शनिवार, अगस्त 01, 2009
यादें...!
लेबल: दर्द, यादें, रूह, विडंबना
Writer रामकृष्ण गौतम पर शनिवार, अगस्त 01, 2009 0 Responzes
बुधवार, जुलाई 29, 2009
कैसे कह दूँ कि वो पराया है...
जिसका साँसों ने गीत गाया है
कैसे कह दूँ कि वो पराया है
याद बे इख्तियार आया है
मेरी रग-रग में जो समाया है
कैसा रिश्ता है उस से क्या मालूम
जिसने ख्वाबों में भी रुलाया है
ऐसे सहरा से है गुज़र जिसमें
दूर तक पेड़ है न साया है
बंद पलकों में उसकी हूँ मैं 'ज़हीन'
उसने मुझको कहाँ छुपाया है
Writer रामकृष्ण गौतम पर बुधवार, जुलाई 29, 2009 2 Responzes
मंगलवार, जुलाई 28, 2009
सभ्यता की शक्ल...
आज हर होनी अनहोनी हो रही है।
सभ्यता की शक्ल रोनी हो रही है॥
बढ़ रही है खजूरों की ऊँचाई।
हर गुलाबी नस्ल बौनी हो रही है॥
लेबल: खजूर, गुलाब, शक्ल, सभ्यता
Writer रामकृष्ण गौतम पर मंगलवार, जुलाई 28, 2009 1 Responzes
अब साँसों का कोई शौक नही...
अब साँसों का कोई शौक नही, परवश लेते हैं।
जिन्हें दूध देकर पालो वो खेल-खेल में डंस लेते हैं॥
आ लगी अब ज़िन्दगी शर्मिंदगी की मोड़ पर।
जिन बातों पर रोना आए, हम उन पर अब हंस देते हैं॥
Writer रामकृष्ण गौतम पर मंगलवार, जुलाई 28, 2009 1 Responzes
धिक्कार सौ सौ बार...
धिक्कार सौ-सौ बार इस इंसान को।
नीलाम करने जो खड़ा ईमान को॥
स्वर्ण की लंका की सुरक्षा के लिए अपनी।
इसी ने पत्थरों में बो दिया भगवान् को॥
Writer रामकृष्ण गौतम पर मंगलवार, जुलाई 28, 2009 0 Responzes
रविवार, जुलाई 26, 2009
अब न आरजू है, न तमन्ना है कोई...
न आरजू है न तमन्ना है कोई।
अब इस दिल को दिल मिल गया कोई॥
इंतज़ार था सदियों का मेरे जीवन में।
उसे एक झटके में पूरा कर गया कोई॥
अक्सर सोचता रहता था मैं तन्हाई में।
मैं तन्हा क्यों हूँ, मुझे आज तक क्यों नही मिला कोई॥
वो क्या आई ज़िन्दगी में फूल खिल गए लाखों।
सूखे बाग़ में एक प्यार का पौधा लगा गया कोई॥
अब अगर ये सपना है तो ये सदा रहे मेरा।
जो भी हो पर प्यार का मुझे खाब दिखा गया कोई॥
आज इस दिल की धडकनों को धड़कना सिखा गया कोई॥
मेरी आंखों में मोहब्बत के प्यारे ख्वाब सज़ा गया कोई॥
लेबल: आरजू, ख्वाब, तमन्ना, मोहब्बत
Writer रामकृष्ण गौतम पर रविवार, जुलाई 26, 2009 6 Responzes
शनिवार, जुलाई 25, 2009
कुछ कम है...
ज़िन्दगी जैसी तमन्ना थी नहीं कुछ कम है.
हर घड़ी होता है एहसास कहीं कुछ कम है..
घर की तामीर तसव्वुर ही में हो सकती है.
अपने नक़्शे के मुताबिक़ ये ज़मीं कुछ कम है..
बिछड़े लोगों से मुलाक़ात कभी फिर होगी.
दिल में उम्मीद तो काफ़ी है यक़ीं कुछ कम है..
अब जिधर देखिये लगता है कि इस दुनिया में.
कहीं कुछ चीज़ ज़ियादा है कहीं कुछ कम है..
आज भी है तेरी दूरी ही उदासी का सबब.
ये अलग बात कि पहली सी नहीं कुछ कम है..
रचनाकार: शहरयार
लेबल: ज़िन्दगी, तमन्ना, बिछड़े लोगों से मुलाक़ात
Writer रामकृष्ण गौतम पर शनिवार, जुलाई 25, 2009 5 Responzes
गुरुवार, जुलाई 23, 2009
आदमी की पीड़ा...
वक्त के धरातल पर
जम गई हैं
दर्द की परतें
दल-दल में धंसी है सोच
मृतप्रायः है एहसास
पंक्चर है तन
दिशाहीन है मन
हाडमांस का
पिजरा है मानव
इस तरह हो रहा है
मानव समाज का निर्माण
अब
इसे चरित्रवान कहें
या चरित्रहीन
कोई तो बताए
वो मील का पत्थर
कहाँ से लाएं
जो हमें
"गौतम", "राम", "कृष्ण" की राह दिखाए..?
लेबल: कृष्ण, गौतम, नासूर, पीड़ा, राम, व्यथा
Writer रामकृष्ण गौतम पर गुरुवार, जुलाई 23, 2009 2 Responzes
ज़िन्दगी क्या है..?
ज़िन्दगी फ़क़ीर बनके रह गई
साँस की लकीर बनके रह गई
ऐसा भी क्या गुनाह था
कि पीर-पीर...
द्रौपदी का चीर बनके रह गई॥!..?
लेबल: आदमी की पीड़ा, एहसास, ज़िन्दगी
Writer रामकृष्ण गौतम पर गुरुवार, जुलाई 23, 2009 1 Responzes
आओ! जश्न मना लो...
हम सहस्राब्दी में आ गए
बेबसी, बेकारी, भुखमरी
जिल्लतें, दर्द और ग़म भी
हमारे साथ-साथ
यहॉ तक आ गए
समय चीखकर
कह रहा है
इस व्यवस्था को
बदल डालो
नेता कहते हैं
हमारी करतूतों पर
परदा डालो
आओ!
सहस्राब्दी का जश्न मना लो...
लेबल: देश की तस्वीर, नई सदी, बेकारी, बेबसी, व्यवस्था
Writer रामकृष्ण गौतम पर गुरुवार, जुलाई 23, 2009 1 Responzes
मंगलवार, जुलाई 21, 2009
वक़्त बदलेगा, मंज़र भी बदल जाएँगे...
आज सुबह से ही वो बहुत परेशान थी। मैं अपने बिस्तर पर सोया हुआ था। सुबह के लगभग ग्यारह बजे होंगे कि मेरे सेलफोन की घंटी बजी। मैंने देखा उसी का मिस्ड काल था। मैंने वापस फोन किया। उधर से एक परेशान सी आवाज़ में उसने मेरा हालचाल पूछा। मैंने अपनी सलामती बताई और उससे काल करने का कारण पूछा। बड़ी ही सहमी सी आवाज़ में उसने मुझे अपनी समस्या बताई। उसकी समस्या सुनकर मैंने उसे समझाते हुए कहा कि इन बातों का कोई औचित्य नही है। इसलिए इन बातों को भूल जाओ। पर उसने एक ऐसी बात कह दी कि मैं फ़िर कोई ज़वाब न दे सका। उसकी बातों में उलझता जा रहा था। उसकी बातों में छिपे सवालों का मैं कोई ज़वाब नही दे पा रहा था। मैं उसे ठीक वैसे ही समझाते जा रहा था जैसे प्रवचन या सत्संग कार्यक्रम में कोई साधू या स्वामी जी कहते हैं कि "सदा सत्य बोलो, झूठ बोलना पाप है।" अब आप ही बताइए उस वक़्त जब मो मुझसे अपनी परेशानी साझा कर रही है तब इन बातों का अस्तित्व कहाँ तक है? कोई आपसे अपनी समस्याएं बता रहा है और आप उसे प्रवचन सुना रहे हैं तो आपसे उसकी अपनी परेशानी साझा करने का क्या मतलब है? उसने मुझसे कहा कि "आपके और मेरे रिश्ते को लेकर मैंने कुछ असहनीय बातें सुनी हैं। आप तो लड़के हैं और आप इन बातों का उत्तर समाज को बेफिक्री से दे सकते हो लेकिन मैं तो लड़की हूँ न, और एक लड़की के लिए यह सब सुन पाना कितना दुखद होता है इसका अंदाजा एक लड़की ही लगा सकती है। जबकि मैं जानती हूँ कि आप मेरे लिए कितना महत्व रखते हैं और लोग जैसी बातें कर रहे हैं वैसा कतई नही है। इस बात में ज़रा भी सच्चाई नही है। मुझे आपकी चिंता अधिक है। इसलिए मेरा मन इस बात को गंवारा नही करता करता और परेशान हो जाता है।" सच! कितनी मासूमियत है इन लाइंस में? बस उसकी इसी मासूमियत ने ही तो मुझे निरुत्तर कर दिया था। उसकी इन सारी बातों के बदले मैंने सिर्फ़ इतना ही कहा कि "तुम जानती हो न, कि हमारा रिश्ता क्या है? जब हम दोनों (जिन्हें रिश्ता निभाना है) को पता है कि हमारा रिश्ता ग़लत नही है तो फ़िर लोगों के कह देने भर से कि हमारा रिश्ता सही नही है, क्या हमारा रिश्ता बदल जाएगा या फ़िर ग़लत हो जाएगा क्या?" मेरी इस बात से शायद उसे कुछ तसल्ली हुई। उसकी बातों से मुझे परेशानियों का जाना स्पस्ट समझ में आया। उसके बोलने का लहजा भी बदला और फ़िर वो धीरे-धीरे सामान्य होने लगी। उसकी परेशानी तो लगभग जा चुकी थी या फ़िर अब तक जा चुकी होगी होगी लेकिन मैं अभी तक उसकी मासूम बातों और निःस्वार्थ सवालों के बीच ख़ुद को फंसा हुआ महसूस कर रहा हूँ। ईश्वर से मेरी यही प्रार्थना है कि उसकी सारी परेशानिया मुझे देदें और मेरे सारे उल्लास, मेरी सारी खुशियाँ उस तक पहुँचा दें!!! क्योंकि मैं भले ही उसके लिए इस दुनिया का एक हिस्सा हूँ, पर मेरे लिए वो ही पूरी दुनिया है...
लेबल: दुःख, निःस्वार्थ, परेशानी, मासूमियत
Writer रामकृष्ण गौतम पर मंगलवार, जुलाई 21, 2009 1 Responzes
सोमवार, जुलाई 20, 2009
एक "चाँद" आसमान से विदा हो गया...
दिन था 18 जुलाई का, शनिवार! मैं अपने ऑफिस में कंप्यूटर स्क्रीन पर नज़रे गडाये उनके ब्लॉग http://swasamvad.blogspot.com/ पर उनकी रचनाएँ पढ़ रहा था। सच में कितना प्यारा लिखते थे वो। जादू था उनकी लेखनी में। उस वक़्त रात के लगभग साढ़े दस हो रहे थे। अचानक मेरे सेलफोन की घंटी बजी। मेरे एक दोस्त रमन का काल था। काल मिस हो जाने के बाद मैंने कालबैक किया। अमूमन काल कनेक्ट होने के बाद HELLO ही सुनाई देता है लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। उस तरफ से रमन की घबराई हुई आवाज़ से निकले हुए शब्द थे "कुछ खबर मिली क्या?" मैंने बड़ी व्याकुलता और भय से पूछा "क्या?" उसने कहा "'विकास भैया' की DEATH हो गई"। इतना कहना हुआ ही था कि मेरे तो पैर ही ठंडे पड़ गए। एक पल के लिए मुझे लगा कि मेरे शरीर से मेरी आत्मा विदा हो गई। पैरों तले ज़मीन खिसक गई और मैं हतप्रभ रह गया। उन्हें इस संसार से विदा हुए अभी कुछ ही घंटे हुए हैं। अभी भी उनकी वो हंसती-मुस्कुराती सूरत मेरे दिमाग में क़ैद है और मुझे, मेरे मन को बार-बार रुला रही है। वो भोपाल में रहकर PSc MAINS की तयारी कर रहे थे.
शनिवार, 18 JULY का दिन उनके और हम सभी के लिए एक "काला दिन" था। भोपाल के पास ही मिसरौद रोड पर एक सड़क हादसे में उनकी और हमारे एक अन्य सीनियर संकल्प रंजन शुक्ला की दर्दनाक मौत हो गई। ईश्वर इतना भी कठोर हो सकता है, मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी? खैर! वो जितनी उम्र लेकर आये उतना ही जिए। अंत में मेरे प्यारे "विकास भैया" के लिए इतना ही कहूंगा कि
"कुछ लोग हैं जो वक़्त के सांचे में ढल गए, कुछ लोग थे जो वक़्त के सांचे बदल गए।" अब वो भौतिक रूप से तो हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी स्मृतियाँ सदा ही हमारे बीच रहेंगी। प्यारे भैया आपको हम सभी छोटे भाइयों, आपके चाहने वालों और आपके तमाम साथियों की ओर से "अश्रुपूरित श्रद्धासुमन"। आप अगले जनम में जहाँ भी जाएं, हमेशा खुश रहें और आपको हमारी भी उम्र लग जाए...
"ये कौन चला श्रृंगार करके? बहार क्यों लजा गई?बस इतनी सी बात है, किसी की आँख लग गयी, किसी को नींद आ गयी!!!
लेबल: अन्तिम विदाई, दुःख, प्यारे भइया
Writer रामकृष्ण गौतम पर सोमवार, जुलाई 20, 2009 2 Responzes
शनिवार, जुलाई 18, 2009
घर से निकले थे हौसला करके...
सच ही कहा गया है कि इंसान अपने मन का कैदी, मन का गुलाम होता है। किसी वस्तु या व्यक्ति या अन्य किसी चीज़ को पाने के लिए एक बच्चे की तरह मचल जाता है। Object कोई भी हो, उसके लिए Subject एक ही रहता है और वह Subject होता है "जो चाह लिया है उसे पाना है"। क्या पाना है यह हुआ Object और कैसे पाना है यह Subject हुआ। तो किसी भी चीज़ को चाह लेने के बाद बस पाना है और पाकर रहना है, यही उसका यानि मन का ध्येय बन जाता है। यह तो हुई "ऐकिक" प्रकार की गुलामी। अब बात आती है इंसानी मन की भावनाओं की; बात शुरू करता हूँ आज के परिवेश यानि Culture को लेकर! आज हम अपने चारों ओर देखते हैं कि पश्चिमी सभ्यता हम पर पूरी तरह हावी है। यह भी कह सकते हैं कि हमने इसे ख़ुद पर हावी होने दिया है। कुछ ऐसे भी इंसान हैं जो इसे हावी होने का कोई मौका ही नही देते , पर उनकी संख्या अँगुलियों पर है। हाँ! तो मुद्दे कि बात यह है कि आज का युवा अपने "मन" को एक ऐसे ढलान पर उतार देता है जो सीधे किसी "खूबसूरत लड़की" पर जाकर ख़त्म होता है। हमारे युवा मित्र ने एक लड़की पसंद कर ली और उसे इम्प्रेस करने में लग गए। बंधू कि किस्मत ने साथ दिया और लड़की ने भी उनको पसंद कर लिया। फोन पर बातें भी होने लगी। मिलने लगे और साथ-साथ घूमना-फिरना भी शुरू हो गया। बात बहुत आगे बढ़ गई और दिन-ब-दिन नजदीकियां भी बढ़ने लगी। भाई उस लड़की की यादों में खो गया। अब उसे उस लड़की के अलावा न दिखाई देता है और न ही कोई समझ में आता है। सारे रिश्ते-नाते, घर-परिवार एक तरफ़ और वह लड़की एक तरफ़। न जाने उस लड़की में ऐसा क्या है, जिसने उसे घर-परिवार तक को भूलने पर विवश कर दिया। खैर! जो भी हो पर हमारा यह युवा मित्र "प्यार" की जाल में फँस गया है। अब उसे सिर्फ़ वही लड़की चाहिए। वह उस लड़की को चाहने लगा है। इतना चाहने लगा है उसे सिर्फ़ उसी की चाहत है। यहाँ पर हमारे मित्र का Subject है वह लड़की और ऑब्जेक्ट है उसे पाना। फिर अचानक पता नही क्या हो जाता है ? जो लड़की हमारे युवा मित्र को घर-परिवार से भी बढ़कर लगने लगती है वाही अब उसके "मन" को नही भा रही है। वाह! भाई क्या बात है ? अब हमारे मित्र की वह "ऐकिक" प्रकार की गुलामी खत्म होने लगती है। अब वह जकड़ता जाता है "अनैक्षिक" गुलामी में। किसी ने पूछा अबे अचानक तुझे क्या हो गया? तो हमारा युवा मित्र बहुत ही उदासी से ज़वाब देता और कहता है यार! कल मैंने उसके सेल पर किसी लड़के का मेसेज देखा! मैसेज पढ़कर मेरा दिल रो पड़ा यार, ऐसा मैसेज था। बस फ़िर मैंने ठान लिया की अब न तो उससे बात करूंगा और न ही कोई मैसेज भेजूंगा। दिल तो नही मान रहा हमारे मित्र का, पर क्या करें। किसी लड़के का भाई की गर्लफ्रेंड के सेल पर मैसेज क्या देख लिया, होश उड़ गए। अब आप ही बताइए... ऐसा भला "प्यार" होता है क्या???
अब क्या होता है कि हमारे युवा मित्र चले थे लड़की को हासिल करने और उल्टे पैर लौट आए। इस वक़्त जगजीत सिंह जी का गाया हुआ ये ग़ज़ल खूब जमता है :
"घर से निकले थे हौसला करके।
लौट आए खुदा-खुदा करके॥"
Writer रामकृष्ण गौतम पर शनिवार, जुलाई 18, 2009 3 Responzes
शुक्रवार, जुलाई 17, 2009
रामायण का एक सीन...
रुखसत हुआ वो बाप से लेकर खुदा का नाम।
राह-ए-वफ़ा की मन्ज़िल-ए-अव्वल हुई तमाम॥
मन्ज़ूर था जो माँ की ज़ियारत का इंतज़ाम।
दामन से अश्क पोंछ के दिल से किया कलाम॥!॥
रचनाकार - पं ब्रजनारायण ’चकबस्त’
लेबल: रामचरितमानस
Writer रामकृष्ण गौतम पर शुक्रवार, जुलाई 17, 2009 5 Responzes
यह भी तो "प्यार" ही है न..!!!
बात उस समय की है जब मैं अपने ग्रेजुएशन के चौथे सेमेस्टर की परीक्षाएं दे रहा था. उस वक़्त मेरी तबियत काफी बिगड़ी हुई थी, इसलिए मेरी देखभाल के लिए मेरी माँ भी मेरे साथ ही थीं. उस दिन मेरा तीसरा या चौथा पेपर था. हम लोग एग्जाम हाल से पेपर देकर निकले. बारिश भी अपने पूरे शवाब पर था. ठीक उसी वक़्त मेरा शरीर गर्म होने लगा. मुझे काफी तेज़ बुखार हो चला था. ठण्ड भी इतनी लग रही थी मानो मैं कडाके की ठण्ड में बिना कपडों के खडा हूँ. दम निकला जा रहा था. मुझे बस यही चिंता सताए जा रही थी कि मैं घर कैसे पहुंचूंगा? इतने में ही मेरे एक अभिन्न और अज़ीज़ मित्र ने मुझे कांपते हुए देखा. वो मेरे पास आया और मेरा माथा छूने लगा. वो भी दंग रह गया. उसने कहा "राम" तुझे तो काफी तेज़ बुखार है. मैंने दबी जुबान से स्वीकृति दी. उसने झट ही अपना रेनकोट मुझे दे दिया और पहनने को कहा. मैंने कहा भी कि तुम क्या पहनोगे? उसने कहा अभी मुझसे ज्यादा इसकी ज़रूरत तुझे है. उसने बाईक स्टार्ट की, मुझे बैठने को कहा और तेजी से मेरे घर की ओर रुख किया. बारिश की बूंदों की हिमाकत बढती जा रही थी, लेकिन उसे उन बूंदों की परवाह नहीं थी. उसे परवाह थी तो सिर्फ "राम" की. करीब बीसेक मिनट में हम लोग मेरे घर पहुँच गए. माँ भी बेसब्री से मेरी राह ताक रही थी. उन्होंने जैसे ही हम दोनों को देखा. उनकी आँखों में नमी ने पनाह पा लिया. वो रोने लगीं. क्यों रोयीं..? मुझे देखकर..! नहीं...! वो रोयीं थीं "राम" और "ज्ञान" का "प्यार" देखकर. उन्होंने देखा कि कैसे "ज्ञान" ने "राम" की परवाह की..? कैसे "राम" की हालत देखकर "ज्ञान" ने खुद की फिक्र नहीं की और "राम" को सही सलामत घर पहुँचाया. सच कहता हूँ, उस दिन "ज्ञान" ने मुझे इस तरह से रेनकोट पहनाई थी की उतनी तेज़ बारिश में भी मैं ज़रा भी नहीं भीगा था. हम दोनों की हालत पर मेरी माँ ने गौर किया और "ज्ञान" का सिर पोंछते हुए उसे सीने से लगा लिया.
लेबल: अज़ीज़ दोस्त, दोस्ती, प्यार
Writer रामकृष्ण गौतम पर शुक्रवार, जुलाई 17, 2009 3 Responzes
जवानी का बहिष्कार : "प्यार"
सूखी
गुलदस्ते सी
प्यार की नदी
****
व्यक्ति
संवेग सब
मशीन हो गए
जीवन के
सूत्र
सरेआम खो गए
****
और कुछ न कर पाई
यह नई सदी
****
वर्तमान ने
बदले
ऐसे कुछ पैंतरे
****
आशा
विश्वास
सभी पात से झरे
****
सपनों की
सर्द लाश
पीठ पर लदी।
लेबल: जवानी का वहिष्कार, प्यार, सपनो की सर्द लाश
Writer रामकृष्ण गौतम पर शुक्रवार, जुलाई 17, 2009 3 Responzes
बुधवार, जुलाई 15, 2009
आरजू है वफ़ा करे कोई...|||
आरजू है वफ़ा करे कोई।
जी न चाहे तो क्या करे कोई॥
गर मर्ज़ हो दवा करे कोई।
मरने वाले का क्या करे कोई॥
कोसते हैं जले हुए क्या-क्या।
अपने हक़ में दुआ करे कोई॥
उन से सब अपनी-अपनी कहते हैं।
मेरा मतलब अदा करे कोई॥
तुम सरापा हो सूरत-ए-तस्वीर।
तुम से फिर बात क्या करे कोई॥
जिस में लाखों बरस की हूरें हों।
ऐसी जन्नत को क्या करे कोई॥
Writer रामकृष्ण गौतम पर बुधवार, जुलाई 15, 2009 5 Responzes
मंगलवार, जुलाई 14, 2009
बना-बना के तमन्ना मिटाई जाती है...
बना-बना के तमन्ना मिटाई जाती है।
तरह-तरह से वफ़ा आज़माई जाती है॥
जब उन को मेरी मुहब्बत का ऐतबार नहीं।
तो झुका-झुका के नज़र क्यों मिलाई जाती है॥
हमारे दिल का पता वो हमें नहीं देते।
हमारी चीज़ हमीं से छुपाई जाती है॥
'शकील' दूरी-ए-मंज़िल से ना-उम्मीद न हो।
मंजिल अब आ ही जाती है अब आ ही जाती है॥
Writer रामकृष्ण गौतम पर मंगलवार, जुलाई 14, 2009 3 Responzes
...उस हँसी को ढूँढ़िए..!!!
जो रहे सबके लबों पर उस हँसी को ढूँढ़िए।
बँट सके सबके घरों में उस खुश़ी को ढूँढ़िए॥
देखिए तो आज सारा देश ही बीमार है।
हो सके उपचार जिससे उस जड़ी को ढूँढ़िए॥
काम मुश्किल है बहुत पर कह रहा हूँ आपसे।
हो सके तो भीड़ में से आदमी को ढ़ूढ़िए॥
हर दिशा में आजकल बारूद की दुर्गन्ध है।
जो यहाँ ख़ुशबू बिखेरे उस कली को ढूँढ़िए॥
प्यास लगने से बहुत पहले हमेशा दोस्तों।
जो न सूखी हो कभी भी उस नदी को ढूँढ़िए॥
शहर-भर में हर जगह तो हादसों की भीड़ है।
हँस सकें हम सब जहाँ पर उस गली को ढूँढ़िए॥
क़त्ल, धोखा, लूट, चोरी तो यहाँ पर आम हैं।
रहजनों से जो बची उस पालकी को ढूँढ़िए॥
Writer रामकृष्ण गौतम पर मंगलवार, जुलाई 14, 2009 0 Responzes
शुक्रवार, जुलाई 10, 2009
दिल में न हो ज़ुर्रत तो मोहब्बत नहीं मिलती...
Writer रामकृष्ण गौतम पर शुक्रवार, जुलाई 10, 2009 2 Responzes
गुरुवार, जुलाई 09, 2009
माँ और पिताजी...
माँ
चिंता है, याद है, हिचकी है।
बच्चे की चोट पर सिसकी है।
माँ चूल्हा, धुआं, रोटी और हाथों का छाला है।
माँ ज़िन्दगी की कड़वाहट में अमृत का प्याला है।
माँ त्याग है, तपस्या है, सेवा है।
माँ फूँक से ठंडा किया हुआ कलेवा है।
पिता
पिता रोटी है, कपड़ा है, मकान हैं।
पिता छोटे से परिंदे का बड़ा आसमान हैं।
पिता से बच्चों के ढेर सारे सपने हैं।
पिता हैं तो बाज़ार के सब खिलौने अपने हैं।
Writer रामकृष्ण गौतम पर गुरुवार, जुलाई 09, 2009 3 Responzes
मंगलवार, जुलाई 07, 2009
ख्व़ाब छीने, याद भी सारी पुरानी छीन ली...
ख्व़ाब छीने, याद भी सारी पुरानी छीन ली
ख्व़ाब छीने, याद भी सारी पुरानी छीन ली
वक़्त ने हमसे हमारी हर कहानी छीन ली।
पर्वतों से आ गई यूँ तो नदी मैदान में
पर उसी मैदान ने सारी रवानी छीन ली।
दौलतों ने आदमी से रूह उसकी छीनकर
आदमी से आदमी की ही निशानी छीन ली।
देखते ही देखते बेरोज़गारी ने यहाँ
नौजवानों से समूची नौजवानी छीन ली।
इस तरह से दोस्ती सबसे निभाई उम्र ने
पहले तो बचपन चुराया फिर जवानी छीन ली।
पर्वतों से आ गई यूँ तो नदी मैदान में
पर उसी मैदान ने सारी रवानी छीन ली।
दौलतों ने आदमी से रूह उसकी छीनकर
आदमी से आदमी की ही निशानी छीन ली।
देखते ही देखते बेरोज़गारी ने यहाँ
नौजवानों से समूची नौजवानी छीन ली।
इस तरह से दोस्ती सबसे निभाई उम्र ने
पहले तो बचपन चुराया फिर जवानी छीन ली।
Writer रामकृष्ण गौतम पर मंगलवार, जुलाई 07, 2009 4 Responzes
वो जब याद आया...
वो तेरी याद थी अब याद आया
आज मुश्किल था सम्भलना ऐ दोस्त
तू मुसीबत में अजब याद आया
दिन गुज़ारा था बड़ी मुश्किल से
फिर तेरा वादा-ए-शब याद आया
तेरा भूला हुआ पैमान-ए-वफ़ा
मर रहेंगे अगर अब याद आया
फिर कई लोग नज़र से गुज़रे
फिर कोई शहर-ए-तरब याद आया
हाल-ए-दिल हम भी सुनाते लेकिन
जब वो रुख़सत हुए तब याद आया
बैठ कर साया-ए-गुल में "नासिर"
हम बहुत रोये वो जब याद आया..!!
लेबल: अहमियत., तेरा वादा, याद आया
Writer रामकृष्ण गौतम पर मंगलवार, जुलाई 07, 2009 3 Responzes
शनिवार, जुलाई 04, 2009
प्यार कहता है...
Writer रामकृष्ण गौतम पर शनिवार, जुलाई 04, 2009 2 Responzes
रविवार, जून 28, 2009
सबके दिल से उतर गया हूँ मैं...
एक हुनर है जो कर गया हूँ मैं
सब के दिल से उतर गया हूँ मैं
कैसे अपनी हँसी को ज़ब्त करूँ
सुन रहा हूँ के घर गया हूँ मैं
क्या बताऊँ के मर नहीं पाता
जीते जी जब से मर गया हूँ मैं
अब है बस अपना सामना दरपे
शहर किसी से गुज़र गया हूँ मैं
वो ही नाज़-ओ-अदा, वो ही घमजे
सर-ब-सर आप पर गया हूँ मैं
अजब इल्ज़ाम हूँ ज़माने का
के यहाँ सब के सर गया हूँ मैं
कभी खुद तक पहुँच नहीं पाया
जब के वाँ उम्र भर गया हूँ मैं
तुम से जानां मिला हूँ जिस दिन से
बे-तरह, खुद से डर गया हूँ मैं...
लेबल: अदा, चरित्र, जानिब, भावना
Writer रामकृष्ण गौतम पर रविवार, जून 28, 2009 1 Responzes
शनिवार, जून 27, 2009
मर्द-ए-बाख़ुदा...
लेबल: ग़र्क़-ए-बह्र-ए-फ़ना, बेनियाज़-ए-मुद्द'अ, मर्द-ए-बाख़ुदा
Writer रामकृष्ण गौतम पर शनिवार, जून 27, 2009 1 Responzes
रविवार, जून 21, 2009
प्रेम पिता का...
ईथर की तरह होता है
ज़रूर दिखाई देती होंगी नसीहतें
नुकीले पत्थरों-सी
दुनिया-भर के पिताओं की लम्बी कतार में
पता नहीं कौन-सा कितना करोड़वाँ नम्बर है मेरा
पर बच्चों के फूलोंवाले बग़ीचे की दुनिया में
तुम अव्वल हो पहली कतार में मेरे लिए
मुझे माफ़ करना मैं अपनी मूर्खता और प्रेम में समझा था
मेरी छाया के तले ही सुरक्षित रंग-बिरंगी दुनिया होगी तुम्हारी
अब जब तुम सचमुच की दुनिया में निकल गई हो
मैं ख़ुश हूँ सोचकर
कि मेरी भाषा के अहाते से परे है तुम्हारी परछाई..!!
Writer रामकृष्ण गौतम पर रविवार, जून 21, 2009 4 Responzes
FATHER'S डे...
Writer रामकृष्ण गौतम पर रविवार, जून 21, 2009 2 Responzes
शनिवार, जून 20, 2009
माँ.. तू जो नही है तो...
सर पे माँ बाप का साया भी ग़ज़ल जैसा था
मुक़द्दस मुस्कुराहट माँ के होंठों पर लरज़ती है
किसी बच्चे का जब पहला सिपारा ख़त्म होता है
मैं वो मेले में भटकता हुआ इक बच्चा हूँ
जिसके माँ बाप को रोते हुए मर जाना है
घेर लेने को मुझे जब भी बलाएँ आ गईं
ढाल बन कर सामने माँ की दुआएँ आ गईं
मिट्टी लिपट—लिपट गई पैरों से इसलिए
तैयार हो के भी कभी हिजरत न कर सके
मुफ़्लिसी ! बच्चे को रोने नहीं देना वरना
एक आँसू भरे बाज़ार को खा जाएगा...
लेबल: आई लव यू मॉम, बच्चा, माँ बाप. ग़ज़ल, साया
Writer रामकृष्ण गौतम पर शनिवार, जून 20, 2009 2 Responzes
गुरुवार, जून 18, 2009
कुछ चुभ रहा है..!
लेबल: एहसास, चाहत, चुभन, भावनाएं, वो, हम
Writer रामकृष्ण गौतम पर गुरुवार, जून 18, 2009 1 Responzes
मंगलवार, जून 16, 2009
एक सपना.... नाम कमाना है....
कहते थे बेटे! तुम्हें नाम कमाना है...
पैसे तो सभी कमा लेते हैं...
कभी पैसा कमाने के लिए कोई ग़लत काम मत करना...
क्योंकि ग़लत काम करने से पैसा तो खूब मिलता है
पर नाम नही मिलता और तुम्हें नाम कमाना है...
Writer रामकृष्ण गौतम पर मंगलवार, जून 16, 2009 3 Responzes
सोमवार, जून 15, 2009
सभ्यता..!
Writer रामकृष्ण गौतम पर सोमवार, जून 15, 2009 6 Responzes
शुक्रवार, जून 12, 2009
माँ तुम हो या मेरा भ्रम है..?
माँ बेसाख़्ता आ जाती है तेरी याद
दिखती है जब कोई औरत..।
घबराई हुई-सी प्लेटफॉम पर
हाथों में डलिया लिए
आँचल से ढँके अपना सर
माँ मुझे तेरी याद आ जाती है..।
मेरी माँ की तरह
उम्र के इस पड़ाव पर भी घबराहट है
क्यों, आख़िर क्यों ?
क्या पक्षियों का कलरव
झूठमूठ ही बहलाता है हमें ..?
लेबल: उमर, दलीय, प्लेटफार्म, भ्रम(झूटमूठ), माँ, याद
Writer रामकृष्ण गौतम पर शुक्रवार, जून 12, 2009 3 Responzes
अपने हाथों से पिलाया कीजिए...

रोज़ मैख़ाने में आया कीजिये
छोड़ भी दीजिये तकल्लुफ़ शेख़ जी
जब भी आयें पी के जाया कीजिये
ज़िंदगी भर फिर न उतेरेगा नशा
इन शराबों में नहाया कीजिये
ऐ हसीनों ये गुज़ारिश है मेरी
अपने हाथों से पिलाया कीजिये
"हसरत जयपुरी"
लेबल: ग़म, तक़ल्लुफ़, मैखाना, शेखजी
Writer रामकृष्ण गौतम पर शुक्रवार, जून 12, 2009 8 Responzes
बुधवार, जून 10, 2009
उदासी के मंज़र...

उदासी के मंज़र मकानों में हैं
के रंगीनियाँ अब दुकानों में हैं।
मोहब्बत को मौसम ने आवाज़ दी
दिलों की पतंगें उड़ानों में हैं।
इन्हें अपने अंजाम का डर नहीं
कई चाहतें इम्तहानों में हैं।
न जाने किसे और छलनी करेंगें
कई तीर उनकी कमानों में हैं।
दिलों की जुदाई के नग़मे सभी
अधूरी पड़ी दास्तानों में हैं।
वहाँ जब गई रोशनी डर गई
वो वीरानियाँ आशियानों में हैं।
ज़ुबाँ वाले कुछ भी समझते नहीं
वो दुख दर्द जो बेज़ुबानों में हैं।
परिंदों की परवाज़ कायम रहे
कई ख़्वाब शामिल उड़ानों में हैं।
लेबल: इम्तिहानो, उड़ान, उदासी, ख्वाब, बेजुबान, मकानों, मोहब्बत, वीरानिया
Writer रामकृष्ण गौतम पर बुधवार, जून 10, 2009 3 Responzes
रविवार, जून 07, 2009
मेरा क्या जाता है..?
कभी कोई उसे मुसीबत में दिख भी जाता और उससे मदद
बरसात का मौसम था, बच्ची को जोरों से बुखार आया था।
वह बच्ची की बीमारी को दूर करने के लाख कोशिश कर चुका था।
सारे दांव फेल हो चुके थे। वह बहुत घबरा गया और
लेबल: ..?, क्या, जाता, मेरा, है
Writer रामकृष्ण गौतम पर रविवार, जून 07, 2009 2 Responzes
माँ...
अचानक एक पिचहत्तर साल के करीब की बुजुर्ग महाशय के पास आई और बोली -
बेटा! भोजन का समय हो गया है! महाशय ने ध्यान नही दिया...
बुजुर्ग ने फ़िर कहा - मेरे लाल! भोजन ठंडा हो रहा है!
महाशय गुस्से में आ गए और बोले - चुप भी कर ''माँ'',
तेरे आँख फूट गए हैं क्या?
देखती नही कल कोलेज में मेरा लेक्चर है...
"माँ" पर कविता लिख रहा हूँ..!!
लेबल: बेटा, माँ, माँ पर कविता, मेरे लाल
Writer रामकृष्ण गौतम पर रविवार, जून 07, 2009 2 Responzes
गुरुवार, जून 04, 2009
मैं कहाँ हूँ...?
मेरी साँसों में,
Writer रामकृष्ण गौतम पर गुरुवार, जून 04, 2009 2 Responzes
च्वाइस...
उसने मुझसे कहा आप आर्डर कीजिए।
मैंने कहा तुम आर्डर दो, मुझे आर्डर देना नहीं आता।
मेरी "च्वाइस" अच्छी नहीं है!!
उसने बड़े ही सहज भाव से उत्तर दिया-
मैं भी तो आपकी ही "च्वाइस" हूँ!!
Writer रामकृष्ण गौतम पर गुरुवार, जून 04, 2009 5 Responzes
सोमवार, मार्च 16, 2009
झूठा कहीं का..!
मन की इक बात
मन ही में रह जाती है...
रोज़ कहता हूँ खुद से
कि
आज कहकर ही दम लूँगा...
झूठा साबित होता हूँ
जब...
Writer रामकृष्ण गौतम पर सोमवार, मार्च 16, 2009 1 Responzes
शनिवार, फ़रवरी 28, 2009
जेहन में कौंधती एक सोच!
मैं तो लोगों के लिए
एक सीढ़ी हूँ
जिस पर पैर रखकर
उन्हें ऊपर पहुँचना है
तब सीढ़ी का क्या अधिकार
कि वह सोचे
कि किसने धीरे से पैर रखा
और कौन उसे
रौंदकर चला गया।
Writer रामकृष्ण गौतम पर शनिवार, फ़रवरी 28, 2009 1 Responzes
ऐसे जीवन से मौत भली!
हमने अपने जीवन में कई ऐसे उदाहरण देखे हैं जिनसे हमें काफी कुछ सीखने को मिलता है...
रामायण तो हम सभी ने देखी है... हाँ! ज़रूर देखी है... उसमे हमने देखा है कि श्रीराम अपने कर्मों के बल पर मर्यादापुरुषोत्तम कि उपाधी से नवाजे जाते हैं... " रघुकुल रीति सदा चली आई, प्राण जाये पर वचन न जाई! " वाली बात शायद उन्ही के जीवनकाल से चरितार्थ हुई... उन्होंने अपनी आने वाली पीढी के लिए कई मील के पत्थर स्थापित किये... और सन्देश दिया कि जिंदगी मिली है तो इसका सदुपयोग करो... मानव जीवन ऐसे ही नहीं मिलता... उसके मिलने के पीछे बहुत बड़ा उद्देश्य छिपा होता है... पिता के आदेश के पालन के लिए उन्होंने अपना जीवन बलिदान करने की ठान ली... और चल पड़े चौदह साल का बनवास काटने... एक ही पत्नी को लेकर पूरा जीवन काट दिया... पत्नी दूर हो गयी फिर भी दूसरी शादी नहीं की... भाई भी बने तो बेमिसाल... कहने का मतलब है कि उन्होंने हर क्षेत्र में मिसाल कायम किया... बचपन से लेकर जवानी के सुनहरे युग तक उन्होंने कभी अपने मन को नहीं सुना... सदा ही माता-पिता, पत्नी-भाई और प्रजा कि सुनते रहे... कभी भी अपना जीवन नहीं जिया... अपना जीवन उन्होंने दूसरों के नाम कर दिया... तभी तो इतने महान बने कि दुनिया ने उन्हें भगवान् कहना शुरू कर कर दिया... और अब तो उनकी पूजा भी होने लगी है (मैंने जब से अनुभव किया है तब की बात कर रहा हूँ, इससे पहले का मुझे नहीं पता, मैं खुद उन्हें अपना इष्ट मानता हूँ!)... इतना सब बताकर मैं ये नहीं कहना चाहता कि दुनिया हर इंसान भगवान् बनने की कोशिश में लग जाए... ऐसा कतई संभव नहीं है... प्रकृति का नियम टूट जाएगा... मेरे कहने का मतलब है कि जीवन का सदुपयोग होना चाहिए... हम सभी को अपने अन्दर छिपी शक्ति को पहचानना चाहिए...एक उदाहरण देता हूँ... आज की युवा वर्ग का (उनमे मैं खुद भी शामिल हूँ)... अक्सर ऐसा देखने में आया है कि हम युवा जितनी फिक्र अपनी गर्लफ्रेंड या पत्नी की करते हैं... उसका दस फीसदी भी अपने माता-पिता या परिवार की फिक्र करते हैं...?? शायद नही! पापा या भैया का काल यदि गर्लफ्रेंड के सामने आ जाता है तो उठाते ही नहीं... और यदि गर्लफ्रेंड ने पूरे परिवार के सामने काल किया तो उसका काल काटकर उसे कालबेक करेंगे और बड़ी ही बेशर्मी के साथ घर वालों के सामने उससे बात करने लगेंगे... क्या यह घर के संस्कारों का नतीजा है? कतई नहीं! यह हमारी दूषित मानसिकता और अपने अन्दर छिपे SplitPersonality (दोहरा स्वाभाव) को अपने पर हावी होने देने का परिणाम है... यह सब देखकर मुझे शर्म आती है कि मैं भी आज की युवा पीढी में गिना जाता हूँ... मुझे जब कोई युवा या जवान कहता है तो मुझे लगता है मानो कोई मेरे "मानव" होने का मजाक उड़ा रहा है... धिक्कार है ऐसी ज़वानी पर जो माँ की आँचल और पिता के स्नेह से विमुख होकर पत्नी या गर्लफ्रेंड की पल्लू से चिपका रहता है... धिक्कार है ऐसे जीवन पर जो भाई के प्यार को छोड़कर किसी गार्डन में एक अजनबी लड़की के कंधे पर हाथ डालकर बैठा है... छी!! क्या करना ऐसे जीवन और ऐसी जवानी का॥ जो खुद के परिवार को छोड़कर कहीं और अपना दुःख-सुख बाँट रहा है...?? अरे रामजी भी तो जवान थे... और वो तो कुछ भी कर सकते थे... राजा के बेटे थे... उनके पास अपार सम्पत्ति भी थी... पर उन्होंने हमेशा ही अपने परिवार को लेकर चलना उचित समझा... अब कुछ लोग कहेंगे कि भाई! वो तो भगवान् थे... उन्हें तो रावन का नाश करके अपना काम करना था... लीला कर रहे थे वो... ऐसा सोचने वालों को एक बात बता दूं कि वो भगवान् बनकर पैदा नहीं हुए थे... उन्होंने खुद में ऐसे गुण पैदा किये जिनसे उन्हें भगवान् कहा जाने लगा... हम भी ऐसा कर सकते है॥ पर गर्लफ्रेंड से बतियाने से फुरसत मिले तब न... मैं किसी युवा भाई पर आक्षेप नही कर रहा हूँ... अगर किसी युवा भाई को मेरे इस लेख से दुःख हो तो मैं क्षमा चाहूँगा... मैं तमाम युवा बंधुओं से गुजारिश करूंगा की मेरे प्यारे! भाइयो गर्लफ्रेंड के बीस मिनट के प्यार के लिए माँ की बीस साल की ममता को मत ठुकराओ... अगर अपनी माँ, अपने पिता को ही नहीं मानोगे तो ऐसे जीवन का करना ही क्या..??
ऐसे जीवन से मौत ही भली...!!!
न माया चाहिये;
लेबल: जीवन, पिता, भाई, मर्यादापुरुषोत्तम, माता, रामायण, श्रीराम
Writer रामकृष्ण गौतम पर शनिवार, फ़रवरी 28, 2009 2 Responzes
रविवार, फ़रवरी 22, 2009
सोचता हूँ, सोचना अब बंद ही कर दूं!
इंसान की जिंदगी में कई बार ऐसे पल आते हैं, जब उसे काफी कुछ सोचना पड़ता है... यहाँ तक कि वह खुद को भूल जाता है... यकीन मानिए ऐसा होता है... ऐसा वाकई होता है...वह इतना सोचता है कि सोचने के अलावा उसके पास कोई और रास्ता ही नहीं होता...कभी सोचता है कि मैं क्या सोच रहा हूँ, कभी सोचता है कि मैं इतना क्यों सोचता हूँ...और कभी वह सोचता है कि मुझे क्या सोचना है॥? किसके बारे में सोचना है..?और इन्ही सब के चलते उसकी सोच ही बदल जाती है... कभी-कभी तो वह सोचने में इतना मशगूल हो जाता है कि सोचना ही भूल जाता है...इसे मानवीय प्रकृति कहते हैं... वैसे ऐसा हर किसी के साथ नहीं होता...ऐसा उनके साथ होता है जो सोचना जानते हैं... ऐसा एक जीता जागता उदाहरण भी मैंने देखा है...मेरे बड़े भाई के रूप में... वैसे उनको "बड़ा भाई" इसलिए कहा रहा हूँ क्योंकि उनका परिचय देने के लिए कोई न कोई संबोधन तो देना ही पड़ेगा... और उनको "बड़ा भाई" कहने में मैं फक्र महसूस करता हूँ... अगर उनको मैं अपना खुदा कहूं तो अतिसंयोक्ति नहीं होगी... वो वाकई में मेरे लिए किसी खुदा से कम नहीं हैं... कहते हैं न कि "खुदा" हमेशा अपने बन्दों के लिए "खुद" से ज्यादा सोचते हैं... उन्होंने हमेशा अपने छोटे भाई किशन (वो मुझे प्यार से किशन कहते हैं) के लिए खुद से कहीं ज्यादा सोचा है और किया है... पर मेरे खुदा कि एक बात मुझे ठीक नहीं लगती..! उनका मेरे बारे में इतना ज्यादा सोचना! जब वो भोजन करते हैं तो सोचते हैं कि मेरे किशन ने भोजन किया होगा कि नहीं..? वो कहीं भूखा तो नहीं होगा..? जब वो सोते हैं तो सोचते हैं कि मेरा किशन अभी भी अपने ऑफिस में काम पर लगा होगा... जब वो कहीं घुमते हैं तो सोचते हैं कि मेरे किशन के क्या हाल होंगे..? मैं जब उनके पास होता हूँ तो मुझे हमेशा एक पिता कि तरह समझाते हैं... वो मुझे हमेशा मार्गदर्शित करते हैं... मेरे भैया दिल्ली में हैं और वो "आईएएस" के मेन एग्जाम की तयारी कर रहे हैं... मैंने अपने जीवन में उनकी तरह महत्वकांक्षी व्यक्ति नहीं देखा..! सच कहता हूँ... नहीं देखा... वो मुझे बहुत प्यार करते हैं... ये केवल कहने की बात नहीं... सच में ऐसा ही है...वो मेरे बारे में इतना सोचते हैं... ये मेरे लिए बहुत ही सौभग्य की बात है... अब मैं भी सोचने लगा हूँ... मैं सोचता हूँ की जब वो मेरे बारे में इतना सोचता हैं तो मुझे किसी के बारे में सोचने की कोई ज़रुरत नहीं है... "सोचता हूँ सोचना अब बंद ही कर दूं!"
लेबल: आइएएस, किशन, दिल्ली, पिता, बड़े भइया, सोचना
Writer रामकृष्ण गौतम पर रविवार, फ़रवरी 22, 2009 5 Responzes
शनिवार, फ़रवरी 21, 2009
जिंदगी, जिंदगी!!
- "जिंदगी!" सुनने में यह शब्द बहुत ही कर्णप्रिय लगता है,
- पर कभी सोचा है की ये "जिंदगी" है क्या..?
- किसे कहते है "जिंदगी"..?
- हाँ! पहले कुछ बुद्धिजीविओं की इसके बारे में परिभाषाएं
- ज़रूर पढ़ी है... उनके मुताबिक "जिंदगी" एक संघर्ष है...
- "जिंदगी" कुछ कर दिखने का नाम है...
- "जिंदगी" खुलकर जीने को कहते हैं... वगैरह, वगैरह!
- पर सही मायनों में "जिंदगी" की परिभाषा इनमे से कुछ भी नही है...
- ये मैं नही कह रहा हूँ और न ही इतनी बड़ी बात कहने की मुझमे क्षमता है,
- ये मेरा अब तक का निष्कर्ष कहता है!
- मैंने अपनी बाईससाल की "जिंदगी" में ऐसे कई उदाहरण देखे हैं॥
- जिनसे मैने यह निष्कर्ष निकाला है! वैसे इस निष्कर्ष के बाद भी मुझे कई ऐसे
- उदाहरण देखने को मिले हैं, जिनसे मैं एक और निष्कर्ष पर पहुँचा!
- और वो यह है "जिंदगी" न तो कोई जंग है और ही कोई संघर्ष!
- "जिंदगी" एक कहानी है और हम उसके पात्र ! कोई माँ के किरदार में है
- तो कोई पिता के, कोई भाई बना है तो कोई दोस्त!
- किसी ने पत्नी की भूमिका में है तो कोई बेटा या बेटी के रोल में!
- सबके डायलौग भी फिक्स हैं!
- जिसे विलेन का किरदार मिला है उसका संवाद निगेटिव है और जो हीरो है या
- हीरो के सहायक हैं उनका संवाद ऐसा है जो दर्शकों को पसंद आए!
- बाकि सब तो ठीक है पर दर्शक कौन हैं...?
- दर्शक! दर्शक भी हम में से ही होते हैं...
- कुछ दर्शक हीरो के पक्ष में होते हैं तो कुछ विलेन के!
- कहानी चलती रहती है और एक वक्त ऐसा आता है जब कहानी अपने अन्तिम
- स्टेप की ओर यानी पूर्णता की ओर अग्रसर होती है...
- अब शुरू होता है कहानी का क्लाईमेक्स...
- बेटे को पिता की याद आती है... माँ अपने बेटे को पहचानती है और
- पत्नी को पति की याद आती है...
- बस! इन्ही सारी बातों के इर्द-गिर्द घूमती "जिंदगी" की कहानी ख़त्म हो जाती है...
- और फ़िर शुरू होता है एक नया अध्याय "जिंदगी" का...!!!
लेबल: "जिंदगी", अंत, कहानी, किरदार, पात्र
Writer रामकृष्ण गौतम पर शनिवार, फ़रवरी 21, 2009 5 Responzes
रविवार, फ़रवरी 15, 2009
जीवन की आपाधापी में!!

जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला,
मैं खड़ा हुआ हूँ इस दुनिया के मेले में,
हर एक लगा है अपनी अपनी दे-ले में,
आ गया कहाँ, क्या करूँ यहाँ, जाऊँ किस जा?
फिर एक तरफ से आया ही तो धक्का-सा
मैंने भी बहना शुरू किया उस रेले में,
क्या बाहर की ठेला-पेली ही कुछ कम थी,
जो भीतर भी भावों का ऊहापोह मचा,
जो किया, उसी को करने की मजबूरी थी,
जो कहा, वही मन के अंदर से उबल चला,
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।
मेला जितना भड़कीला रंग-रंगीला था,
मानस के अन्दर उतनी ही कमज़ोरी थी,
जितना ज़्यादा संचित करने की ख़्वाहिश थी,
उतनी ही छोटी अपने कर की झोरी थी,
जितनी ही बिरमे रहने की थी अभिलाषा,
उतना ही रेले तेज ढकेले जाते थे,
क्रय-विक्रय तो ठण्ढे दिल से हो सकता है,
यह तो भागा-भागी की छीना-छोरी थी;
अब मुझसे पूछा जाता है क्या बतलाऊँ
क्या मान अकिंचन बिखराता पथ पर आया,
वह कौन रतन अनमोल मिला ऐसा मुझको,
जिस पर अपना मन प्राण निछावर कर आया,
यह थी तकदीरी बात मुझे गुण दोष न दो
जिसको समझा था सोना, वह मिट्टी निकली,
जिसको समझा था आँसू, वह मोती निकला।
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।
मैं कितना ही भूलूँ, भटकूँ या भरमाऊँ,
है एक कहीं मंज़िल जो मुझे बुलाती है,
कितने ही मेरे पाँव पड़े ऊँचे-नीचे,
प्रतिपल वह मेरे पास चली ही आती है,
मुझ पर विधि का आभार बहुत-सी बातों का।
पर मैं कृतज्ञ उसका इस पर सबसे ज़्यादा
नभ ओले बरसाए, धरती शोले उगले,
अनवरत समय की चक्की चलती जाती है,
मैं जहाँ खड़ा था कल उस थल पर आज नहीं,
कल इसी जगह पर पाना मुझको मुश्किल है,
ले मापदंड जिसको परिवर्तित कर देतीं
केवल छूकर ही देश-काल की सीमाएँ
जग दे मुझ पर फैसला उसे जैसा भाए
लेकिन मैं तो बेरोक सफ़र में जीवन के
इस एक और पहलू से होकर निकल चला।
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।
♥♪ रचनाकार - डॉक्टर हरिवंश राय बच्चन
लेबल: अभिलाषा, ख्वाहिश, जीवन, बच्चन जी, मजबूरी, संघर्ष
Writer रामकृष्ण गौतम पर रविवार, फ़रवरी 15, 2009 1 Responzes
शुक्रवार, फ़रवरी 13, 2009
राम की राह पर चलें या कृष्ण की राह पर..??
हिंदू माइथॉलजी में जो दो प्रधान नायक हैं - राम और कृष्ण - उनमें दो मामलों के अलावा एक खास फ़र्क है प्रेम के मामले में उनका रवैया। इस मुद्दे पर दोनों में इतना ज़्यादा अंतर है कि हैरत होती है यह सोचकर करोड़ों हिंदू इन दोनों को एकसाथ कैसे स्वीकार कर पा रहे हैं! राम एकनिष्ठ हैं। सीता के अलावा वह किसी और नारी की ओर नज़र भी नहीं उठाते। सीता का त्याग करने के बाद उन्होंने किसी और से शादी नहीं की और वाल्मीकि रामायण में वर्णन है कि सीता के विरह में उन्होंने कितना कष्ट उठाया। दूसरी तरफ कृष्ण के बारे में माना जाता है कि उनकी 16 हज़ार रानियां थीं और 8 पटरानियां। राधा जो उनकी मामी लगती थीं और जिनसे उनका विशिष्ट प्रेम संबंध था , वह इनसे अलग थीं। अगर यह मान भी लिया जाए कि 16 हज़ार का आंकड़ा कुछ ज़्यादा ही है और कपिल देव की भाषा में यह बात कुछ हज़म नहीं होती , तब भी यह तो कहा ही जा सकता है कि प्रेम के मामले में कृष्ण एक से बंधे नहीं रहे।
इन दोनों नायकों के परस्परविरोधी चरित्रों को एक ही मानने और समझाने की आध्यात्मिक कोशिशों से बचते हुए हम यहां एक ही सवाल करेंगे - क्या राम की एकनिष्ठता ही हर प्रेमी का आदर्श होना चाहिए ? दूसरे शब्दों में वही सवाल - क्या कृष्ण का कई स्त्रियों से प्रेम उनके प्यार को छिछला बना देता है ? इन प्रश्नों का आध्यात्मिक उत्तर हम नहीं खोजेंगे क्योंकि अवतारों का चरित्र विश्लेषण यहां हमारा मकसद नहीं है। कसौटी पर है हमारा मन जो राम को आदर्श और कृष्ण के यथार्थ के बीच झूलता रहता है। आगे बढ़ने से पहले हम एक सवाल का जवाब दे दें। क्या मनुष्य स्वभाव से एकनिष्ठ है ? नहीं है। क्यों नहीं है ? इसलिए नहीं है कि कोई भी इंसान पर्फेक्ट नहीं है। ऐसा कोई नहीं है कि उसमें दुनिया के सारे गुण हों - न आप ऐसे हैं न मैं न कोई और। एक व्यक्ति में कुछ गुण है तो दूसरे में कोई और गुण हैं। इसलिए आपको कभी कोई अच्छा लगता है तो कभी कोई और और इस तरह आप एकसाथ या एक के बाद एक कई लोगों से प्यार करते हैं। हां , यह सही है कि इन सभी से प्यार एक जैसी गहराई से नहीं होता और यह भी मुमकिन हो कि कोई प्रेम संबंध एक पल का हो और कोई उम्र भर का। यह निर्भर करता है उस व्यक्ति के रिस्पॉन्स पर जिसे आप प्यार करते हैं। अगर उसकी प्रतिक्रिया पॉज़िटिव रही तो प्यार परवान चढ़ता है वरना धीरे-धीरे खत्म हो जाता है।
क्यों होता है प्यार ...?
प्रेम आम तौर पर पांच कारणों से होता है - रूप , व्यवहार , गुण , साथ और ***! सभी आपको सुख देते हैं। एक सुंदर चेहरा या बदन आंखों को सुख देता है। कोई अगर कटरीना कैफ का फैन है और उसकी तस्वीरें दीवारों पर लगाता है तो उसका कारण यही है कि कटरीना का सुंदर चेहरा उसे सुख देता है। वह जवाब में कटरीना से डायरेक्टली कुछ नहीं पा रहा , यह अलग बात है लेकिन वह जो दीवानगी शो कर रहा है , वह एक तरह का प्यार ही है। ऑफिस में कुछ शक्लें हमें अच्छी लगती हैं तो इसका मतलब यह कि आप शक्ल के कारण उस व्यक्ति से प्यार करते हैं। इसी तरह राह चलते भी हमें कोई सूरत भली लग जाती है। यह एक लम्हे का प्यार है। अच्छे व्यवहार के कारण भी कोई एक या कई लोग आपको प्यारे लग सकते हैं। आप अपने पति या पत्नी से कितने ही संतुष्ट क्यों न हों लेकिन अगर दफ्तर में कोई कॉलीग आपको बिना किसी स्वार्थ के लंच टाइम में पराठा या इडली शेयर करने का ऑफर दे तो उसके व्यवहार के आकर्षण को आप किस तरह नकार पाएंगे ? उसका ऑफर बताता है कि उसे आपका साथ प्रिय है , वह आपको खुश करना चाहता/चाहती है , और इसीलिए वह आपको कुछ दे रहा/रही है।
अब अगर आप भी एक सेंसिटिव व्यक्ति हैं तो आप भी उसे कुछ देंगे ही। यह देना एक कप स्पेशल चाय के रूप में हो सकता है। लेकिन एक बात यहां ध्यान देने की है - अगर यह देना सिर्फ कर्ज़ उतारने के लिए है तो यह एक सौदा होगा। परंतु यदि आप उसकी भावना की कद्र करते हुए उसे चाय पर बुलाते हैं तो आप मानें या न मानें , आपको उससे प्यार हो गया है। गुण की वजह से भी प्यार हो सकता है बशर्ते आपको उस गुण की कद्र हो। और अगर वह गुण ऐसा हो जो आपके जीवनसाथी में नहीं है तो यह बहुत ही तगड़ा आधार बन सकता है एक्स्ट्रा-मैरिटल प्रेम का। किसी का पति अगर रात को शराब पीकर आता हो , गाली-गलौज करता हो , पत्नी और बच्चों को पीटता हो , तो वह परेशान स्त्री पड़ोस में रहनेवाले उस सज्जन पुरुष को क्यों नहीं सराहेगी जो वक्त पर घर आता हो और पत्नी और बच्चों के साथ घूमने निकलता हो ! साथ रहने से भी आत्मीयता पैदा होती है। शादी के बाद साथ रहते-रहते जो प्रेम उत्पन्न होता है , उसका एक बड़ा कारण साथ रहना भी है। वैसे साथ रहना जहां प्रेम को जन्म देता है , वहीं वह रिश्ते में उकताहट का कारण भी है। प्रेम इस वजह से कि बहुत-कुछ मिल रहा है और बोरियत इस वजह से कि नया कुछ नहीं मिल रहा है। *** के कारण आकर्षण के बारे में ज़्यादा कुछ कहने की ज़रूरत नहीं है। यह ज़्यादा तीव्र होता है क्योंकि इसके साथ बायलॉजिकल कारण जुड़े रहते हैं। लेकिन इसे हम केवल देह का मामला नहीं मान सकते। यह पूरी तरह व्यक्ति से जुड़ा है वरना इंसान प्रेम किसी से करता , *** किसी और से। ऐसा अक्सर नहीं होता। और जहां होता है , वहां हम इसे प्यार नहीं मानते। किसी में नहीं हैं सारी खासियतें प्रेम इन पांच में से किसी एक या एक से ज़्यादा कारणों से हो सकता है। किसी से हम व्यवहार के कारण प्यार कर सकते हैं तो किसी से गुणों के कारण और किसी से रूप के कारण। किसी में गुण और व्यवहार दोनों ही प्यार का कारण बन सकते हैं। लेकिन ये सारे प्यार कितने टिकाऊ होंगे , यह इस पर भी निर्भर करता है कि जिसे या जिन्हें आप प्यार करते हैं , उसे या उन्हें आपमें प्यार करने के कौनसे और कितने कारण मिलते हैं। जैसे आपको कोई किसी कारण अच्छा लग सकता है लेकिन यह भी तो ज़रूरी है कि उसे या उन्हें भी आप अच्छे / अच्छी लगें। तभी मामला जमता है वरना एकतरफा प्यार ज़्यादा दिन नहीं चलता और वह किसी और विकल्प ढूंढने में लग जाता है। कॉलीग के लंच शेयर करने का उदाहरण फिर उठाते हैं। अगर वह सहकर्मी अगले दिन किसी और के सामने वही प्रस्ताव करे तो आपका यह भ्रम टूटता है कि उसे आपका ही साथ प्रिय था। पता चलता है कि उसे साथ देने के लिए कोई व्यक्ति चाहिए था - कल आप थे , आज कोई और है। यानी उसने अपनी ज़रूरत पूरी की।
ऐसे में आप (1) किसी और टिफिन शेयर करनेवाले / वाली को ढूंढें , ( 2) अपने कॉम्पिटिटर्स से जलते रहें , ( 3) यह मान ले कि वह प्रेम करने योग्य है ही नहीं क्योंकि उसका यह व्यवहार एक्सक्लूसिवली आपके लिए नहीं है। प्रेम के लिए ज़रूरी है यह एहसास कि मुझमें कुछ खूबियां हैं जिसके कारण लाखों की भीड़ में मुझे चाहा जा रहा है। लेकिन गड़बड़ी यहीं से शुरू होती है। इंसान यह नहीं सोचता कि उसमें कुछ खासियतें हैं न कि सभी खासियतें। किसी एक खासियत के चलते यदि आपसे प्रेम किया जा सकता है तो किसी और खासियत के कारण किसी और से भी। एक लड़की एक साथ दो या तीन लड़कों से प्रेम कर सकती है अगर उसे उन तीनों के प्यार करने लायक अलग-अलग खूबियां मिलें। अगर वह लड़की भी उन तीनों से बराबर प्यार पाए तो उससे सुखी इंसान दुनिया में कोई नहीं है। लेकिन वे तीनों लड़के जो उस लड़की को प्यार कर रहे हैं , उसका पूरा प्यार नहीं पा रहे और यही उनकी ईर्ष्या का कारण बनाता है। एक से ज़्यादा लोगों से प्रेम के मामले में दिक्कत यह है कि यह गणित के नियम को मानता है। प्रेम ज्ञान की तरह बांटने से बढ़ता नहीं। यहा जितना बांटो , उतना घटेगा वाला नियम चलता है।
क्या प्यार मापने का कोई पैमाना है ? प्यार बंटने का मतलब क्या है ? क्या कोई ऐसा पैमाना है जिससे प्यार को मापा जा सके ? बिल्कुल है। और वह यह कि जो कुछ आपके पास है , उसका कितना हिस्सा आप अपने प्रिय को देने के लिए तैयार हैं। जैसे आपके पास 24 घंटे हैं - इनमें से कितने घंटे या मिनट आप अपने प्रिय के बारे में सोचने में खर्च करते हैं या कितना वक्त उसके साथ गुज़ारते हैं या गुज़ारने को तैयार हैं। आपके पास पैसा है - उसका कितना हिस्सा बिना किसी टेंशन के उसके लिए खर्च करने को तैयार हैं। आपका समाज में नाम है , इज़्ज़त है - आप अपने लवर के लिए किस हद तक उस इज़्ज़त को दांव पर लगाने को तैयार हो जाता हैं। जब आपका प्यार बंटता है तो कहने का मतलब यही है कि आपका वक्त बंटता है , आपका खर्च बंटता है , आपकी चिंताएं बंटती हैं। यदि आप किसी एक से ही प्यार करते हैं तो अपने वक्त , दौलत , चिंता का सारा खज़ाना उसी एक पर उड़ेल देते हैं। यदि आप दो या तीन लोगों से प्यार करते हैं तो सभी के हिस्से में आपका थोड़ा-थोड़ा वक्त , दौलत और चिंता आएगी। इसी कारण ऐसे रिश्ते गड़बड़ा जाते हैं जहां किसी रिलेशनशिप में पार्टनर A एकाधिक प्रेम का कृष्ण सिद्धांत अपना रहा है और पार्टनर B एकनिष्ठता का राम सिद्धांत। क्योंकि पार्टनर A - B और C का पूरा-पूरा प्यार पा रहा है लेकिन B और C को A का आधा-आधा प्यार ही मिल रहा है। मैथ की भाषा में A 100 यूनिट प्यार बांट कर 200 यूनिट प्यार पा रहा है जबकि B और C 100-100 यूनिट प्यार देकर 50-50 यूनिट प्यार पा रहे हैं। साफ है कि एक ही व्यक्ति को अपना सारा प्यार देनेवाले घाटे में रहे। अगर B और C भी A के अलावा किसी D या E से प्यार करते तो उनके जीवन में यह कमी नहीं रहती।
इस गड़बड़ी को आम घर-परिवार के खांचे में भी समझा जा सकता है जहां नई बहू आई है। पति अपनी मां , भाई , बहन , पिता आदि सबसे प्रेम करता है इसलिए पत्नी के हिस्से में पति का सेंट-परसेंट प्यार नहीं आता। दूसरी ओर पत्नी अपना सौ फीसदी प्यार पति पर ही बरसाती है क्योंकि घर के बाकी लोगों से उसके आत्मीय संबंध इतनी जल्दी पनप नहीं सकते। ऐसे में पत्नी घाटे में रहती है और वह पति से शिकायत भी करती रहती है कि जितना प्यार वह पति से करती है , उतना वह पा नहीं रही। दूसरी ओर अगर पति अपना सारा प्यार (चिंता , पैसा , वक्त) पत्नी पर ही निछावर कर दे तो मां , बहन , भाई और पिता को प्रॉब्लम होने लगती है क्योंकि उनके हिस्से का प्यार (चिंता , पैसा , वक्त) कम हो गया। इसी कारण संयुक्त परिवार में नई बहू के आते ही टेंशन उत्पन्न होने लगता है। लैला को भुलाया जा सकता है बशर्ते ... एकाधिक प्यार की थियरी से ही निकलता है सही विकल्प का सिद्धांत। इसे समझने के लिए एक उदाहरण की मदद लें। आपको पुलाव पसंद है लेकिन किसी कारण वह आपको नहीं मिल सकता। तो आप क्या करेंगे - परांठे खा लेंगे बशर्ते परांठों से आपको परहेज़ नहीं है। ज़्यादा भूख लगी हो तो परहेज़ को भी तोड़ देंगे या फुल्के खा लेंगे। प्रेम के मामले में भी ऐसा ही है। जिससे प्रेम हो , उसी स्तर का व्यक्ति अगर मिल जाए तो पहलेवाले को भूला जा सकता है। बल्कि उससे कम स्तर का व्यक्ति भी मिले तो उसे चाहा जा सकता है जैसे पुलाव की जगह रोटी से भूख मिटाई जा सकती है। चूंकि प्रेम एक भावना है जो ‘ कोई मेरा और मैं किसी का / की ’ का एहसास कराती है , इसलिए कोई और किसी का रूप बदलने से भावना नहीं बदलती - उसी तरह जैसे एक ही क्वॉलिटी के खाने के आयटम बदलने से भूख का चरित्र और स्वाद का आनंद नहीं बदलता।
प्रेम भी मानसिक भूख ही है। हां , अगर जिसे खोया और जिसे पाया , उन दोनों में स्तर का फर्क हो तो एक अभाव रह जाता है। जैसे एक युवक किसी सुंदर लड़की से प्यार करता था जिसे वह नहीं पा सका। उस लड़की में बाकी जो गुण थे , वे किसी और लड़की में भी थे , बस वह उतनी सुंदर नहीं थी। ऐसे में दूसरी लड़की से शादी करके वह खुश तो रहेगा लेकिन सुंदरता की चाहत पूरी न होने के कारण उसके मन में एक अभाव रहेगा। उस अभाव को पूरा करने के लिए वह आसपास की सुंदर शक्लों को देखकर अपनी प्यास बुझाएगा। कहने का मतलब यह कि अगर मजनूं को लैला जैसी या उससे कमतर प्रेमिका मिल जाती जो उससे उतना ही प्यार करती जितना लैला करती थी तो मजनूं लैला के बगैर भी जी लेता , और उतने ही सुख से जीता।
लेबल: कटरीना, कृष्ण, क्वालिटी, पत्रानियाँ, प्रेम, रानियाँ, राम, राह
Writer रामकृष्ण गौतम पर शुक्रवार, फ़रवरी 13, 2009 1 Responzes
रविवार, जनवरी 25, 2009
मौत से ठन गई!
जूझने का मेरा इरादा न था,
रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई,
मौत की उमर क्या है?
मैं जी भर जिया,
तू दबे पाँव,
मौत से बेख़बर,
बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं,
प्यार इतना परायों से मुझको मिला,
हर चुनौती से दो हाथ मैंने किये,
आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है,
पार पाने का क़ायम मगर हौसला,
मौत से ठन गयी!! मौत से ठन गयी!!
लेबल: इरादा, जीवन, पंडित जी, मैं, मौत, रास्ता, वादा, सत्यता और सार्थकता
Writer रामकृष्ण गौतम पर रविवार, जनवरी 25, 2009 5 Responzes
देश की तस्वीर इनकी नज़र में...
साभार:-गायत्री शर्मा
वर्ष 2008 देश के लिए एक ऐसा निर्णायक वर्ष रहा, जब देश ने कई आतंकवादी धमाकों व राजनीतिक उलटफेर के रूप में कई आघात सहे परंतु इतने पर भी यह देश अपने संस्कारों व अपने जज्बे के कारण उसी हौसले से खड़ा रहा। इस दौर ने देश को जनतंत्र की एक ऐसी आवाज दी, जो शायद कहीं गुम हो चुकी थी। हर व्यक्ति ऊँच-नीच, जाति-पाति के भेदभाव को भुलाकर केवल और केवल अपने देश के बारे में सोच रहा था। इन धमाकों में हमने बहुत कुछ खोया परंतु जो पाया वह शायद खरे सोने के समान शुद्ध था और वह था देशप्रेम का जज्बा, जो हर भारतीय को अपने देश के लिए कुछ कर गुजरने को झकझोर रहा था। यदि हम इस वर्ष के मुद्दों की बात करें तो इस वर्ष आतंकवाद, आसमान छूती महँगाई, शेयर बाजार की गिरावट व भ्रष्ट राजनीति बहस का मुद्दा बनकर सुर्खियों में छाए रहे। वहीं दूसरी ओर देश की लाज बचाई उन जाँबाजों, धुरंदर खिलाडि़यों तथा कलाकारों ने दुनिया के नक्शे पर भारत का नाम रोशन किया। इन सभी ज्वलंत मुद्दों के संदर्भ में हमने 'वर्ष 2008 का आकलन' विषय पर देश की कुछ ख्यातनाम हस्तियों से चर्चा की तो उनका इस विषय में ये कहना था -
वर्तिका नंदा (देश की प्रख्यात युवा पत्रकार) :- मैं मानती हूँ कि हमारे देश के लिए यह वर्ष खट्टा-मीठा और नासमझीभरा रहा। इस वर्ष चर्चा का विषय बने 'आतंकवाद' ने जहाँ लोगों को संगठित होने की शिक्षा दी, वहीं आतंकवादियों के खात्मे ने हमारे होंठों पर जीत की खुशी भी दर्ज कराई। इन हमलों के पूर्व देश में जो सांप्रदायिक मतभेद गहराने लगा था वह सभी आतंकवाद की आड़ में गुम हो गया। लोगों का विरोध खुलकर सामने आया। इन हमलों में किसी हिन्दू या मुस्लिम को चुनकर नहीं मारा गया, बल्कि आम भारतीय को मारा गया। इस वर्ष की एक बहुत अच्छी उपलब्धि यह रही कि कल तक आमजन का पुलिस पर से जो विश्वास उठ गया था तथा जिस खाकी वर्दी को सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा जाता था, अब वह कौम सम्मान की अधिकारी बन गई है। आज मुसीबत के वक्त यही पुलिसकर्मी हमारे काम आए न कि कोई राजनेता। मेरे अनुसार पिछले बीस-बाईस सालों में पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था कि जनता ने सार्वजनिक स्थानों पर खुलकर विरोध प्रदर्शन किया हो। इस वर्ष पहली बार लोगों ने सिरफिरे राजनेताओं को सबक सिखाया। जिस तरह से इन धमाकों में हमारे पुलिस के कई जवान मारे गए, वह बेहद ही दु:ख की बात है। हेमंत करकरे की पत्नी का मीडिया को दिया गया बयान हो या उन्नीकृष्णन के पिता का मुख्यमंत्री को जवाब देने का ढंग, सभी हमारी सच्चाई व ताकत के परिचायक हैं। इस वर्ष की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि इस वर्ष हमने सच को कहना, अपनी गलती स्वीकारना व अपना पक्ष रखना सीखा।
पिछले बीस-बाईस सालों में पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था कि जनता ने सार्वजनिक स्थानों पर खुलकर विरोध प्रदर्शन किया हो। इस वर्ष पहली बार लोगों ने सिरफिरे राजनेताओं को सबक सिखाया।
कुलदीप नैयर (देश के जाने-माने स्तंभकार) :- 'मैं मानता हूँ कि वर्ष 2008 देश के लिए अच्छा रहा। इस वर्ष हमें चुनौतियाँ मिलीं, जिनसे हमने बहुत कुछ सीखा। यह इसी सीख का परिणाम था कि बहुत सालों बाद सार्वजनिक स्थानों पर देशवासियों की एकता देखने को मिली। मैं बहुत अरसे से कोशिश कर रहा हूँ कि भारत और पाकिस्तान के संबंधों में सुधार आए। अब तक इस संबंध में जो भी कोशिशें की गई थीं, इन धमाकों ने उन सब कोशिशों पर पानी फेर दिया। मुझे इस वर्ष एक रिपोर्ट पढ़कर बहुत बुरा लगा कि आज भी देश में गरीबी और महँगाई व्याप्त है। आज भी हमारे देश के 77 प्रतिशत लोग केवल 2 डॉलर पर जीते हैं। आखिर हमें इस गरीबी व महँगाई से कब मुक्ति मिलेगी?
चित्रा मुद्गल (देश की ख्यातनाम लेखिका व समाजसेविका) :- मैं हर चीज को बड़ी ही सकारात्मक दृष्टि से देखती हूँ। आतंकवाद एक चुनौती थी, जिसे इस देश के जनतंत्र ने बड़े ही साहसिक रूप में लिया है। मैं आतंकवाद से भी काफी बड़ी चुनौती महँगाई को मानती हूँ क्योंकि पेट की भूख हर किसी को सताती है तथा इस भूख ने इस बार भी कई लोगों को मौत की नींद सुला दिया। आज भी आलू इस देश में बड़ी मात्रा में पैदा होता है परंतु यहीं पर यह आलू 5 रुपए किलो बिकने के बजाय 15 से 20 रुपए किलो के महँगे दामों पर बिकता है, आखिर क्यों? आखिर क्यों सरकार इसके लिए कोई गाइड लाइन तय नहीं करती?
आज जिस तरह से समाज व देश में असंतुलन की स्थिति है वह बेहद ही चिंताजनक है क्योंकि किसी भी प्रकार का असंतुलन होने पर हम कभी किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पाएँगे।
मुझे लगता है कि यदि सरकार दामों के संबंध में एक गाइड लाइन तय कर दे तो शायद इस आसमान छूती महँगाई पर कुछ हद तक अंकुश लग सकता है। बचपन में हमने स्कूल में पढ़ा था कि भारत एक कृषिप्रधान देश है तब हमने यह नहीं सोचा था कि कल को यहाँ की ही जनता में अनाज के लिए त्राहि-त्राहि मचेगी। आज हमारे देश का माल देश में कम तथा विदेशों में अधिक बेचा जाता है। आज अमीर हो या गरीब हर व्यक्ति अपने पेट की भूख को शांत करने के लिए कमाता है। सरकार को चाहिए कि वह इस दिन-ब-दिन बढ़ती महँगाई पर अंकुश लगाए और देश को विकास की चरम सीमा पर ले जाए। आज महँगाई का तेजी से बढ़ना व नागरिक सुरक्षा के औसत का घटना बेहद ही चिंताजनक विषय है। यह देश हम सभी का है। यह किसी हिन्दू या मुस्लिम का नहीं है। वर्तमान में तुष्टीकरण को लेकर जो भी असंतोष उभर रहा है वह गुब्बारे में सूई की तरह चुभ रहा है। वर्तमान में देश की कानून-व्यवस्था बिगड़ने के जिम्मेदार केवल और केवल इस देश के राजनेता हैं, जो सत्ता की शह और मात में देशवासियों की मासूम जिंदगियों से खेल रहे हैं।
शोवना नारायणन (देश की मशहूर कथक नृत्यांगना) :- हर वर्ष चुनौतियों को लेकर लाता है। वर्ष 2008 भी चुनौतियों से ही भरा था। आज व्यक्ति सोचने पर मजबूर है कि इस देश में आखिर ये क्या हो रहा है? आखिर हम क्या चाह रहे हैं? अब हर व्यक्ति को गंभीरता से इस बारे में सोचना ही होगा क्योंकि व्यक्ति से ही समाज बनता है और समाज से ही कोई देश बनता है। आज जिस तरह से समाज व देश में असंतुलन की स्थिति है वह बेहद ही चिंताजनक है क्योंकि किसी भी प्रकार का असंतुलन होने पर हम कभी किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पाएँगे। निष्कर्ष के रूप में कहा जाए तो अब हमें गंभीरता से यह सोचना चाहिए कि हमें किस राह पर चलना है। हमें मुश्किलों का बहुत ही संजीदा ढंग से हल निकालकर उसका सामना करना चाहिए। मुश्किलें तो आती रहेंगी, उनसे घबराना कायरता होगी। आज हम सभी को इंसानियत व इस देश के बारे में सोचना होगा।
रामकृष्ण गौतम (एक अदना सा युवक) :- देश की असली तस्वीर देश के प्रधानमंत्री "मनमोहन सिंह" की "बाइपास सर्जरी" है...!!!
गुरुवार, जनवरी 22, 2009
मेरी नज़र में तमन्ना!
मेरी नज़र में तमन्ना का मतलब है एक ही दिन में आकाश छू लेने की चाहत! इससे दो फायदे हैं... एक ये कि हमें आकाश कि ऊँचाई का एहसास हो जाएगा और दूसरा हमें ख़ुद कि "औकात" भी मालूम हो जाएगी... वैसे दूसरा फायदा ज़्यादा अच्छा है... क्योंकि स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि "सबसे बड़ा ज्ञानीवही है जो ख़ुद को जानता है" सच है ख़ुद को जानना ही "तमन्ना" कि असली पहचान है...
Writer रामकृष्ण गौतम पर गुरुवार, जनवरी 22, 2009 3 Responzes
विकसित देशों की पहचान!

(1) गुरु : विकसित देश की पहचान बताओ राम ।
राम : विकसित देश कपड़ा नहीं बनाते गुरुदेव।
गुरु : तब वे क्या बनाते हैं?
राम : वे हथियार बनाते हैं।
गुरु : तब वे अपना नंगापन कैसे ढकते हैं?
राम : हथियारों से उनकी नंगई ढक जाती है।
(2) गुरु : विकसित देश की पहचान बताओ राम ।
राम : विकसित देश में लोग खाना नहीं पकाते।
गुरु : तब वे क्या खाते हैं?
राम : वे 'फास्ट फूड` खाते हैं।
गुरु : हमारे खाने और 'फास्ट फूड` में क्या अंतर है।
राम : हम खाने के पास जाते हैं और 'फास्टर फूड` खाने वाले के पास दौड़ता हुआ आता है।
(3) गुरु : राम विकसित देश की पहचान बताओ।
राम : विकसित देशों में बच्चे नहीं पैदा होते।
गुरु : तब कहां कौन पैदा होते हैं?
राम : वहां जवान लोग पैदा होते हैं जो पैदा होते ही काम करना शुरू कर देते हैं।
(4) गुरु : विकसित देश की पहचान बताओ राम ।
राम : विकसित देशों में सच्चा लोकतंत्र है।
गुरु : कैसे हरिराम?
राम : क्योंकि वहां केवल दो राजनैतिक दल होते हैं।
गुरु : तीसरा क्यों नहीं होता?
राम : तीसरा होने से सच्चा लोकतंत्र समाप्त हो जाता है।
(5) गुरु : विकसित देश की पहचान बताओ राम ।
राम : विकसित देशों में आदमी जानवरों से बड़ा प्यार करते हैं।
गुरु : क्यों?
राम : क्योंकि जानवर आदमियों से बड़ा प्यार करते हैं।
गुरु : क्यों नहीं वहां आदमी आदमियों से और जानवरों से प्यार करते हैं?
राम : क्योंकि विकसित देशों में आदमियों को आदमी और जानवरों को जानवर नहीं मिलते।
(6) गुरु : विकसित देश की कोई पहचान बताओ राम ।
राम : विकसित देश विकासशील देशों को दान देते हैं।
गुरु : और फिर?
राम : फिर कर्ज देते हैं।
गुरु : और फिर?
राम : फिर ब्याज के साथ कर्ज देते हैं।
गुरु : और फिर?
राम : और फिर ब्याज ही कर्ज देते हैं।
गुरु : और फिर?
राम : और फिर विकसित देशों को विकसित मान लेते हैं।
(7) गुरु : विकसित देशों की पहचान बताओ राम ।
राम : विकसित देशों में बूढ़े अलग रहते हैं।
गुरु : और जवान?
राम : वे भी अलग रहते हैं।
गुरु : और अधेड़?
राम : वे भी अलग रहते हैं।
गुरु : तब वहां साथ-साथ कौन रहता है?
राम : सब अपने-अपने साथ रहते हैं।
(8) गुरु : विकसित देशों की पहचान बताओ राम ।
राम : विकसित देशों में मानसिक रोगी अधकि होते हैं।
गुरु : क्यों? शारीरिक रोगी क्यों नहीं होते?
राम : क्योंकि शरीर पर तो उन्होंने अधिकार कर लिया है मन पर कोई अधिकार नहीं हो पाया है।
(9) गुरु : विकसित देश की पहचान बताओ राम ।
राम : विकसित देशों में तलाक़ें बहुत होती हैं।
गुरु : क्यों?
राम : क्योंकि प्रेम बहुत होते हैं।
गुरु : प्रेम विवाह के बाद तलाक़ क्यों हो जाती है?
राम : दूसरा प्रेम करने के लिए।
(10) गुरु : विकसित देश की पहचान बताओ राम ।
राम : विकसित देश मानव अधिकारों के प्रति बड़े सचेत रहते हैं।
गुरु : क्यों?
राम : क्योंकि उनके पास ही विश्व की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति है।
गुरु : हरिराम सैन्य शक्ति और मानव अधिकारों का क्या संबंध?
राम : गुरुदेव, विकसित देश सैन्य बल द्वारा ही मानव अधिकारों की रक्षा करते हैं।
Writer रामकृष्ण गौतम पर गुरुवार, जनवरी 22, 2009 1 Responzes
बुधवार, जनवरी 21, 2009
फूल खिल गए लेकिन खुशबु कहाँ..?
Writer रामकृष्ण गौतम पर बुधवार, जनवरी 21, 2009 1 Responzes
मंगलवार, जनवरी 20, 2009
Bharat, Obama and Terrorism
Obama says India’s democracy will win over terrorism
Washington, Friday 28 November 2008: India’s democracy ”will prove far more resilient than the hateful ideology that led to these attacks” in Mumbai, US President-elect Barack Obama said on Wednesday as the world reached out to India in sympathy and support over what American analysts described as “India’s 9/11.”
Both the incumbent Bush administration and Obama and his transition team sent out strong messages of condemnation of the attacks and their backing for India even as they coordinated their response in the transition phase in the United States. President Bush phoned Prime Minister Manmohan Singh from Camp David early on Thursday morning to offer support and US help in investigation. 
Secretary of State Condoleezza Rice briefed Obama over the phone as the White House assembled its national security and intelligence chiefs for discussion and analysis and offered India any help it required.
In comments that extolled India’s institutional strength and was directed against the fundamentalist mindset in the neighbourhood, Obama also predicted the triumph of democracy over the sickening ideology of extremism even as terrorists/mujahideen earned universal disgust over the attack of Indian civilians and foreign nationals.
Writer रामकृष्ण गौतम पर मंगलवार, जनवरी 20, 2009 0 Responzes
एक कड़वा सच अमेरिका के एतिहासिक दिन का...
Writer रामकृष्ण गौतम पर मंगलवार, जनवरी 20, 2009 1 Responzes
रविवार, नवंबर 30, 2008
26 नवम्बर की दर्दीली तारीख..!!!
तारीखें इतिहास में इतने दर्दनाक और मनहूस तरीके से भी दर्ज होती हैं शायद। 26 नवम्बर ऐसी ही तारीख है जिसने अपने चेहरे पर शोक, आंसू, तबाही, बरबादी, भय, बेबसी और अविश्वास की कई इबारतें लिख ली हैं। शनिवार सुबह पूरे 59 घंटे की लगातार जंग के बाद मुंबई को हालांकि सेना के जवानों और मरीन कमांडो ने आतंकियों के कब्जे से आजाद करा लिया, लेकिन इस आजादी की बहुत भारी कीमत देश ने चुकाई है। इस जंग में कई नायाब हीरे शहीद हुए हैं। मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख ने शहीदों के लिए आज मुआवजे की घोषणा की, लेकिन जो नुकसान मारे गए या घायल हुए सैकड़ों हंसते–खेलते–आबाद परिवारों ने झेला है उसे कोई मुआवजा नहीं भर सकता। आज जोर–शोर से जंग में जीत का ऐलान हुआ लेकिन यह जानना कितना विस्मयकारी अनुभव है कि बीस से तीस साल के कुल दस सिरफिरों ने 59 घंटे तक पूरी दुनिया को हिलाये रखा। ताज, आ॓बेरॉय और नरीमन भवन मुक्त करा लिए गए, लेकिन उनकी काफी दुर्दशा हो चुकी है। ताज तथा आ॓बेरॉय के जिस वैभवशाली खुशगवार परिसर में हवाएं भी कुछ देर ठहरना पसंद करती थीं, वहां से आज उन्हें गुजरने में भी डर लग रहा है। मुंबई के वैभव को विनाश की बद्दुआ में अभिशप्त छोड़ दस में से नौ आतंकी मारे गए। एक को पुलिस ने पकड़ा है। सोचिए, इकलौता पकड़ा गया आतंकवादी आजम अमीर कासव (21 वर्ष) भी मारा जाता तो कितने मायूस, लाचार और निहत्थे रह जाते हम। आतंकवादी सरगनाओं तक पहुंचने के तमाम रास्तों की दिशाएं खो जातीं अगर गिरगांव चौपाटी पर हुई मुठभेड़ में अपने साथी आतंकवादी के साथ यह आतंकवादी भी धराशाई हो जाता। 26 नवम्बर का नृशंस नरसंहार इन्हीं दो लड़कों ने शुरू किया था। इनके नरसंहार ने देश–दुनिया के अनेक महत्वपूर्ण, वैभवशाली और प्रतिभावान लोगों को भी मौत की नींद सुला दिया। जैसे-जैसे परतें उघड़ रही हैं दिमाग की सांय–सांय बढ़ रही है। शहर की वर्ली स्थित नामी ‘ताआ॓ आर्ट गैलरी’ के मालिक पंकज शाह भी इस हमले में मारे गए हैं। मशहूर आर्ट डीलर कल्पना शाह के पति पंकज अपने कुछ व्यापारिक मित्रों के साथ आ॓बेरॉय होटल के प्रतििष्ठत कंधार रेस्त्रां में डिनर ले रहे थे। उनके साथ डिनर कर रहे एकमात्र जीवित व्यक्ति अपूर्व ने खुलासा किया है कि कंधार और टिफिन रेस्त्रां में डिनर कर रहे लोगों को आतंकवादी होटल की छत पर ले गए। लाइन में खड़ा किया और गोलियों से उड़ा दिया। अपूर्व इसलिए बच गए क्योंकि उनके आगे खड़ा एक व्यक्ति गोली लगने के बाद उनके ऊपर जोर से गिर पड़ा। उसके साथ अपूर्व भी गिरे। तो भी एक गोली उनकी गर्दन को छूते हुए गुजर गई। मां रक्षमणि बेन शाह, पत्नी कल्पना शाह, बेटी संजना शाह और बेटे सृजन शाह के साथ रहने वाले पंकज शाह का आज शाम साढ़े तीन बजे बाणगंगा, बालकेश्वर में दाह संस्कार कर दिया गया। ‘धमाल‘, ‘स्पीड‘ और ‘ईएमआई‘ जैसी हिट फिल्मों में काम कर चुके युवा अभिनेता आशीष चौधरी ने अपनी बहन और बहनोई को गंवा दिया। बहन मोनिका और बहनोई अजित भी 26 नवम्बर की रात आ॓बेरॉय होटल में डिनर पर गए थे। शुक्रवार को उनकी लाशें बाहर आईं। बताया गया है कि आतंकवादियों ने पहले दोनों के पैरों पर गोली मारी फिर सिर पर वार किया। दोनों अपने पीछे अपने दो अबोध बच्चों (पांच साल की बेटी और आठ साल का बेटा) को छोड़ गए हैं। शहर के एक खेल पत्रकार ने बताया, 26 नवम्बर की रात आ॓बेरॉय होटल में खाना खा रहे कराटे के विश्वप्रसिद्ध कोच दिनशा पर भी आतंक का पहाड़ टूटा। फिटनेस और एडवेंचर पर कई किताबें लिख चुके दिनशा को अस्पताल ले जाया गया जहां 28 नवम्बर की रात उन्होंने दम तोड़ दिया। मुंबई के ठाणे इलाके में रहने वाली एक महिला को उसकी शादी की सालगिरह 27 नवम्बर को पति का शव मिला। ताज होटल में चीफ शेफ जैसी बड़ी नौकरी करने वाले फॉस्टिन मार्टिन हालांकि आतंकियों के चंगुल से निकल गए थे लेकिन इसी होटल के डेटा ऑपरेशन सेंटर में कार्यरत उनकी बेटी प्रिया वहां फंसी रह गई थी। 26 नवम्बर की रात पहली मंजिल पर फंसे फॉस्टिन को रात दो बजे के करीब बाहर निकाल लिया गया था। बाहर आकर फॉस्टिन ने बेटी को फोन किया तो बेटी ने भूख लगने और डरने की बात बताई। भोजन का पैकेट लेकर फिर होटल में घुसे इस चिंतातुर पिता को इस बार आतंकवादियों ने गोलियों से उड़ा दिया। भोजन करते लोगों को मौत की नींद सुला देने की करतूत करने वाले आतंकवादी खुद अपने लिए पूरे तीन दिन का भोजन–पानी लेकर शहर को ध्वस्त करने निकले थे। ताज होटल में फंसे शहर के सबसे बुजुर्ग दंपत्ति सुंदर थडानी (85 वर्ष) और कविता (79 वर्ष) हालांकि इस हादसे से बच निकले भाग्यशाली लोग हैं लेकिन हादसे को याद कर वह अब भी सहम जाते हैं। दोनों एक विवाह समारोह में शामिल होने 26 नवम्बर की रात ताज होटल गए थे। नौ चालीस पर हुई गोलीबारी के बाद मची भगदड़ के दौरान दोनों को सुरक्षाकर्मियों ने कुर्सियों और मेजों से ठसाठस भरे एक कमरे में पहुंचा दिया, जहां पहले से पचास के करीब स्त्री-पुरूष मौजूद थे। इनमें कुछ विदेशी भी थे। आर्थराइटिस की मरीज कविता थडानी ने बताया है, ‘कमरे में सैंडविच और कोल्ड ड्रिंक की व्यवस्था तो थी लेकिन पीने के लिए पानी नहीं था। उस कमरे में टॉयलेट जाने का कोई इंतजाम नहीं था।
Writer रामकृष्ण गौतम पर रविवार, नवंबर 30, 2008 2 Responzes
गुरुवार, नवंबर 27, 2008
कुछ बातें...
दुनिया के दूसरे सफल ब्लोगर "समीर लाल" से मैंने बात की थी, और उनका साक्षात्कार किया था... जिसे मेरे अखबार ने उन्नीस नम्बर के पृष्ठ पर स्थान दिया था... यह इंटरव्यू मैंने छब्बीस नवम्बर २००८ को किया था...
Writer रामकृष्ण गौतम पर गुरुवार, नवंबर 27, 2008 3 Responzes
गौर फरमाएं...
लोग अक्सर कविताओं को पढने की चीज़ मानते हैं, पढ़ते हैं और भूल जाते हैं, फिर एक नई कविता पढ़ते हैं और फिर भूल जाते हैं! यह कविता मुझे पढने लायक तो लगी ही पर साथ ही याद रखने लायक भी लगी रचनाकार किसी की ये रचना मुझे बेहतर लगी और मैंने झट ही इसे अपने ब्लॉग में समा बैठा..!!
Writer रामकृष्ण गौतम पर गुरुवार, नवंबर 27, 2008 3 Responzes
मंगलवार, नवंबर 18, 2008
काना बाती कुर्र, चिड़िया उड़ गई फुर्र...

इधर कुछ दिनों से उसके पति पर चुनाव का भूत सवार था, उठते-बैठते, खाते-पीते, जागते-सोते, नहाते-धोते, बस चुनाव। चुनाव भी क्या, झाड़ू पार्टी का भूत सवार था। झाड़ू पार्टी का बहुमत आएगा, झाडू पार्टी की सरकार बनेगी, क्योंकि झाड़ू पार्टी के प्रधान उनकी जाति के थे। चिड़िया पार्टी तो गई समझो, वह अक्सर गुनगुनाता फिरता था।
काना बाती कुर्र
चिड़िया उड़ गई फुर्र
उसे चिड़िया पार्टी पर काफी गुस्सा था। उनके हलके के विधायक चिड़िया पार्टी के थे और उन्हीं की शिकायत पर उसका तबादला यहां हुआ था। पति उसे पिछले तीन दिन से एक डम्मी मतपत्र दिखलाकर बार-बार समझा रहा था
कि झाड़ू पर मोहर कैसे लगानी है! कागज कैसे मोड़ना है! उसने तो जूते के खाली डिब्बे की मतपेटी बनाकर उसे दिखलाया था कि वोट कैसे डालनी है!
आज वे मतदान केन्द्र पर सबसे पहले पहुँच गए थे। फिर भी आधे घण्टे बाद ही उन्हें अन्दर बुलाया गया। चुनाव कर्मचारी उनकी उतावली पर हँस रहे थे। फिर उसका अँगूठा लगवाकर उसकी अंगुली पर निशान लगाया गया, उसका दिल कर रहा था कि अपनी ठुड्डी पर एक तिल बनवा ले, निशान लगाने वाले से।
पिछले चुनाव में उसकी भाभी ने अपने ऊपरी होठ पर एक तिल बनवाया था। हालाँकि उसका भाई बहुत गुस्साया था, इस बात पर। जब उसकी भाभी हँसती थी तो तिल मुलक-मुलक जाता था। उसकी भाभी तो मुँह भी कम धोती थी उन दिनों, तिल मिट जाने के डर से। पर वह लाज के मारे तिल न बनवा पाई। मर्द जाति का क्या भरोसा, क्या मान जाए क्या सोच ले!
अब उसके हाथ में असली का मतपत्रा था और वह सोच रही थी। यहाँ कालका जी आए उन्हें छह महीने ही तो हुए थे। वह राजस्थान के नीमका थाना की रहने वाली थी और पति महेन्द्रगढ़ जिले का। दोनों ही मरुस्थल के भाग थे। हरियाली के नाम पर खेजड़ी और बबूल बस। उसका पति वन विभाग में कुछ था। क्या था ? पता नहीं। कौन सर खपाई करे !
वह वन विभाग में था, इसकी जानकारी भी उसे यहीं आकर हुई जब वे फारेस्ट कालोनी के एक कमरे के क्वार्टर में रहने लगे। यहाँ आकर चम्पा, हाँ यही उसका नाम था न, बहुत खुश थी। यहीं उसे पता लगा कि चम्पा का फूल भी होता है और वो इतना सुन्दर और खुशबू वाला होता है। और तो और उसकी माँ, चमेली के नाम का फूल भी था, यहाँ। इतनी हरियाली, इतनी साफ-सुथरी आबो-हवा, इतना अच्छा मौसम, जिन्दगी में पहली बार मिला था, उसे। फिर सर्दियों में उसका पति उसे शिमला ले गया था। कितनी नरम-नरम रूई के फाहों जैसी बर्फ थी। देखकर पहले तो वह भौचक्क रह गई और फिर बहुत मजे ले लेकर बर्फ में खेलती रही थी। इतना खेली थी कि उसे निमोनिया हो गया था।
फिर यहाँ कोई काम-धाम भी तो नहीं था उसे। चौका-बर्तन और क्वार्टर के सामने की फुलवाड़ी में सारा दिन बीत जाता था। वहाँ सारा दिन ढोर-डंगर का काम, खेत खलिहान का काम और ऊपर से सास के न खत्म होने वाले ताने। फिर ढेर सारे ननद देवरों की भीड़ में, कभी पति से मुँह भरकर बात भी नहीं हो पाई थी, उसकी।
उसने मतपत्र मेज पर फैला दिया। हाय ! री दैया ! मरी झाडू तो सबसे ऊपर ही थी। उसने और निशान देखने शुरू किए। कश्ती, तीर कमान,। तीर कमान देखकर उसे रामलीला याद आई। उसे लगा चिड़िया उदास है, पतंग हाँ पतंग उसे हँसती नजर आई। साइकल, हवाई जहाज, हाथी सभी कितने अच्छे निशान थे और झाडू से तो सभी
अच्छे थे।
''अभी वह सोच ही रही थी कि निशान कहाँ लगाए? तभी वह बाबू जिसने उसे मतपत्र दिया था बोला-बीबी जल्दी करो और लोगों को भी वोट डालने हैं।''
उसने मोहर उठाई और मेज पर फैले मतपत्र पर झाडू को छोड़कर सब निशानों पर लगा दी और मोहर लगाते हुए वह कह रही थी कि चिड़िया जीते, साइकल जीते, कश्ती जीते पर झाड़ू न जीते।
झाड़ू को जितवाकर वह अपना संसार कैसे उजाड़ ले? हालांकि वह मन ही मन डर रही थी कि कहीं पति को पता न लग जाए।
Writer रामकृष्ण गौतम पर मंगलवार, नवंबर 18, 2008 1 Responzes
सब धोखा है...!!!

ये हुस्न है क्या, ये इश्क है क्या,
सब धोखा है, सब धोखा है,
ये चाँदनी शब्, ये ठंडी हवा,
सब धोखा है, सब धोखा है...
वो कैस की लैला धोखा थी,
वो हीर का राँझा धोखा था,
ये ताज महल, ये लाल किला,
सब धोखा है, सब धोखा है ....
वहां शेख ठगी में माहिर है,
यहाँ साकी चालें चलता है,
वो बुतखाना, ये मयखाना,
सब धोखा है, सब धोखा है ...
अब दरवेशों में काट उमर,
यहाँ दौलत शोहरत छोड़ भी आ,
क्या फरक हुआ, जब जान लिया,
सब धोखा है, सब धोखा है ...
Writer रामकृष्ण गौतम पर मंगलवार, नवंबर 18, 2008 0 Responzes
रविवार, अक्टूबर 26, 2008
अभिकर्ता जुगनू हुए..!
मोर पपिहा खेजडी, करता रहा तलाश ।धीरे धीरे मिट गया, बादल एक आकाश।.टपटप टपके टापरा, पिया गये परडेर ।बरखा से काली पडी, नजर कूप मुण्डेर।.पूरनमासी शरद की, अमी पयस बरसात ।अंक यामिनी गुलमुहर, झुलसा सारी रात।.असली सूरत लापता, मुह खोटे अनगीन।जैसा ओसर सामने, मुखडे पर धर लीन।.हेम रजत झंकार नित, गूंजे जाके कान।गाली सी वाको लगे, आरती अरु अजान।.अंधियारा मावस भरा, रोशन बिन्दु प्रहार।अभिकर्ता जुगनू हुए , चंदा करे व्यापार।
Writer रामकृष्ण गौतम पर रविवार, अक्टूबर 26, 2008 2 Responzes























