का, पर क्या करें। किसी लड़के का भाई की गर्लफ्रेंड के सेल पर मैसेज क्या देख लिया, होश उड़ गए। अब आप ही बताइए... ऐसा भला "प्यार" होता है क्या???
अब क्या होता है कि हमारे युवा मित्र चले थे लड़की को हासिल करने और उल्टे पैर लौट आए। इस वक़्त जगजीत सिंह जी का गाया हुआ ये ग़ज़ल खूब जमता है :
"घर से निकले थे हौसला करके।
लौट आए खुदा-खुदा करके॥"

शुक्रवार, जुलाई 17, 2009

रामायण का एक सीन...

रुखसत हुआ वो बाप से लेकर खुदा का नाम।

राह-ए-वफ़ा की मन्ज़िल-ए-अव्वल हुई तमाम॥

मन्ज़ूर था जो माँ की ज़ियारत का इंतज़ाम।

दामन से अश्क पोंछ के दिल से किया कलाम॥!॥

रचनाकार - पं ब्रजनारायण ’चकबस्त’

यह भी तो "प्यार" ही है न..!!!

बात उस समय की है जब मैं अपने ग्रेजुएशन के चौथे सेमेस्टर की परीक्षाएं दे रहा था. उस वक़्त मेरी तबियत काफी बिगड़ी हुई थी, इसलिए मेरी देखभाल के लिए मेरी माँ भी मेरे साथ ही थीं. उस दिन मेरा तीसरा या चौथा पेपर था. हम लोग एग्जाम हाल से पेपर देकर निकले. बारिश भी अपने पूरे शवाब पर था. ठीक उसी वक़्त मेरा शरीर गर्म होने लगा. मुझे काफी तेज़ बुखार हो चला था. ठण्ड भी इतनी लग रही थी मानो मैं कडाके की ठण्ड में बिना कपडों के खडा हूँ. दम निकला जा रहा था. मुझे बस यही चिंता सताए जा रही थी कि मैं घर कैसे पहुंचूंगा? इतने में ही मेरे एक अभिन्न और अज़ीज़ मित्र ने मुझे कांपते हुए देखा. वो मेरे पास आया और मेरा माथा छूने लगा. वो भी दंग रह गया. उसने कहा "राम" तुझे तो काफी तेज़ बुखार है. मैंने दबी जुबान से स्वीकृति दी. उसने झट ही अपना रेनकोट मुझे दे दिया और पहनने को कहा. मैंने कहा भी कि तुम क्या पहनोगे? उसने कहा अभी मुझसे ज्यादा इसकी ज़रूरत तुझे है. उसने बाईक स्टार्ट की, मुझे बैठने को कहा और तेजी से मेरे घर की ओर रुख किया. बारिश की बूंदों की हिमाकत बढती जा रही थी, लेकिन उसे उन बूंदों की परवाह नहीं थी. उसे परवाह थी तो सिर्फ "राम" की. करीब बीसेक मिनट में हम लोग मेरे घर पहुँच गए. माँ भी बेसब्री से मेरी राह ताक रही थी. उन्होंने जैसे ही हम दोनों को देखा. उनकी आँखों में नमी ने पनाह पा लिया. वो रोने लगीं. क्यों रोयीं..? मुझे देखकर..! नहीं...! वो रोयीं थीं "राम" और "ज्ञान" का "प्यार" देखकर. उन्होंने देखा कि कैसे "ज्ञान" ने "राम" की परवाह की..? कैसे "राम" की हालत देखकर "ज्ञान" ने खुद की फिक्र नहीं की और "राम" को सही सलामत घर पहुँचाया. सच कहता हूँ, उस दिन "ज्ञान" ने मुझे इस तरह से रेनकोट पहनाई थी की उतनी तेज़ बारिश में भी मैं ज़रा भी नहीं भीगा था. हम दोनों की हालत पर मेरी माँ ने गौर किया और "ज्ञान" का सिर पोंछते हुए उसे सीने से लगा लिया.

जवानी का बहिष्कार : "प्यार"

सूखी
गुलदस्ते सी
प्यार की नदी
****

व्यक्ति
संवेग सब
मशीन हो गए
जीवन के
सूत्र
सरेआम खो गए

****
और कुछ न कर पाई
यह नई सदी

****
वर्तमान ने
बदले
ऐसे कुछ पैंतरे
****

आशा
विश्वास
सभी पात से झरे

****
सपनों की
सर्द लाश
पीठ पर लदी।

बुधवार, जुलाई 15, 2009

आरजू है वफ़ा करे कोई...|||

आरजू है वफ़ा करे कोई।
जी न चाहे तो क्या करे कोई॥
गर मर्ज़ हो दवा करे कोई।
मरने वाले का क्या करे कोई॥
कोसते हैं जले हुए क्या-क्या।
अपने हक़ में दुआ करे कोई॥
उन से सब अपनी-अपनी कहते हैं।
मेरा मतलब अदा करे कोई॥
तुम सरापा हो सूरत-ए-तस्वीर।
तुम से फिर बात क्या करे कोई॥
जिस में लाखों बरस की हूरें हों।
ऐसी जन्नत को क्या करे कोई॥

मंगलवार, जुलाई 14, 2009

बना-बना के तमन्ना मिटाई जाती है...

बना-बना के तमन्ना मिटाई जाती है।
तरह-तरह से वफ़ा आज़माई जाती है॥
जब उन को मेरी मुहब्बत का ऐतबार नहीं।
तो झुका-झुका के नज़र क्यों मिलाई जाती है॥
हमारे दिल का पता वो हमें नहीं देते।
हमारी चीज़ हमीं से छुपाई जाती है॥
'शकील' दूरी-ए-मंज़िल से ना-उम्मीद न हो।
मंजिल अब आ ही जाती है अब आ ही जाती है॥

...उस हँसी को ढूँढ़िए..!!!



जो रहे सबके लबों पर उस हँसी को ढूँढ़िए।

बँट सके सबके घरों में उस खुश़ी को ढूँढ़िए॥

देखिए तो आज सारा देश ही बीमार है।

हो सके उपचार जिससे उस जड़ी को ढूँढ़िए॥

काम मुश्किल है बहुत पर कह रहा हूँ आपसे।

हो सके तो भीड़ में से आदमी को ढ़ूढ़िए॥

हर दिशा में आजकल बारूद की दुर्गन्ध है।

जो यहाँ ख़ुशबू बिखेरे उस कली को ढूँढ़िए॥

प्यास लगने से बहुत पहले हमेशा दोस्तों।

जो न सूखी हो कभी भी उस नदी को ढूँढ़िए॥

शहर-भर में हर जगह तो हादसों की भीड़ है।

हँस सकें हम सब जहाँ पर उस गली को ढूँढ़िए॥

क़त्ल, धोखा, लूट, चोरी तो यहाँ पर आम हैं।

रहजनों से जो बची उस पालकी को ढूँढ़िए॥

शुक्रवार, जुलाई 10, 2009

दिल में न हो ज़ुर्रत तो मोहब्बत नहीं मिलती...


दिल में न हो ज़ुर्रत तो मोहब्बत नहीं मिलती।
खैरात में इतनी बड़ी दौलत नहीं मिलती।
कुछ लोग यूँही शहर में हमसे भी ख़फा हैं।
हर एक से अपनी भी तबीयत नहीं मिलती।
देखा था जिसे मैंने कोई और था शायद।
वो कौन है जिससे तेरी सूरत नहीं मिलती।
हंसते हुए चेहरों से है बाज़ार की ज़ीनत।
रोने को यहाँ वैसे भी फुरसत नहीं मिलती।

गुरुवार, जुलाई 09, 2009

माँ और पिताजी...





माँ
चिंता है, याद है, हिचकी है।
बच्चे की चोट पर सिसकी है।
माँ चूल्हा, धुआं, रोटी और हाथों का छाला है।
माँ ज़िन्दगी की कड़वाहट में अमृत का प्याला है।
माँ त्याग है, तपस्या है, सेवा है।
माँ फूँक से ठंडा किया हुआ कलेवा है।

पिता
पिता रोटी है, कपड़ा है, मकान हैं।
पिता छोटे से परिंदे का बड़ा आसमान हैं।
पिता से बच्चों के ढेर सारे सपने हैं।
पिता हैं तो बाज़ार के सब खिलौने अपने हैं।



Ask - स्वर्गीय कवि ॐ व्यास "ॐ''

मंगलवार, जुलाई 07, 2009

ख्व़ाब छीने, याद भी सारी पुरानी छीन ली...

ख्व़ाब छीने, याद भी सारी पुरानी छीन ली
ख्व़ाब छीने, याद भी सारी पुरानी छीन ली
वक़्त ने हमसे हमारी हर कहानी छीन ली।
पर्वतों से आ गई यूँ तो नदी मैदान में
पर उसी मैदान ने सारी रवानी छीन ली।
दौलतों ने आदमी से रूह उसकी छीनकर
आदमी से आदमी की ही निशानी छीन ली।
देखते ही देखते बेरोज़गारी ने यहाँ
नौजवानों से समूची नौजवानी छीन ली।
इस तरह से दोस्ती सबसे निभाई उम्र ने
पहले तो बचपन चुराया फिर जवानी छीन ली।
पर्वतों से आ गई यूँ तो नदी मैदान में
पर उसी मैदान ने सारी रवानी छीन ली।
दौलतों ने आदमी से रूह उसकी छीनकर
आदमी से आदमी की ही निशानी छीन ली।
देखते ही देखते बेरोज़गारी ने यहाँ
नौजवानों से समूची नौजवानी छीन ली।
इस तरह से दोस्ती सबसे निभाई उम्र ने
पहले तो बचपन चुराया फिर जवानी छीन ली।

वो जब याद आया...


दिल धड़कने का सबब याद आया
वो तेरी याद थी अब याद आया
आज मुश्किल था सम्भलना ऐ दोस्त
तू मुसीबत में अजब याद आया
दिन गुज़ारा था बड़ी मुश्किल से
फिर तेरा वादा-ए-शब याद आया
तेरा भूला हुआ पैमान-ए-वफ़ा
मर रहेंगे अगर अब याद आया
फिर कई लोग नज़र से गुज़रे
फिर कोई शहर-ए-तरब याद आया
हाल-ए-दिल हम भी सुनाते लेकिन
जब वो रुख़सत हुए तब याद आया
बैठ कर साया-ए-गुल में "नासिर"
हम बहुत रोये वो जब याद आया..!!

शनिवार, जुलाई 04, 2009

प्यार कहता है...



यह बेवकूफ़ी है
समझदारी कहती है
यह वो है जो वो है
प्यार कहता है
यह बदक़िस्मती है
हिसाब कहता है
यह दर्द के सिवाय
कुछ नहीं है
डर कहता है
यह उम्मीदों से खाली है
बुद्धिमानी कहती है
यह वो है जो वो है
प्यार कहता है
यह बेतुका है
अभिमान कहता है
यह लापरवाही है
सावधानी कहती है
यह नामुमकिन है
तजुर्बा कहता है
यह वो है जो वो है
प्यार कहता है
मूल जर्मन भाषा से अनुवाद

रविवार, जून 28, 2009

सबके दिल से उतर गया हूँ मैं...

एक हुनर है जो कर गया हूँ मैं
सब के दिल से उतर गया हूँ मैं
कैसे अपनी हँसी को ज़ब्त करूँ
सुन रहा हूँ के घर गया हूँ मैं
क्या बताऊँ के मर नहीं पाता
जीते जी जब से मर गया हूँ मैं
अब है बस अपना सामना दरपे
शहर किसी से गुज़र गया हूँ मैं
वो ही नाज़-ओ-अदा, वो ही घमजे
सर-ब-सर आप पर गया हूँ मैं
अजब इल्ज़ाम हूँ ज़माने का
के यहाँ सब के सर गया हूँ मैं
कभी खुद तक पहुँच नहीं पाया
जब के वाँ उम्र भर गया हूँ मैं
तुम से जानां मिला हूँ जिस दिन से
बे-तरह, खुद से डर गया हूँ मैं...

शनिवार, जून 27, 2009

मर्द-ए-बाख़ुदा...

इबादत करते हैं जो लोग जन्नत की तमन्ना में
इबादत तो नहीं है इक तरह की वो तिजारत है
जो डर के नार-ए-दोज़ख़ से ख़ुदा का नाम लेते हैं
इबादत क्या वो ख़ाली बुज़दिलाना एक ख़िदमत है
मगर जब शुक्र-ए-ने'मत में जबीं झुकती है
बन्दे की वो सच्ची बन्दगी है इक शरीफ़ाना इत'अत है
कुचल दे हसरतों को बेनियाज़-ए-मुद्द'अ हो जा
ख़ुदी को झाड़ दे दामन से मर्द-ए-बाख़ुदा हो जा
उठा लेती हैं लहरें तहनशीं होता है जब कोई
भरना है तो ग़र्क़-ए-बह्र-ए-फ़ना हो जा

रविवार, जून 21, 2009

प्रेम पिता का...


A VERY VERY HAPPY FATHER's DAY TO ALL...!!!

प्रेम पिता का दिखाई नहीं देता
ईथर की तरह होता है
ज़रूर दिखाई देती होंगी नसीहतें
नुकीले पत्थरों-सी
दुनिया-भर के पिताओं की लम्बी कतार में
पता नहीं कौन-सा कितना करोड़वाँ नम्बर है मेरा
पर बच्चों के फूलोंवाले बग़ीचे की दुनिया में
तुम अव्वल हो पहली कतार में मेरे लिए
मुझे माफ़ करना मैं अपनी मूर्खता और प्रेम में समझा था
मेरी छाया के तले ही सुरक्षित रंग-बिरंगी दुनिया होगी तुम्हारी
अब जब तुम सचमुच की दुनिया में निकल गई हो
मैं ख़ुश हूँ सोचकर
कि मेरी भाषा के अहाते से परे है तुम्हारी परछाई..!!

FATHER'S डे...


WISH YOU ALL BLOGGER'S A VERY-VERY AND UNFORGATABLE FATHER'S DAY..!
21 जून, जिसे हम FATHER'S DAY के रूप में जानते हैं... मनाते हैं तो नही कह सकता... क्योंकि मुझे नही लगता कि सच में कोई मनाता होगा... हो सकता है ये बात कई लोगों को ग़लत लगे या फ़िर इससे किसी के मन को आघात पहुँच सकता है... मैं उन तमाम लोगो से इस बात के लिए क्षमा चाहता हूँ... माफ़ कीजिएगा... लेकिन जो सच है वही लिख रहा हूँ... महज़ SMS कर देने से या फ़िर HAPPY FATHER'S DAY बोल देने से इस दिन का महत्व नहीं बढ़ जाता... अब आप कहेंगे कि "तो भैया तुम ही बता दो न, कैसे बढाएं इस दिन का महत्व..?" मेरा ज़वाब होगा कि पिता आपके भी होंगे अपने हिसाब से तय कीजिए... भई! मैं तो अपनी समझ और उम्र के हिसाब से अपना काम करता हूँ... यकीन न हो किसी दिन मेरे साथ मेरे घर चलिए... आप जान जाएँगे कि कैसे मुझे देखते ही मेरे पिता कि आँखों में आंसू की चमकदार बूंदे पनाह पा लेती हैं... उस वक़्त वो मुझसे ठीक वैसे ही मिलते हैं जैसे कोई सदियों का प्यासा पानी से... खैर अपने पिता के बारे में तो सिर्फ इतना कहूँगा कि I LOVE MY PAPA VERY MUCH...

शनिवार, जून 20, 2009

माँ.. तू जो नही है तो...


मेरा बचपन था मेरा घर था खिलौने थे मेरे
सर पे माँ बाप का साया भी ग़ज़ल जैसा था
मुक़द्दस मुस्कुराहट माँ के होंठों पर लरज़ती है
किसी बच्चे का जब पहला सिपारा ख़त्म होता है
मैं वो मेले में भटकता हुआ इक बच्चा हूँ
जिसके माँ बाप को रोते हुए मर जाना है
घेर लेने को मुझे जब भी बलाएँ आ गईं
ढाल बन कर सामने माँ की दुआएँ आ गईं
मिट्टी लिपट—लिपट गई पैरों से इसलिए
तैयार हो के भी कभी हिजरत न कर सके
मुफ़्लिसी ! बच्चे को रोने नहीं देना वरना
एक आँसू भरे बाज़ार को खा जाएगा...

गुरुवार, जून 18, 2009

कुछ चुभ रहा है..!


वो "हमें" चाहते हुए भी न जाने क्यों दूर जाना चाहती थी...
न जाने क्यों अपनी निगाहों से हटाना चाहती थी...
मिलती थी, बातें भी करती थी पर
अनजानों की तरह...
एक दिन गुमसुम अकेले रो रही थी...
मैं भी वहीं था...
मैंने पूछा क्या हुआ... क्यों रो रही हो?
उसने रोती हुई निगाहों से मेरी ओर देखकर कहा
कुछ नहीं! बस आँखों में कुछ चुभ रहा है..!

मंगलवार, जून 16, 2009

एक सपना.... नाम कमाना है....


उनकी ऊंघती आंखों में एक सपना था...
कहते थे बेटे! तुम्हें नाम कमाना है...
पैसे तो सभी कमा लेते हैं...
कभी पैसा कमाने के लिए कोई ग़लत काम मत करना...
क्योंकि ग़लत का करने से पैसा तो खूब मिलता है
पर नाम नही मिलता और तुम्हें नाम कमाना है...

सोमवार, जून 15, 2009

सभ्यता..!


एक दिन लोगों कि बदलती वेशभूषा देखकर मैंने माँ से कहा- माँ! हम लोग ऐसे क्यों होते जा रहे हैं? माँ ने उत्तर दिया- बेटे! हम लोग सभ्यता की ओर जा रहे हैं!

शुक्रवार, जून 12, 2009

माँ तुम हो या मेरा भ्रम है..?



माँ बेसाख़्ता आ जाती है तेरी याद
दिखती है जब कोई औरत..।
घबराई हुई-सी प्लेटफॉम पर
हाथों में डलिया लिए
आँचल से ढँके अपना सर
माँ मुझे तेरी याद आ जाती है..।
मेरी माँ की तरह
उम्र के इस पड़ाव पर भी घबराहट है
क्यों, आख़िर क्यों ?
क्या पक्षियों का कलरव
झूठमूठ ही बहलाता है हमें ..?

अपने हाथों से पिलाया कीजिए...


इस तरह हर ग़म भुलाया कीजिये

रोज़ मैख़ाने में आया कीजिये

छोड़ भी दीजिये तकल्लुफ़ शेख़ जी

जब भी आयें पी के जाया कीजिये

ज़िंदगी भर फिर न उतेरेगा नशा

इन शराबों में नहाया कीजिये

ऐ हसीनों ये गुज़ारिश है मेरी

अपने हाथों से पिलाया कीजिये




"हसरत जयपुरी"

बुधवार, जून 10, 2009

उदासी के मंज़र...


उदासी के मंज़र मकानों में हैं
के रंगीनियाँ अब दुकानों में हैं।
मोहब्बत को मौसम ने आवाज़ दी
दिलों की पतंगें उड़ानों में हैं।
इन्हें अपने अंजाम का डर नहीं
कई चाहतें इम्तहानों में हैं।
न जाने किसे और छलनी करेंगें
कई तीर उनकी कमानों में हैं।
दिलों की जुदाई के नग़मे सभी
अधूरी पड़ी दास्तानों में हैं।
वहाँ जब गई रोशनी डर गई
वो वीरानियाँ आशियानों में हैं।
ज़ुबाँ वाले कुछ भी समझते नहीं
वो दुख दर्द जो बेज़ुबानों में हैं।
परिंदों की परवाज़ कायम रहे
कई ख़्वाब शामिल उड़ानों में हैं।

रविवार, जून 07, 2009

मेरा क्या जाता है..?


एक महोदय काफी स्वार्थी प्रवृत्ति के थे।
कभी कोई उसे मुसीबत में दिख भी जाता और उससे मदद
की गुजारिश करता तो वह कहता "मेरा क्या जाता है"
और वहां से चला जाता। ऐसे ही सालों गुज़र गए पर
उसका तकिया कलाम वही रहा। एक दिन वह घर पर अपनी
ग्यारह साल की बच्ची के साथ अकेला था।
बरसात का मौसम था, बच्ची को जोरों से बुखार आया था।
वह बच्ची की बीमारी को दूर करने के लाख कोशिश कर चुका था।
सारे दांव फेल हो चुके थे। वह बहुत घबरा गया और
घबराहट की स्थिति में ही दौड़ा-दौड़ा
अपने पड़ोसी के घर गया। उसने गुजारिश की- गौतम जी!
मेरी बच्ची की हालत काफी ख़राब है कृपया अपनी कार
में हॉस्पिटल ले चलिए। गौतम जी ने बड़ी ही विनम्र और दया की
दृष्टी से उसकी ओर देखा और कहा "मेरा क्या जाता है"
पर तुम्हारी बच्ची की हालत काफी नाज़ुक है और
उसे हो गया तो "तुम्हारा बहुत कुछ चला जाएगा"
यह कहकर गौतम जी ने अपनी कार निकाली
और बच्ची को हॉस्पिटल पहुँचाया।

माँ...


एक महोदय बड़ी गंभीरता के साथ कुछ लिख रहे थे...
अचानक एक पिचहत्तर साल के करीब की बुजुर्ग महाशय के पास आई और बोली -
बेटा! भोजन का समय हो गया है! महाशय ने ध्यान नही दिया...
बुजुर्ग ने फ़िर कहा - मेरे लाल! भोजन ठंडा हो रहा है!
महाशय गुस्से में आ गए और बोले - चुप भी कर ''माँ'',
तेरे आँख फूट गए हैं क्या?
देखती नही कल कोलेज में मेरा लेक्चर है...
"माँ" पर कविता लिख रहा हूँ..!!

गुरुवार, जून 04, 2009

मैं कहाँ हूँ...?


उसने कहा मैं कहाँ हूँ..?

मैंने कहा मेरे दिल में,
मेरी साँसों में,

मेरे जेहन में,

मेरी नस-नस में,

उसने कहा मैं कहाँ नही हूँ..?

मैंने कहा मेरी किस्मत में..!!

च्वाइस...


एक दिन हम दोनों साथ में एक होटल में खाने के लिए गए।
उसने मुझसे कहा आप आर्डर कीजिए।
मैंने कहा तुम आर्डर दो, मुझे आर्डर देना नहीं आता।
मेरी "च्वाइस" अच्छी नहीं है!!
उसने बड़े ही सहज भाव से उत्तर दिया-
मैं भी तो आपकी ही "च्वाइस" हूँ!!

सोमवार, मार्च 16, 2009

झूठा कहीं का..!

मन की इक बात

मन ही में रह जाती है...

रोज़ कहता हूँ खुद से

कि

आज कहकर ही दम लूँगा...

झूठा साबित होता हूँ

जब...

सामने तू आती है...!!!

शनिवार, फ़रवरी 28, 2009

जेहन में कौंधती एक सोच!

मैं तो लोगों के लिए

एक सीढ़ी हूँ

जिस पर पैर रखकर

उन्हें ऊपर पहुँचना है

तब सीढ़ी का क्या अधिकार

कि वह सोचे

कि किसने धीरे से पैर रखा

और कौन उसे

रौंदकर चला गया।

ऐसे जीवन से मौत भली!

हमने अपने जीवन में कई ऐसे उदाहरण देखे हैं जिनसे हमें काफी कुछ सीखने को मिलता है...
रामायण तो हम सभी ने देखी है... हाँ! ज़रूर देखी है... उसमे हमने देखा है कि श्रीराम अपने कर्मों के बल पर मर्यादापुरुषोत्तम कि उपाधी से नवाजे जाते हैं... " रघुकुल रीति सदा चली आई, प्राण जाये पर वचन न जाई! " वाली बात शायद उन्ही के जीवनकाल से चरितार्थ हुई... उन्होंने अपनी आने वाली पीढी के लिए कई मील के पत्थर स्थापित किये... और सन्देश दिया कि जिंदगी मिली है तो इसका सदुपयोग करो... मानव जीवन ऐसे ही नहीं मिलता... उसके मिलने के पीछे बहुत बड़ा उद्देश्य छिपा होता है... पिता के आदेश के पालन के लिए उन्होंने अपना जीवन बलिदान करने की ठान ली... और चल पड़े चौदह साल का बनवास काटने... एक ही पत्नी को लेकर पूरा जीवन काट दिया... पत्नी दूर हो गयी फिर भी दूसरी शादी नहीं की... भाई भी बने तो बेमिसाल... कहने का मतलब है कि उन्होंने हर क्षेत्र में मिसाल कायम किया... बचपन से लेकर जवानी के सुनहरे युग तक उन्होंने कभी अपने मन को नहीं सुना... सदा ही माता-पिता, पत्नी-भाई और प्रजा कि सुनते रहे... कभी भी अपना जीवन नहीं जिया... अपना जीवन उन्होंने दूसरों के नाम कर दिया... तभी तो इतने महान बने कि दुनिया ने उन्हें भगवान् कहना शुरू कर कर दिया... और अब तो उनकी पूजा भी होने लगी है (मैंने जब से अनुभव किया है तब की बात कर रहा हूँ, इससे पहले का मुझे नहीं पता, मैं खुद उन्हें अपना इष्ट मानता हूँ!)... इतना सब बताकर मैं ये नहीं कहना चाहता कि दुनिया हर इंसान भगवान् बनने की कोशिश में लग जाए... ऐसा कतई संभव नहीं है... प्रकृति का नियम टूट जाएगा... मेरे कहने का मतलब है कि जीवन का सदुपयोग होना चाहिए... हम सभी को अपने अन्दर छिपी शक्ति को पहचानना चाहिए...एक उदाहरण देता हूँ... आज की युवा वर्ग का (उनमे मैं खुद भी शामिल हूँ)... अक्सर ऐसा देखने में आया है कि हम युवा जितनी फिक्र अपनी गर्लफ्रेंड या पत्नी की करते हैं... उसका दस फीसदी भी अपने माता-पिता या परिवार की फिक्र करते हैं...?? शायद नही! पापा या भैया का काल यदि गर्लफ्रेंड के सामने आ जाता है तो उठाते ही नहीं... और यदि गर्लफ्रेंड ने पूरे परिवार के सामने काल किया तो उसका काल काटकर उसे कालबेक करेंगे और बड़ी ही बेशर्मी के साथ घर वालों के सामने उससे बात करने लगेंगे... क्या यह घर के संस्कारों का नतीजा है? कतई नहीं! यह हमारी दूषित मानसिकता और अपने अन्दर छिपे SplitPersonality (दोहरा स्वाभाव) को अपने पर हावी होने देने का परिणाम है... यह सब देखकर मुझे शर्म आती है कि मैं भी आज की युवा पीढी में गिना जाता हूँ... मुझे जब कोई युवा या जवान कहता है तो मुझे लगता है मानो कोई मेरे "मानव" होने का मजाक उड़ा रहा है... धिक्कार है ऐसी ज़वानी पर जो माँ की आँचल और पिता के स्नेह से विमुख होकर पत्नी या गर्लफ्रेंड की पल्लू से चिपका रहता है... धिक्कार है ऐसे जीवन पर जो भाई के प्यार को छोड़कर किसी गार्डन में एक अजनबी लड़की के कंधे पर हाथ डालकर बैठा है... छी!! क्या करना ऐसे जीवन और ऐसी जवानी का॥ जो खुद के परिवार को छोड़कर कहीं और अपना दुःख-सुख बाँट रहा है...?? अरे रामजी भी तो जवान थे... और वो तो कुछ भी कर सकते थे... राजा के बेटे थे... उनके पास अपार सम्पत्ति भी थी... पर उन्होंने हमेशा ही अपने परिवार को लेकर चलना उचित समझा... अब कुछ लोग कहेंगे कि भाई! वो तो भगवान् थे... उन्हें तो रावन का नाश करके अपना काम करना था... लीला कर रहे थे वो... ऐसा सोचने वालों को एक बात बता दूं कि वो भगवान् बनकर पैदा नहीं हुए थे... उन्होंने खुद में ऐसे गुण पैदा किये जिनसे उन्हें भगवान् कहा जाने लगा... हम भी ऐसा कर सकते है॥ पर गर्लफ्रेंड से बतियाने से फुरसत मिले तब न... मैं किसी युवा भाई पर आक्षेप नही कर रहा हूँ... अगर किसी युवा भाई को मेरे इस लेख से दुःख हो तो मैं क्षमा चाहूँगा... मैं तमाम युवा बंधुओं से गुजारिश करूंगा की मेरे प्यारे! भाइयो गर्लफ्रेंड के बीस मिनट के प्यार के लिए माँ की बीस साल की ममता को मत ठुकराओ... अगर अपनी माँ, अपने पिता को ही नहीं मानोगे तो ऐसे जीवन का करना ही क्या..??
ऐसे जीवन से मौत ही भली...!!!

एक बात समझ लो दोस्तों
" माता-पिता के अलावा;
न माया चाहिये;
न काया चाहिये;
हमें तो बस माँ का साया चाहिये॥
न इज्जत न शोहरत
न कुछ और चाहिए॥
हमें तो बस माँ की
आँचल का छाया चाहिए॥"

रविवार, फ़रवरी 22, 2009

सोचता हूँ, सोचना अब बंद ही कर दूं!

इंसान की जिंदगी में कई बार ऐसे पल आते हैं, जब उसे काफी कुछ सोचना पड़ता है... यहाँ तक कि वह खुद को भूल जाता है... यकीन मानिए ऐसा होता है... ऐसा वाकई होता है...वह इतना सोचता है कि सोचने के अलावा उसके पास कोई और रास्ता ही नहीं होता...कभी सोचता है कि मैं क्या सोच रहा हूँ, कभी सोचता है कि मैं इतना क्यों सोचता हूँ...और कभी वह सोचता है कि मुझे क्या सोचना है॥? किसके बारे में सोचना है..?और इन्ही सब के चलते उसकी सोच ही बदल जाती है... कभी-कभी तो वह सोचने में इतना मशगूल हो जाता है कि सोचना ही भूल जाता है...इसे मानवीय प्रकृति कहते हैं... वैसे ऐसा हर किसी के साथ नहीं होता...ऐसा उनके साथ होता है जो सोचना जानते हैं... ऐसा एक जीता जागता उदाहरण भी मैंने देखा है...मेरे बड़े भाई के रूप में... वैसे उनको "बड़ा भाई" इसलिए कहा रहा हूँ क्योंकि उनका परिचय देने के लिए कोई न कोई संबोधन तो देना ही पड़ेगा... और उनको "बड़ा भाई" कहने में मैं फक्र महसूस करता हूँ... अगर उनको मैं अपना खुदा कहूं तो अतिसंयोक्ति नहीं होगी... वो वाकई में मेरे लिए किसी खुदा से कम नहीं हैं... कहते हैं न कि "खुदा" हमेशा अपने बन्दों के लिए "खुद" से ज्यादा सोचते हैं... उन्होंने हमेशा अपने छोटे भाई किशन (वो मुझे प्यार से किशन कहते हैं) के लिए खुद से कहीं ज्यादा सोचा है और किया है... पर मेरे खुदा कि एक बात मुझे ठीक नहीं लगती..! उनका मेरे बारे में इतना ज्यादा सोचना! जब वो भोजन करते हैं तो सोचते हैं कि मेरे किशन ने भोजन किया होगा कि नहीं..? वो कहीं भूखा तो नहीं होगा..? जब वो सोते हैं तो सोचते हैं कि मेरा किशन अभी भी अपने ऑफिस में काम पर लगा होगा... जब वो कहीं घुमते हैं तो सोचते हैं कि मेरे किशन के क्या हाल होंगे..? मैं जब उनके पास होता हूँ तो मुझे हमेशा एक पिता कि तरह समझाते हैं... वो मुझे हमेशा मार्गदर्शित करते हैं... मेरे भैया दिल्ली में हैं और वो "आईएएस" के मेन एग्जाम की तयारी कर रहे हैं... मैंने अपने जीवन में उनकी तरह महत्वकांक्षी व्यक्ति नहीं देखा..! सच कहता हूँ... नहीं देखा... वो मुझे बहुत प्यार करते हैं... ये केवल कहने की बात नहीं... सच में ऐसा ही है...वो मेरे बारे में इतना सोचते हैं... ये मेरे लिए बहुत ही सौभग्य की बात है... अब मैं भी सोचने लगा हूँ... मैं सोचता हूँ की जब वो मेरे बारे में इतना सोचता हैं तो मुझे किसी के बारे में सोचने की कोई ज़रुरत नहीं है... "सोचता हूँ सोचना अब बंद ही कर दूं!"

शनिवार, फ़रवरी 21, 2009

जिंदगी, जिंदगी!!

  • "जिंदगी!" सुनने में यह शब्द बहुत ही कर्णप्रिय लगता है,
  • पर कभी सोचा है की ये "जिंदगी" है क्या..?
  • किसे कहते है "जिंदगी"..?
  • हाँ! पहले कुछ बुद्धिजीविओं की इसके बारे में परिभाषाएं
  • ज़रूर पढ़ी है... उनके मुताबिक "जिंदगी" एक संघर्ष है...
  • "जिंदगी" कुछ कर दिखने का नाम है...
  • "जिंदगी" खुलकर जीने को कहते हैं... वगैरह, वगैरह!
  • पर सही मायनों में "जिंदगी" की परिभाषा इनमे से कुछ भी नही है...
  • ये मैं नही कह रहा हूँ और न ही इतनी बड़ी बात कहने की मुझमे क्षमता है,
  • ये मेरा अब तक का निष्कर्ष कहता है!
  • मैंने अपनी बाईससाल की "जिंदगी" में ऐसे कई उदाहरण देखे हैं॥
  • जिनसे मैने यह निष्कर्ष निकाला है! वैसे इस निष्कर्ष के बाद भी मुझे कई ऐसे
  • उदाहरण देखने को मिले हैं, जिनसे मैं एक और निष्कर्ष पर पहुँचा!
  • और वो यह है "जिंदगी" न तो कोई जंग है और ही कोई संघर्ष!
  • "जिंदगी" एक कहानी है और हम उसके पात्र ! कोई माँ के किरदार में है
  • तो कोई पिता के, कोई भाई बना है तो कोई दोस्त!
  • किसी ने पत्नी की भूमिका में है तो कोई बेटा या बेटी के रोल में!
  • सबके डायलौग भी फिक्स हैं!
  • जिसे विलेन का किरदार मिला है उसका संवाद निगेटिव है और जो हीरो है या
  • हीरो के सहायक हैं उनका संवाद ऐसा है जो दर्शकों को पसंद आए!
  • बाकि सब तो ठीक है पर दर्शक कौन हैं...?
  • दर्शक! दर्शक भी हम में से ही होते हैं...
  • कुछ दर्शक हीरो के पक्ष में होते हैं तो कुछ विलेन के!
  • कहानी चलती रहती है और एक वक्त ऐसा आता है जब कहानी अपने अन्तिम
  • स्टेप की ओर यानी पूर्णता की ओर अग्रसर होती है...
  • अब शुरू होता है कहानी का क्लाईमेक्स...
  • बेटे को पिता की याद आती है... माँ अपने बेटे को पहचानती है और
  • पत्नी को पति की याद आती है...
  • बस! इन्ही सारी बातों के इर्द-गिर्द घूमती "जिंदगी" की कहानी ख़त्म हो जाती है...
  • और फ़िर शुरू होता है एक नया अध्याय "जिंदगी" का...!!!

रविवार, फ़रवरी 15, 2009

जीवन की आपाधापी में!!

जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला,
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला,
जिस दिन मेरी चेतना जगी मैंने देखा
मैं खड़ा हुआ हूँ इस दुनिया के मेले में,
हर एक यहाँ पर एक भुलाने में भूला
हर एक लगा है अपनी अपनी दे-ले में,
कुछ देर रहा हक्का-बक्का, भौचक्का-सा
आ गया कहाँ, क्या करूँ यहाँ, जाऊँ किस जा?
फिर एक तरफ से आया ही तो धक्का-सा
मैंने भी बहना शुरू किया उस रेले में,
क्या बाहर की ठेला-पेली ही कुछ कम थी,
जो भीतर भी भावों का ऊहापोह मचा,
जो किया, उसी को करने की मजबूरी थी,
जो कहा, वही मन के अंदर से उबल चला,
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।
मेला जितना भड़कीला रंग-रंगीला था,
मानस के अन्दर उतनी ही कमज़ोरी थी,
जितना ज़्यादा संचित करने की ख़्वाहिश थी,
उतनी ही छोटी अपने कर की झोरी थी,
जितनी ही बिरमे रहने की थी अभिलाषा,
उतना ही रेले तेज ढकेले जाते थे,
क्रय-विक्रय तो ठण्ढे दिल से हो सकता है,
यह तो भागा-भागी की छीना-छोरी थी;
अब मुझसे पूछा जाता है क्या बतलाऊँ
क्या मान अकिंचन बिखराता पथ पर आया,
वह कौन रतन अनमोल मिला ऐसा मुझको,
जिस पर अपना मन प्राण निछावर कर आया,
यह थी तकदीरी बात मुझे गुण दोष न दो
जिसको समझा था सोना, वह मिट्टी निकली,
जिसको समझा था आँसू, वह मोती निकला।
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।
मैं कितना ही भूलूँ, भटकूँ या भरमाऊँ,
है एक कहीं मंज़िल जो मुझे बुलाती है,
कितने ही मेरे पाँव पड़े ऊँचे-नीचे,
प्रतिपल वह मेरे पास चली ही आती है,
मुझ पर विधि का आभार बहुत-सी बातों का।
पर मैं कृतज्ञ उसका इस पर सबसे ज़्यादा
नभ ओले बरसाए, धरती शोले उगले,
अनवरत समय की चक्की चलती जाती है,
मैं जहाँ खड़ा था कल उस थल पर आज नहीं,
कल इसी जगह पर पाना मुझको मुश्किल है,
ले मापदंड जिसको परिवर्तित कर देतीं
केवल छूकर ही देश-काल की सीमाएँ
जग दे मुझ पर फैसला उसे जैसा भाए
लेकिन मैं तो बेरोक सफ़र में जीवन के
इस एक और पहलू से होकर निकल चला।
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।
♥♪ रचनाकार - डॉक्टर हरिवंश राय बच्चन

शुक्रवार, फ़रवरी 13, 2009

राम की राह पर चलें या कृष्ण की राह पर..??


साभार - नीरेंद्र नागर

हिंदू माइथॉलजी में जो दो प्रधान नायक हैं - राम और कृष्ण - उनमें दो मामलों के अलावा एक खास फ़र्क है प्रेम के मामले में उनका रवैया। इस मुद्दे पर दोनों में इतना ज़्यादा अंतर है कि हैरत होती है यह सोचकर करोड़ों हिंदू इन दोनों को एकसाथ कैसे स्वीकार कर पा रहे हैं! राम एकनिष्ठ हैं। सीता के अलावा वह किसी और नारी की ओर नज़र भी नहीं उठाते। सीता का त्याग करने के बाद उन्होंने किसी और से शादी नहीं की और वाल्मीकि रामायण में वर्णन है कि सीता के विरह में उन्होंने कितना कष्ट उठाया। दूसरी तरफ कृष्ण के बारे में माना जाता है कि उनकी 16 हज़ार रानियां थीं और 8 पटरानियां। राधा जो उनकी मामी लगती थीं और जिनसे उनका विशिष्ट प्रेम संबंध था , वह इनसे अलग थीं। अगर यह मान भी लिया जाए कि 16 हज़ार का आंकड़ा कुछ ज़्यादा ही है और कपिल देव की भाषा में यह बात कुछ हज़म नहीं होती , तब भी यह तो कहा ही जा सकता है कि प्रेम के मामले में कृष्ण एक से बंधे नहीं रहे।
इन दोनों नायकों के परस्परविरोधी चरित्रों को एक ही मानने और समझाने की आध्यात्मिक कोशिशों से बचते हुए हम यहां एक ही सवाल करेंगे - क्या राम की एकनिष्ठता ही हर प्रेमी का आदर्श होना चाहिए ? दूसरे शब्दों में वही सवाल - क्या कृष्ण का कई स्त्रियों से प्रेम उनके प्यार को छिछला बना देता है ? इन प्रश्नों का आध्यात्मिक उत्तर हम नहीं खोजेंगे क्योंकि अवतारों का चरित्र विश्लेषण यहां हमारा मकसद नहीं है। कसौटी पर है हमारा मन जो राम को आदर्श और कृष्ण के यथार्थ के बीच झूलता रहता है। आगे बढ़ने से पहले हम एक सवाल का जवाब दे दें। क्या मनुष्य स्वभाव से एकनिष्ठ है ? नहीं है। क्यों नहीं है ? इसलिए नहीं है कि कोई भी इंसान पर्फेक्ट नहीं है। ऐसा कोई नहीं है कि उसमें दुनिया के सारे गुण हों - न आप ऐसे हैं न मैं न कोई और। एक व्यक्ति में कुछ गुण है तो दूसरे में कोई और गुण हैं। इसलिए आपको कभी कोई अच्छा लगता है तो कभी कोई और और इस तरह आप एकसाथ या एक के बाद एक कई लोगों से प्यार करते हैं। हां , यह सही है कि इन सभी से प्यार एक जैसी गहराई से नहीं होता और यह भी मुमकिन हो कि कोई प्रेम संबंध एक पल का हो और कोई उम्र भर का। यह निर्भर करता है उस व्यक्ति के रिस्पॉन्स पर जिसे आप प्यार करते हैं। अगर उसकी प्रतिक्रिया पॉज़िटिव रही तो प्यार परवान चढ़ता है वरना धीरे-धीरे खत्म हो जाता है।
क्यों होता है प्यार ...?
प्रेम आम तौर पर पांच कारणों से होता है - रूप , व्यवहार , गुण , साथ और ***! सभी आपको सुख देते हैं। एक सुंदर चेहरा या बदन आंखों को सुख देता है। कोई अगर कटरीना कैफ का फैन है और उसकी तस्वीरें दीवारों पर लगाता है तो उसका कारण यही है कि कटरीना का सुंदर चेहरा उसे सुख देता है। वह जवाब में कटरीना से डायरेक्टली कुछ नहीं पा रहा , यह अलग बात है लेकिन वह जो दीवानगी शो कर रहा है , वह एक तरह का प्यार ही है। ऑफिस में कुछ शक्लें हमें अच्छी लगती हैं तो इसका मतलब यह कि आप शक्ल के कारण उस व्यक्ति से प्यार करते हैं। इसी तरह राह चलते भी हमें कोई सूरत भली लग जाती है। यह एक लम्हे का प्यार है। अच्छे व्यवहार के कारण भी कोई एक या कई लोग आपको प्यारे लग सकते हैं। आप अपने पति या पत्नी से कितने ही संतुष्ट क्यों न हों लेकिन अगर दफ्तर में कोई कॉलीग आपको बिना किसी स्वार्थ के लंच टाइम में पराठा या इडली शेयर करने का ऑफर दे तो उसके व्यवहार के आकर्षण को आप किस तरह नकार पाएंगे ? उसका ऑफर बताता है कि उसे आपका साथ प्रिय है , वह आपको खुश करना चाहता/चाहती है , और इसीलिए वह आपको कुछ दे रहा/रही है।
अब अगर आप भी एक सेंसिटिव व्यक्ति हैं तो आप भी उसे कुछ देंगे ही। यह देना एक कप स्पेशल चाय के रूप में हो सकता है। लेकिन एक बात यहां ध्यान देने की है - अगर यह देना सिर्फ कर्ज़ उतारने के लिए है तो यह एक सौदा होगा। परंतु यदि आप उसकी भावना की कद्र करते हुए उसे चाय पर बुलाते हैं तो आप मानें या न मानें , आपको उससे प्यार हो गया है। गुण की वजह से भी प्यार हो सकता है बशर्ते आपको उस गुण की कद्र हो। और अगर वह गुण ऐसा हो जो आपके जीवनसाथी में नहीं है तो यह बहुत ही तगड़ा आधार बन सकता है एक्स्ट्रा-मैरिटल प्रेम का। किसी का पति अगर रात को शराब पीकर आता हो , गाली-गलौज करता हो , पत्नी और बच्चों को पीटता हो , तो वह परेशान स्त्री पड़ोस में रहनेवाले उस सज्जन पुरुष को क्यों नहीं सराहेगी जो वक्त पर घर आता हो और पत्नी और बच्चों के साथ घूमने निकलता हो ! साथ रहने से भी आत्मीयता पैदा होती है। शादी के बाद साथ रहते-रहते जो प्रेम उत्पन्न होता है , उसका एक बड़ा कारण साथ रहना भी है। वैसे साथ रहना जहां प्रेम को जन्म देता है , वहीं वह रिश्ते में उकताहट का कारण भी है। प्रेम इस वजह से कि बहुत-कुछ मिल रहा है और बोरियत इस वजह से कि नया कुछ नहीं मिल रहा है। *** के कारण आकर्षण के बारे में ज़्यादा कुछ कहने की ज़रूरत नहीं है। यह ज़्यादा तीव्र होता है क्योंकि इसके साथ बायलॉजिकल कारण जुड़े रहते हैं। लेकिन इसे हम केवल देह का मामला नहीं मान सकते। यह पूरी तरह व्यक्ति से जुड़ा है वरना इंसान प्रेम किसी से करता , *** किसी और से। ऐसा अक्सर नहीं होता। और जहां होता है , वहां हम इसे प्यार नहीं मानते। किसी में नहीं हैं सारी खासियतें प्रेम इन पांच में से किसी एक या एक से ज़्यादा कारणों से हो सकता है। किसी से हम व्यवहार के कारण प्यार कर सकते हैं तो किसी से गुणों के कारण और किसी से रूप के कारण। किसी में गुण और व्यवहार दोनों ही प्यार का कारण बन सकते हैं। लेकिन ये सारे प्यार कितने टिकाऊ होंगे , यह इस पर भी निर्भर करता है कि जिसे या जिन्हें आप प्यार करते हैं , उसे या उन्हें आपमें प्यार करने के कौनसे और कितने कारण मिलते हैं। जैसे आपको कोई किसी कारण अच्छा लग सकता है लेकिन यह भी तो ज़रूरी है कि उसे या उन्हें भी आप अच्छे / अच्छी लगें। तभी मामला जमता है वरना एकतरफा प्यार ज़्यादा दिन नहीं चलता और वह किसी और विकल्प ढूंढने में लग जाता है। कॉलीग के लंच शेयर करने का उदाहरण फिर उठाते हैं। अगर वह सहकर्मी अगले दिन किसी और के सामने वही प्रस्ताव करे तो आपका यह भ्रम टूटता है कि उसे आपका ही साथ प्रिय था। पता चलता है कि उसे साथ देने के लिए कोई व्यक्ति चाहिए था - कल आप थे , आज कोई और है। यानी उसने अपनी ज़रूरत पूरी की।
ऐसे में आप (1) किसी और टिफिन शेयर करनेवाले / वाली को ढूंढें , ( 2) अपने कॉम्पिटिटर्स से जलते रहें , ( 3) यह मान ले कि वह प्रेम करने योग्य है ही नहीं क्योंकि उसका यह व्यवहार एक्सक्लूसिवली आपके लिए नहीं है। प्रेम के लिए ज़रूरी है यह एहसास कि मुझमें कुछ खूबियां हैं जिसके कारण लाखों की भीड़ में मुझे चाहा जा रहा है। लेकिन गड़बड़ी यहीं से शुरू होती है। इंसान यह नहीं सोचता कि उसमें कुछ खासियतें हैं न कि सभी खासियतें। किसी एक खासियत के चलते यदि आपसे प्रेम किया जा सकता है तो किसी और खासियत के कारण किसी और से भी। एक लड़की एक साथ दो या तीन लड़कों से प्रेम कर सकती है अगर उसे उन तीनों के प्यार करने लायक अलग-अलग खूबियां मिलें। अगर वह लड़की भी उन तीनों से बराबर प्यार पाए तो उससे सुखी इंसान दुनिया में कोई नहीं है। लेकिन वे तीनों लड़के जो उस लड़की को प्यार कर रहे हैं , उसका पूरा प्यार नहीं पा रहे और यही उनकी ईर्ष्या का कारण बनाता है। एक से ज़्यादा लोगों से प्रेम के मामले में दिक्कत यह है कि यह गणित के नियम को मानता है। प्रेम ज्ञान की तरह बांटने से बढ़ता नहीं। यहा जितना बांटो , उतना घटेगा वाला नियम चलता है।
क्या प्यार मापने का कोई पैमाना है ? प्यार बंटने का मतलब क्या है ? क्या कोई ऐसा पैमाना है जिससे प्यार को मापा जा सके ? बिल्कुल है। और वह यह कि जो कुछ आपके पास है , उसका कितना हिस्सा आप अपने प्रिय को देने के लिए तैयार हैं। जैसे आपके पास 24 घंटे हैं - इनमें से कितने घंटे या मिनट आप अपने प्रिय के बारे में सोचने में खर्च करते हैं या कितना वक्त उसके साथ गुज़ारते हैं या गुज़ारने को तैयार हैं। आपके पास पैसा है - उसका कितना हिस्सा बिना किसी टेंशन के उसके लिए खर्च करने को तैयार हैं। आपका समाज में नाम है , इज़्ज़त है - आप अपने लवर के लिए किस हद तक उस इज़्ज़त को दांव पर लगाने को तैयार हो जाता हैं। जब आपका प्यार बंटता है तो कहने का मतलब यही है कि आपका वक्त बंटता है , आपका खर्च बंटता है , आपकी चिंताएं बंटती हैं। यदि आप किसी एक से ही प्यार करते हैं तो अपने वक्त , दौलत , चिंता का सारा खज़ाना उसी एक पर उड़ेल देते हैं। यदि आप दो या तीन लोगों से प्यार करते हैं तो सभी के हिस्से में आपका थोड़ा-थोड़ा वक्त , दौलत और चिंता आएगी। इसी कारण ऐसे रिश्ते गड़बड़ा जाते हैं जहां किसी रिलेशनशिप में पार्टनर A एकाधिक प्रेम का कृष्ण सिद्धांत अपना रहा है और पार्टनर B एकनिष्ठता का राम सिद्धांत। क्योंकि पार्टनर A - B और C का पूरा-पूरा प्यार पा रहा है लेकिन B और C को A का आधा-आधा प्यार ही मिल रहा है। मैथ की भाषा में A 100 यूनिट प्यार बांट कर 200 यूनिट प्यार पा रहा है जबकि B और C 100-100 यूनिट प्यार देकर 50-50 यूनिट प्यार पा रहे हैं। साफ है कि एक ही व्यक्ति को अपना सारा प्यार देनेवाले घाटे में रहे। अगर B और C भी A के अलावा किसी D या E से प्यार करते तो उनके जीवन में यह कमी नहीं रहती।
इस गड़बड़ी को आम घर-परिवार के खांचे में भी समझा जा सकता है जहां नई बहू आई है। पति अपनी मां , भाई , बहन , पिता आदि सबसे प्रेम करता है इसलिए पत्नी के हिस्से में पति का सेंट-परसेंट प्यार नहीं आता। दूसरी ओर पत्नी अपना सौ फीसदी प्यार पति पर ही बरसाती है क्योंकि घर के बाकी लोगों से उसके आत्मीय संबंध इतनी जल्दी पनप नहीं सकते। ऐसे में पत्नी घाटे में रहती है और वह पति से शिकायत भी करती रहती है कि जितना प्यार वह पति से करती है , उतना वह पा नहीं रही। दूसरी ओर अगर पति अपना सारा प्यार (चिंता , पैसा , वक्त) पत्नी पर ही निछावर कर दे तो मां , बहन , भाई और पिता को प्रॉब्लम होने लगती है क्योंकि उनके हिस्से का प्यार (चिंता , पैसा , वक्त) कम हो गया। इसी कारण संयुक्त परिवार में नई बहू के आते ही टेंशन उत्पन्न होने लगता है। लैला को भुलाया जा सकता है बशर्ते ... एकाधिक प्यार की थियरी से ही निकलता है सही विकल्प का सिद्धांत। इसे समझने के लिए एक उदाहरण की मदद लें। आपको पुलाव पसंद है लेकिन किसी कारण वह आपको नहीं मिल सकता। तो आप क्या करेंगे - परांठे खा लेंगे बशर्ते परांठों से आपको परहेज़ नहीं है। ज़्यादा भूख लगी हो तो परहेज़ को भी तोड़ देंगे या फुल्के खा लेंगे। प्रेम के मामले में भी ऐसा ही है। जिससे प्रेम हो , उसी स्तर का व्यक्ति अगर मिल जाए तो पहलेवाले को भूला जा सकता है। बल्कि उससे कम स्तर का व्यक्ति भी मिले तो उसे चाहा जा सकता है जैसे पुलाव की जगह रोटी से भूख मिटाई जा सकती है। चूंकि प्रेम एक भावना है जो ‘ कोई मेरा और मैं किसी का / की ’ का एहसास कराती है , इसलिए कोई और किसी का रूप बदलने से भावना नहीं बदलती - उसी तरह जैसे एक ही क्वॉलिटी के खाने के आयटम बदलने से भूख का चरित्र और स्वाद का आनंद नहीं बदलता।
प्रेम भी मानसिक भूख ही है। हां , अगर जिसे खोया और जिसे पाया , उन दोनों में स्तर का फर्क हो तो एक अभाव रह जाता है। जैसे एक युवक किसी सुंदर लड़की से प्यार करता था जिसे वह नहीं पा सका। उस लड़की में बाकी जो गुण थे , वे किसी और लड़की में भी थे , बस वह उतनी सुंदर नहीं थी। ऐसे में दूसरी लड़की से शादी करके वह खुश तो रहेगा लेकिन सुंदरता की चाहत पूरी न होने के कारण उसके मन में एक अभाव रहेगा। उस अभाव को पूरा करने के लिए वह आसपास की सुंदर शक्लों को देखकर अपनी प्यास बुझाएगा। कहने का मतलब यह कि अगर मजनूं को लैला जैसी या उससे कमतर प्रेमिका मिल जाती जो उससे उतना ही प्यार करती जितना लैला करती थी तो मजनूं लैला के बगैर भी जी लेता , और उतने ही सुख से जीता।

रविवार, जनवरी 25, 2009

मौत से ठन गई!

कहते हैं न कि ℓιƒє ιѕ тнє ρєямιѕѕιση тσ кησω ∂єαтн●•∙
बस... यही सोचते-सोचते एक दिन मैं मौत को ढूँढने चल पड़ा,
कि अचानक मुझे पंडित अटल बिहारी बाजपेयी जी की ये
कविता मिल गई और मैं बिना देर लगाए
इसे अपने ब्लॉग में समा बैठा!
आप भी पढ़ें और देखें किइन पंक्तियों में
कितनी सत्यता और सार्थकता है...

ठन गई! मौत से ठन गई!
जूझने का मेरा इरादा न था,
किसी मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था,
रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई,
यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई।
मौत की उमर क्या है?
दो पल भी नहीं,
ज़िन्दगी सिलसिला,
आज कल की नहीं।
मैं जी भर जिया,
मैं मन से मरूँ,
लौटकर आऊँगा,
कूच से क्यों डरूँ?
तू दबे पाँव,
चोरी-छिपे से न आ,
सामने वार कर फिर मुझे आज़मा।
मौत से बेख़बर,
ज़िन्दगी का सफ़र,
शाम हर सुरमई,
रात बंसी का स्वर।
बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं,
दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं।
प्यार इतना परायों से मुझको मिला,
न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला।
हर चुनौती से दो हाथ मैंने किये,
आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए।
आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है,
नाव भँवरों की बाँहों में मेहमान है।
पार पाने का क़ायम मगर हौसला,
देख तेवर तूफ़ाँ का,
तेवरी तन गई।
मौत से ठन गयी!! मौत से ठन गयी!!

देश की तस्वीर इनकी नज़र में...

साभार:-गायत्री शर्मा
वर्ष 2008 देश के लिए एक ऐसा निर्णायक वर्ष रहा, जब देश ने कई आतंकवादी धमाकों व राजनीतिक उलटफेर के रूप में कई आघात सहे परंतु इतने पर भी यह देश अपने संस्कारों व अपने जज्बे के कारण उसी हौसले से खड़ा रहा। इस दौर ने देश को जनतंत्र की एक ऐसी आवाज दी, जो शायद कहीं गुम हो चुकी थी। हर व्यक्ति ऊँच-नीच, जाति-पाति के भेदभाव को भुलाकर केवल और केवल अपने देश के बारे में सोच रहा था। इन धमाकों में हमने बहुत कुछ खोया परंतु जो पाया वह शायद खरे सोने के समान शुद्ध था और वह था देशप्रेम का जज्बा, जो हर भारतीय को अपने देश के लिए कुछ कर गुजरने को झकझोर रहा था। यदि हम इस वर्ष के मुद्दों की बात करें तो इस वर्ष आतंकवाद, आसमान छूती महँगाई, शेयर बाजार की गिरावट व भ्रष्ट राजनीति बहस का मुद्दा बनकर सुर्खियों में छाए रहे। वहीं दूसरी ओर देश की लाज बचाई उन जाँबाजों, धुरंदर खिलाडि़यों तथा कलाकारों ने दुनिया के नक्शे पर भार‍त का नाम रोशन किया। इन सभी ज्वलंत मुद्दों के संदर्भ में हमने 'वर्ष 2008 का आकलन' विषय पर देश की कुछ ख्यातनाम हस्तियों से चर्चा की तो उनका इस विषय में ये कहना था -
वर्तिका नंदा (देश की प्रख्यात युवा पत्रकार) :- मैं मानती हूँ कि हमारे देश के लिए यह वर्ष खट्टा-मीठा और नासमझीभरा रहा। इस वर्ष चर्चा का विषय बने 'आतंकवाद' ने जहाँ लोगों को संगठित होने की शिक्षा दी, वहीं आतंकवादियों के खात्मे ने हमारे होंठों पर जीत की खुशी भी दर्ज कराई। इन हमलों के पूर्व देश में जो सांप्रदायिक मतभेद गहराने लगा था वह सभी आतंकवाद की आड़ में गुम हो गया। लोगों का विरोध खुलकर सामने आया। इन हमलों में किसी हिन्दू या मुस्लिम को चुनकर नहीं मारा गया, बल्कि आम भारतीय को मारा गया। इस वर्ष की एक बहुत अच्छी उपलब्धि यह रही कि कल तक आमजन का पुलिस पर से जो विश्वास उठ गया था तथा जिस खाकी वर्दी को सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा जाता था, अब वह कौम सम्मान की अधिकारी बन गई है। आज मुसीबत के वक्त यही पुलिसकर्मी हमारे काम आए न कि कोई राजनेता। मेरे अनुसार पिछले बीस-बाईस सालों में पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था कि जनता ने सार्वजनिक स्थानों पर खुलकर विरोध प्रदर्शन किया हो। इस वर्ष पहली बार लोगों ने सिरफिरे राजनेताओं को सबक सिखाया। जिस तरह से इन धमाकों में हमारे पुलिस के कई जवान मारे गए, वह बेहद ही दु:ख की बात है। हेमंत करकरे की पत्नी का मीडिया को दिया गया बयान हो या उन्नीकृष्णन के पिता का मुख्यमंत्री को जवाब देने का ढंग, सभी हमारी सच्चाई व ताकत के परिचायक हैं। इस वर्ष की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि इस वर्ष हमने सच को कहना, अपनी गलती स्वीकारना व अपना पक्ष रखना सीखा।
पिछले बीस-बाईस सालों में पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था कि जनता ने सार्वजनिक स्थानों पर खुलकर विरोध प्रदर्शन किया हो। इस वर्ष पहली बार लोगों ने सिरफिरे राजनेताओं को सबक सिखाया।
कुलदीप नैयर (देश के जाने-माने स्तंभकार) :- 'मैं मानता हूँ कि वर्ष 2008 देश के लिए अच्छा रहा। इस वर्ष हमें चुनौतियाँ मिलीं, जिनसे हमने बहुत कुछ सीखा। यह इसी सीख का परिणाम था कि बहुत सालों बाद सार्वजनिक स्थानों पर देशवासियों की एकता देखने को मिली। मैं बहुत अरसे से कोशिश कर रहा हूँ कि भारत और पाकिस्तान के संबंधों में सुधार आए। अब तक इस संबंध में जो भी कोशिशें की गई थीं, इन धमाकों ने उन सब कोशिशों पर पानी फेर दिया। मुझे इस वर्ष एक रिपोर्ट पढ़कर बहुत बुरा लगा कि आज भी देश में गरीबी और महँगाई व्याप्त है। आज भी हमारे देश के 77 प्रतिशत लोग केवल 2 डॉलर पर जीते हैं। आखिर हमें इस गरीबी व महँगाई से कब मुक्ति मिलेगी?
चित्रा मुद्‍गल (देश की ख्यातनाम लेखिका व समाजसेविका) :- मैं हर चीज को बड़ी ही सकारात्मक दृष्टि से देखती हूँ। आतंकवाद एक चुनौती थी, जिसे इस देश के जनतंत्र ने बड़े ही साहसिक रूप में लिया है। मैं आतंकवाद से भी काफी बड़ी चुनौती महँगाई को मानती हूँ क्योंकि पेट की भूख हर किसी को सताती है तथा इस भूख ने इस बार भी कई लोगों को मौत की नींद सुला दिया। आज भी आलू इस देश में बड़ी मात्रा में पैदा होता है परंतु यहीं पर यह आलू 5 रुपए किलो बिकने के बजाय 15 से 20 रुपए किलो के महँगे दामों पर बिकता है, आखिर क्यों? आखिर क्यों सरकार इसके लिए कोई गाइड लाइन तय नहीं करती?
आज जिस तरह से समाज व देश में असंतुलन की स्थिति है वह बेहद ही चिंताजनक है क्योंकि किसी भी प्रकार का असंतुलन होने पर हम कभी किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पाएँगे।
मुझे लगता है कि यदि सरकार दामों के संबंध में एक गाइड लाइन तय कर दे तो शायद इस आसमान छूती महँगाई पर कुछ हद तक अंकुश लग सकता है। बचपन में हमने स्कूल में पढ़ा था कि भारत एक कृषिप्रधान देश है तब हमने यह नहीं सोचा था कि कल को यहाँ की ही जनता में अनाज के लिए त्राहि-त्राहि मचेगी। आज हमारे देश का माल देश में कम तथा विदेशों में अधिक बेचा जाता है। आज अमीर हो या गरीब हर व्यक्ति अपने पेट की भूख को शांत करने के लिए कमाता है। सरकार को चाहिए कि वह इस दिन-ब-दिन बढ़ती महँगाई पर अंकुश लगाए और देश को विकास की चरम सीमा पर ले जाए। आज महँगाई का तेजी से बढ़ना व नागरिक सुरक्षा के औसत का घटना बेहद ही चिंताजनक विषय है। यह देश हम सभी का है। यह किसी हिन्दू या मुस्लिम का नहीं है। वर्तमान में तुष्टीकरण को लेकर जो भी असंतोष उभर रहा है वह गुब्बारे में सूई की तरह चुभ रहा है। वर्तमान में देश की कानून-व्यवस्था बिगड़ने के जिम्मेदार केवल और केवल इस देश के राजनेता हैं, जो सत्ता की शह और मात में देशवासियों की मासूम जिंदगियों से खेल रहे हैं।
शोवना नारायणन (देश की मशहूर कथक नृत्यांगना) :- हर वर्ष चुनौतियों को लेकर लाता है। वर्ष 2008 भी चुनौतियों से ही भरा था। आज व्यक्ति सोचने पर मजबूर है कि इस देश में आखिर ये क्या हो रहा है? आखिर हम क्या चाह रहे हैं? अब हर व्यक्ति को गंभीरता से इस बारे में सोचना ही होगा क्योंकि व्यक्ति से ही समाज बनता है और समाज से ही कोई देश बनता है। आज जिस तरह से समाज व देश में असंतुलन की स्थिति है वह बेहद ही चिंताजनक है क्योंकि किसी भी प्रकार का असंतुलन होने पर हम कभी किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पाएँगे। निष्कर्ष के रूप में कहा जाए तो अब हमें गंभीरता से यह सोचना चाहिए कि हमें किस राह पर चलना है। हमें मुश्किलों का बहुत ही संजीदा ढंग से हल निकालकर उसका सामना करना चाहिए। मुश्किलें तो आती रहेंगी, उनसे घबराना कायरता होगी। आज हम सभी को इंसानियत व इस देश के बारे में सोचना होगा।

रामकृष्ण गौतम (एक अदना सा युवक) :- देश की असली तस्वीर देश के प्रधानमंत्री "मनमोहन सिंह" की "बाइपास सर्जरी" है...!!!

गुरुवार, जनवरी 22, 2009

मेरी नज़र में तमन्ना!



मेरी नज़र में तमन्ना का मतलब है एक ही दिन में आकाश छू लेने की चाहत! इससे दो फायदे हैं... एक ये कि हमें आकाश कि ऊँचाई का एहसास हो जाएगा और दूसरा हमें ख़ुद कि "औकात" भी मालूम हो जाएगी... वैसे दूसरा फायदा ज़्यादा अच्छा है... क्योंकि स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि "सबसे बड़ा ज्ञानीवही है जो ख़ुद को जानता है" सच है ख़ुद को जानना ही "तमन्ना" कि असली पहचान है...



विकसित देशों की पहचान!


(1) गुरु : विकसित देश की पहचान बताओ राम ।
राम : विकसित देश कपड़ा नहीं बनाते गुरुदेव।
गुरु : तब वे क्या बनाते हैं?
राम : वे हथियार बनाते हैं।
गुरु : तब वे अपना नंगापन कैसे ढकते हैं?
राम : हथियारों से उनकी नंगई ढक जाती है।

(2) गुरु : विकसित देश की पहचान बताओ राम ।
राम : विकसित देश में लोग खाना नहीं पकाते।
गुरु : तब वे क्या खाते हैं?
राम : वे 'फास्ट फूड` खाते हैं।
गुरु : हमारे खाने और 'फास्ट फूड` में क्या अंतर है।
राम : हम खाने के पास जाते हैं और 'फास्टर फूड` खाने वाले के पास दौड़ता हुआ आता है।

(3) गुरु : राम विकसित देश की पहचान बताओ।
राम : विकसित देशों में बच्चे नहीं पैदा होते।
गुरु : तब कहां कौन पैदा होते हैं?
राम : वहां जवान लोग पैदा होते हैं जो पैदा होते ही काम करना शुरू कर देते हैं।

(4) गुरु : विकसित देश की पहचान बताओ राम ।
राम : विकसित देशों में सच्चा लोकतंत्र है।
गुरु : कैसे हरिराम?
राम : क्योंकि वहां केवल दो राजनैतिक दल होते हैं।
गुरु : तीसरा क्यों नहीं होता?
राम : तीसरा होने से सच्चा लोकतंत्र समाप्त हो जाता है।

(5) गुरु : विकसित देश की पहचान बताओ राम ।
राम : विकसित देशों में आदमी जानवरों से बड़ा प्यार करते हैं।
गुरु : क्यों?
राम : क्योंकि जानवर आदमियों से बड़ा प्यार करते हैं।
गुरु : क्यों नहीं वहां आदमी आदमियों से और जानवरों से प्यार करते हैं?
राम : क्योंकि विकसित देशों में आदमियों को आदमी और जानवरों को जानवर नहीं मिलते।

(6) गुरु : विकसित देश की कोई पहचान बताओ राम ।
राम : विकसित देश विकासशील देशों को दान देते हैं।
गुरु : और फिर?
राम : फिर कर्ज देते हैं।
गुरु : और फिर?
राम : फिर ब्याज के साथ कर्ज देते हैं।
गुरु : और फिर?
राम : और फिर ब्याज ही कर्ज देते हैं।
गुरु : और फिर?
राम : और फिर विकसित देशों को विकसित मान लेते हैं।

(7) गुरु : विकसित देशों की पहचान बताओ राम ।
राम : विकसित देशों में बूढ़े अलग रहते हैं।
गुरु : और जवान?
राम : वे भी अलग रहते हैं।
गुरु : और अधेड़?
राम : वे भी अलग रहते हैं।
गुरु : तब वहां साथ-साथ कौन रहता है?
राम : सब अपने-अपने साथ रहते हैं।

(8) गुरु : विकसित देशों की पहचान बताओ राम ।
राम : विकसित देशों में मानसिक रोगी अधकि होते हैं।
गुरु : क्यों? शारीरिक रोगी क्यों नहीं होते?
राम : क्योंकि शरीर पर तो उन्होंने अधिकार कर लिया है मन पर कोई अधिकार नहीं हो पाया है।

(9) गुरु : विकसित देश की पहचान बताओ राम ।
राम : विकसित देशों में तलाक़ें बहुत होती हैं।
गुरु : क्यों?
राम : क्योंकि प्रेम बहुत होते हैं।
गुरु : प्रेम विवाह के बाद तलाक़ क्यों हो जाती है?
राम : दूसरा प्रेम करने के लिए।

(10) गुरु : विकसित देश की पहचान बताओ राम ।
राम : विकसित देश मानव अधिकारों के प्रति बड़े सचेत रहते हैं।
गुरु : क्यों?
राम : क्योंकि उनके पास ही विश्व की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति है।
गुरु : हरिराम सैन्य शक्ति और मानव अधिकारों का क्या संबंध?
राम : गुरुदेव, विकसित देश सैन्य बल द्वारा ही मानव अधिकारों की रक्षा करते हैं।

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