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रविवार, जून 21, 2009

FATHER'S डे...


WISH YOU ALL BLOGGER'S A VERY-VERY AND UNFORGATABLE FATHER'S DAY..!
21 जून, जिसे हम FATHER'S DAY के रूप में जानते हैं... मनाते हैं तो नही कह सकता... क्योंकि मुझे नही लगता कि सच में कोई मनाता होगा... हो सकता है ये बात कई लोगों को ग़लत लगे या फ़िर इससे किसी के मन को आघात पहुँच सकता है... मैं उन तमाम लोगो से इस बात के लिए क्षमा चाहता हूँ... माफ़ कीजिएगा... लेकिन जो सच है वही लिख रहा हूँ... महज़ SMS कर देने से या फ़िर HAPPY FATHER'S DAY बोल देने से इस दिन का महत्व नहीं बढ़ जाता... अब आप कहेंगे कि "तो भैया तुम ही बता दो न, कैसे बढाएं इस दिन का महत्व..?" मेरा ज़वाब होगा कि पिता आपके भी होंगे अपने हिसाब से तय कीजिए... भई! मैं तो अपनी समझ और उम्र के हिसाब से अपना काम करता हूँ... यकीन न हो किसी दिन मेरे साथ मेरे घर चलिए... आप जान जाएँगे कि कैसे मुझे देखते ही मेरे पिता कि आँखों में आंसू की चमकदार बूंदे पनाह पा लेती हैं... उस वक़्त वो मुझसे ठीक वैसे ही मिलते हैं जैसे कोई सदियों का प्यासा पानी से... खैर अपने पिता के बारे में तो सिर्फ इतना कहूँगा कि I LOVE MY PAPA VERY MUCH...

शनिवार, फ़रवरी 28, 2009

ऐसे जीवन से मौत भली!

हमने अपने जीवन में कई ऐसे उदाहरण देखे हैं जिनसे हमें काफी कुछ सीखने को मिलता है...
रामायण तो हम सभी ने देखी है... हाँ! ज़रूर देखी है... उसमे हमने देखा है कि श्रीराम अपने कर्मों के बल पर मर्यादापुरुषोत्तम कि उपाधी से नवाजे जाते हैं... " रघुकुल रीति सदा चली आई, प्राण जाये पर वचन न जाई! " वाली बात शायद उन्ही के जीवनकाल से चरितार्थ हुई... उन्होंने अपनी आने वाली पीढी के लिए कई मील के पत्थर स्थापित किये... और सन्देश दिया कि जिंदगी मिली है तो इसका सदुपयोग करो... मानव जीवन ऐसे ही नहीं मिलता... उसके मिलने के पीछे बहुत बड़ा उद्देश्य छिपा होता है... पिता के आदेश के पालन के लिए उन्होंने अपना जीवन बलिदान करने की ठान ली... और चल पड़े चौदह साल का बनवास काटने... एक ही पत्नी को लेकर पूरा जीवन काट दिया... पत्नी दूर हो गयी फिर भी दूसरी शादी नहीं की... भाई भी बने तो बेमिसाल... कहने का मतलब है कि उन्होंने हर क्षेत्र में मिसाल कायम किया... बचपन से लेकर जवानी के सुनहरे युग तक उन्होंने कभी अपने मन को नहीं सुना... सदा ही माता-पिता, पत्नी-भाई और प्रजा कि सुनते रहे... कभी भी अपना जीवन नहीं जिया... अपना जीवन उन्होंने दूसरों के नाम कर दिया... तभी तो इतने महान बने कि दुनिया ने उन्हें भगवान् कहना शुरू कर कर दिया... और अब तो उनकी पूजा भी होने लगी है (मैंने जब से अनुभव किया है तब की बात कर रहा हूँ, इससे पहले का मुझे नहीं पता, मैं खुद उन्हें अपना इष्ट मानता हूँ!)... इतना सब बताकर मैं ये नहीं कहना चाहता कि दुनिया हर इंसान भगवान् बनने की कोशिश में लग जाए... ऐसा कतई संभव नहीं है... प्रकृति का नियम टूट जाएगा... मेरे कहने का मतलब है कि जीवन का सदुपयोग होना चाहिए... हम सभी को अपने अन्दर छिपी शक्ति को पहचानना चाहिए...एक उदाहरण देता हूँ... आज की युवा वर्ग का (उनमे मैं खुद भी शामिल हूँ)... अक्सर ऐसा देखने में आया है कि हम युवा जितनी फिक्र अपनी गर्लफ्रेंड या पत्नी की करते हैं... उसका दस फीसदी भी अपने माता-पिता या परिवार की फिक्र करते हैं...?? शायद नही! पापा या भैया का काल यदि गर्लफ्रेंड के सामने आ जाता है तो उठाते ही नहीं... और यदि गर्लफ्रेंड ने पूरे परिवार के सामने काल किया तो उसका काल काटकर उसे कालबेक करेंगे और बड़ी ही बेशर्मी के साथ घर वालों के सामने उससे बात करने लगेंगे... क्या यह घर के संस्कारों का नतीजा है? कतई नहीं! यह हमारी दूषित मानसिकता और अपने अन्दर छिपे SplitPersonality (दोहरा स्वाभाव) को अपने पर हावी होने देने का परिणाम है... यह सब देखकर मुझे शर्म आती है कि मैं भी आज की युवा पीढी में गिना जाता हूँ... मुझे जब कोई युवा या जवान कहता है तो मुझे लगता है मानो कोई मेरे "मानव" होने का मजाक उड़ा रहा है... धिक्कार है ऐसी ज़वानी पर जो माँ की आँचल और पिता के स्नेह से विमुख होकर पत्नी या गर्लफ्रेंड की पल्लू से चिपका रहता है... धिक्कार है ऐसे जीवन पर जो भाई के प्यार को छोड़कर किसी गार्डन में एक अजनबी लड़की के कंधे पर हाथ डालकर बैठा है... छी!! क्या करना ऐसे जीवन और ऐसी जवानी का॥ जो खुद के परिवार को छोड़कर कहीं और अपना दुःख-सुख बाँट रहा है...?? अरे रामजी भी तो जवान थे... और वो तो कुछ भी कर सकते थे... राजा के बेटे थे... उनके पास अपार सम्पत्ति भी थी... पर उन्होंने हमेशा ही अपने परिवार को लेकर चलना उचित समझा... अब कुछ लोग कहेंगे कि भाई! वो तो भगवान् थे... उन्हें तो रावन का नाश करके अपना काम करना था... लीला कर रहे थे वो... ऐसा सोचने वालों को एक बात बता दूं कि वो भगवान् बनकर पैदा नहीं हुए थे... उन्होंने खुद में ऐसे गुण पैदा किये जिनसे उन्हें भगवान् कहा जाने लगा... हम भी ऐसा कर सकते है॥ पर गर्लफ्रेंड से बतियाने से फुरसत मिले तब न... मैं किसी युवा भाई पर आक्षेप नही कर रहा हूँ... अगर किसी युवा भाई को मेरे इस लेख से दुःख हो तो मैं क्षमा चाहूँगा... मैं तमाम युवा बंधुओं से गुजारिश करूंगा की मेरे प्यारे! भाइयो गर्लफ्रेंड के बीस मिनट के प्यार के लिए माँ की बीस साल की ममता को मत ठुकराओ... अगर अपनी माँ, अपने पिता को ही नहीं मानोगे तो ऐसे जीवन का करना ही क्या..??
ऐसे जीवन से मौत ही भली...!!!

एक बात समझ लो दोस्तों
" माता-पिता के अलावा;
न माया चाहिये;
न काया चाहिये;
हमें तो बस माँ का साया चाहिये॥
न इज्जत न शोहरत
न कुछ और चाहिए॥
हमें तो बस माँ की
आँचल का छाया चाहिए॥"

रविवार, फ़रवरी 22, 2009

सोचता हूँ, सोचना अब बंद ही कर दूं!

इंसान की जिंदगी में कई बार ऐसे पल आते हैं, जब उसे काफी कुछ सोचना पड़ता है... यहाँ तक कि वह खुद को भूल जाता है... यकीन मानिए ऐसा होता है... ऐसा वाकई होता है...वह इतना सोचता है कि सोचने के अलावा उसके पास कोई और रास्ता ही नहीं होता...कभी सोचता है कि मैं क्या सोच रहा हूँ, कभी सोचता है कि मैं इतना क्यों सोचता हूँ...और कभी वह सोचता है कि मुझे क्या सोचना है॥? किसके बारे में सोचना है..?और इन्ही सब के चलते उसकी सोच ही बदल जाती है... कभी-कभी तो वह सोचने में इतना मशगूल हो जाता है कि सोचना ही भूल जाता है...इसे मानवीय प्रकृति कहते हैं... वैसे ऐसा हर किसी के साथ नहीं होता...ऐसा उनके साथ होता है जो सोचना जानते हैं... ऐसा एक जीता जागता उदाहरण भी मैंने देखा है...मेरे बड़े भाई के रूप में... वैसे उनको "बड़ा भाई" इसलिए कहा रहा हूँ क्योंकि उनका परिचय देने के लिए कोई न कोई संबोधन तो देना ही पड़ेगा... और उनको "बड़ा भाई" कहने में मैं फक्र महसूस करता हूँ... अगर उनको मैं अपना खुदा कहूं तो अतिसंयोक्ति नहीं होगी... वो वाकई में मेरे लिए किसी खुदा से कम नहीं हैं... कहते हैं न कि "खुदा" हमेशा अपने बन्दों के लिए "खुद" से ज्यादा सोचते हैं... उन्होंने हमेशा अपने छोटे भाई किशन (वो मुझे प्यार से किशन कहते हैं) के लिए खुद से कहीं ज्यादा सोचा है और किया है... पर मेरे खुदा कि एक बात मुझे ठीक नहीं लगती..! उनका मेरे बारे में इतना ज्यादा सोचना! जब वो भोजन करते हैं तो सोचते हैं कि मेरे किशन ने भोजन किया होगा कि नहीं..? वो कहीं भूखा तो नहीं होगा..? जब वो सोते हैं तो सोचते हैं कि मेरा किशन अभी भी अपने ऑफिस में काम पर लगा होगा... जब वो कहीं घुमते हैं तो सोचते हैं कि मेरे किशन के क्या हाल होंगे..? मैं जब उनके पास होता हूँ तो मुझे हमेशा एक पिता कि तरह समझाते हैं... वो मुझे हमेशा मार्गदर्शित करते हैं... मेरे भैया दिल्ली में हैं और वो "आईएएस" के मेन एग्जाम की तयारी कर रहे हैं... मैंने अपने जीवन में उनकी तरह महत्वकांक्षी व्यक्ति नहीं देखा..! सच कहता हूँ... नहीं देखा... वो मुझे बहुत प्यार करते हैं... ये केवल कहने की बात नहीं... सच में ऐसा ही है...वो मेरे बारे में इतना सोचते हैं... ये मेरे लिए बहुत ही सौभग्य की बात है... अब मैं भी सोचने लगा हूँ... मैं सोचता हूँ की जब वो मेरे बारे में इतना सोचता हैं तो मुझे किसी के बारे में सोचने की कोई ज़रुरत नहीं है... "सोचता हूँ सोचना अब बंद ही कर दूं!"

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