शनिवार, जून 27, 2009

मर्द-ए-बाख़ुदा...

इबादत करते हैं जो लोग जन्नत की तमन्ना में
इबादत तो नहीं है इक तरह की वो तिजारत है
जो डर के नार-ए-दोज़ख़ से ख़ुदा का नाम लेते हैं
इबादत क्या वो ख़ाली बुज़दिलाना एक ख़िदमत है
मगर जब शुक्र-ए-ने'मत में जबीं झुकती है
बन्दे की वो सच्ची बन्दगी है इक शरीफ़ाना इत'अत है
कुचल दे हसरतों को बेनियाज़-ए-मुद्द'अ हो जा
ख़ुदी को झाड़ दे दामन से मर्द-ए-बाख़ुदा हो जा
उठा लेती हैं लहरें तहनशीं होता है जब कोई
भरना है तो ग़र्क़-ए-बह्र-ए-फ़ना हो जा

रविवार, जून 21, 2009

प्रेम पिता का...


A VERY VERY HAPPY FATHER's DAY TO ALL...!!!

प्रेम पिता का दिखाई नहीं देता
ईथर की तरह होता है
ज़रूर दिखाई देती होंगी नसीहतें
नुकीले पत्थरों-सी
दुनिया-भर के पिताओं की लम्बी कतार में
पता नहीं कौन-सा कितना करोड़वाँ नम्बर है मेरा
पर बच्चों के फूलोंवाले बग़ीचे की दुनिया में
तुम अव्वल हो पहली कतार में मेरे लिए
मुझे माफ़ करना मैं अपनी मूर्खता और प्रेम में समझा था
मेरी छाया के तले ही सुरक्षित रंग-बिरंगी दुनिया होगी तुम्हारी
अब जब तुम सचमुच की दुनिया में निकल गई हो
मैं ख़ुश हूँ सोचकर
कि मेरी भाषा के अहाते से परे है तुम्हारी परछाई..!!

FATHER'S डे...


WISH YOU ALL BLOGGER'S A VERY-VERY AND UNFORGATABLE FATHER'S DAY..!
21 जून, जिसे हम FATHER'S DAY के रूप में जानते हैं... मनाते हैं तो नही कह सकता... क्योंकि मुझे नही लगता कि सच में कोई मनाता होगा... हो सकता है ये बात कई लोगों को ग़लत लगे या फ़िर इससे किसी के मन को आघात पहुँच सकता है... मैं उन तमाम लोगो से इस बात के लिए क्षमा चाहता हूँ... माफ़ कीजिएगा... लेकिन जो सच है वही लिख रहा हूँ... महज़ SMS कर देने से या फ़िर HAPPY FATHER'S DAY बोल देने से इस दिन का महत्व नहीं बढ़ जाता... अब आप कहेंगे कि "तो भैया तुम ही बता दो न, कैसे बढाएं इस दिन का महत्व..?" मेरा ज़वाब होगा कि पिता आपके भी होंगे अपने हिसाब से तय कीजिए... भई! मैं तो अपनी समझ और उम्र के हिसाब से अपना काम करता हूँ... यकीन न हो किसी दिन मेरे साथ मेरे घर चलिए... आप जान जाएँगे कि कैसे मुझे देखते ही मेरे पिता कि आँखों में आंसू की चमकदार बूंदे पनाह पा लेती हैं... उस वक़्त वो मुझसे ठीक वैसे ही मिलते हैं जैसे कोई सदियों का प्यासा पानी से... खैर अपने पिता के बारे में तो सिर्फ इतना कहूँगा कि I LOVE MY PAPA VERY MUCH...

शनिवार, जून 20, 2009

माँ.. तू जो नही है तो...


मेरा बचपन था मेरा घर था खिलौने थे मेरे
सर पे माँ बाप का साया भी ग़ज़ल जैसा था
मुक़द्दस मुस्कुराहट माँ के होंठों पर लरज़ती है
किसी बच्चे का जब पहला सिपारा ख़त्म होता है
मैं वो मेले में भटकता हुआ इक बच्चा हूँ
जिसके माँ बाप को रोते हुए मर जाना है
घेर लेने को मुझे जब भी बलाएँ आ गईं
ढाल बन कर सामने माँ की दुआएँ आ गईं
मिट्टी लिपट—लिपट गई पैरों से इसलिए
तैयार हो के भी कभी हिजरत न कर सके
मुफ़्लिसी ! बच्चे को रोने नहीं देना वरना
एक आँसू भरे बाज़ार को खा जाएगा...

गुरुवार, जून 18, 2009

कुछ चुभ रहा है..!


वो "हमें" चाहते हुए भी न जाने क्यों दूर जाना चाहती थी...
न जाने क्यों अपनी निगाहों से हटाना चाहती थी...
मिलती थी, बातें भी करती थी पर
अनजानों की तरह...
एक दिन गुमसुम अकेले रो रही थी...
मैं भी वहीं था...
मैंने पूछा क्या हुआ... क्यों रो रही हो?
उसने रोती हुई निगाहों से मेरी ओर देखकर कहा
कुछ नहीं! बस आँखों में कुछ चुभ रहा है..!

मंगलवार, जून 16, 2009

एक सपना.... नाम कमाना है....


उनकी ऊंघती आंखों में एक सपना था...
कहते थे बेटे! तुम्हें नाम कमाना है...
पैसे तो सभी कमा लेते हैं...
कभी पैसा कमाने के लिए कोई ग़लत काम मत करना...
क्योंकि ग़लत का करने से पैसा तो खूब मिलता है
पर नाम नही मिलता और तुम्हें नाम कमाना है...

सोमवार, जून 15, 2009

सभ्यता..!


एक दिन लोगों कि बदलती वेशभूषा देखकर मैंने माँ से कहा- माँ! हम लोग ऐसे क्यों होते जा रहे हैं? माँ ने उत्तर दिया- बेटे! हम लोग सभ्यता की ओर जा रहे हैं!

शुक्रवार, जून 12, 2009

माँ तुम हो या मेरा भ्रम है..?



माँ बेसाख़्ता आ जाती है तेरी याद
दिखती है जब कोई औरत..।
घबराई हुई-सी प्लेटफॉम पर
हाथों में डलिया लिए
आँचल से ढँके अपना सर
माँ मुझे तेरी याद आ जाती है..।
मेरी माँ की तरह
उम्र के इस पड़ाव पर भी घबराहट है
क्यों, आख़िर क्यों ?
क्या पक्षियों का कलरव
झूठमूठ ही बहलाता है हमें ..?

अपने हाथों से पिलाया कीजिए...


इस तरह हर ग़म भुलाया कीजिये

रोज़ मैख़ाने में आया कीजिये

छोड़ भी दीजिये तकल्लुफ़ शेख़ जी

जब भी आयें पी के जाया कीजिये

ज़िंदगी भर फिर न उतेरेगा नशा

इन शराबों में नहाया कीजिये

ऐ हसीनों ये गुज़ारिश है मेरी

अपने हाथों से पिलाया कीजिये




"हसरत जयपुरी"

बुधवार, जून 10, 2009

उदासी के मंज़र...


उदासी के मंज़र मकानों में हैं
के रंगीनियाँ अब दुकानों में हैं।
मोहब्बत को मौसम ने आवाज़ दी
दिलों की पतंगें उड़ानों में हैं।
इन्हें अपने अंजाम का डर नहीं
कई चाहतें इम्तहानों में हैं।
न जाने किसे और छलनी करेंगें
कई तीर उनकी कमानों में हैं।
दिलों की जुदाई के नग़मे सभी
अधूरी पड़ी दास्तानों में हैं।
वहाँ जब गई रोशनी डर गई
वो वीरानियाँ आशियानों में हैं।
ज़ुबाँ वाले कुछ भी समझते नहीं
वो दुख दर्द जो बेज़ुबानों में हैं।
परिंदों की परवाज़ कायम रहे
कई ख़्वाब शामिल उड़ानों में हैं।

रविवार, जून 07, 2009

मेरा क्या जाता है..?


एक महोदय काफी स्वार्थी प्रवृत्ति के थे।
कभी कोई उसे मुसीबत में दिख भी जाता और उससे मदद
की गुजारिश करता तो वह कहता "मेरा क्या जाता है"
और वहां से चला जाता। ऐसे ही सालों गुज़र गए पर
उसका तकिया कलाम वही रहा। एक दिन वह घर पर अपनी
ग्यारह साल की बच्ची के साथ अकेला था।
बरसात का मौसम था, बच्ची को जोरों से बुखार आया था।
वह बच्ची की बीमारी को दूर करने के लाख कोशिश कर चुका था।
सारे दांव फेल हो चुके थे। वह बहुत घबरा गया और
घबराहट की स्थिति में ही दौड़ा-दौड़ा
अपने पड़ोसी के घर गया। उसने गुजारिश की- गौतम जी!
मेरी बच्ची की हालत काफी ख़राब है कृपया अपनी कार
में हॉस्पिटल ले चलिए। गौतम जी ने बड़ी ही विनम्र और दया की
दृष्टी से उसकी ओर देखा और कहा "मेरा क्या जाता है"
पर तुम्हारी बच्ची की हालत काफी नाज़ुक है और
उसे हो गया तो "तुम्हारा बहुत कुछ चला जाएगा"
यह कहकर गौतम जी ने अपनी कार निकाली
और बच्ची को हॉस्पिटल पहुँचाया।

माँ...


एक महोदय बड़ी गंभीरता के साथ कुछ लिख रहे थे...
अचानक एक पिचहत्तर साल के करीब की बुजुर्ग महाशय के पास आई और बोली -
बेटा! भोजन का समय हो गया है! महाशय ने ध्यान नही दिया...
बुजुर्ग ने फ़िर कहा - मेरे लाल! भोजन ठंडा हो रहा है!
महाशय गुस्से में आ गए और बोले - चुप भी कर ''माँ'',
तेरे आँख फूट गए हैं क्या?
देखती नही कल कोलेज में मेरा लेक्चर है...
"माँ" पर कविता लिख रहा हूँ..!!

गुरुवार, जून 04, 2009

मैं कहाँ हूँ...?


उसने कहा मैं कहाँ हूँ..?

मैंने कहा मेरे दिल में,
मेरी साँसों में,

मेरे जेहन में,

मेरी नस-नस में,

उसने कहा मैं कहाँ नही हूँ..?

मैंने कहा मेरी किस्मत में..!!

च्वाइस...


एक दिन हम दोनों साथ में एक होटल में खाने के लिए गए।
उसने मुझसे कहा आप आर्डर कीजिए।
मैंने कहा तुम आर्डर दो, मुझे आर्डर देना नहीं आता।
मेरी "च्वाइस" अच्छी नहीं है!!
उसने बड़े ही सहज भाव से उत्तर दिया-
मैं भी तो आपकी ही "च्वाइस" हूँ!!

सोमवार, मार्च 16, 2009

झूठा कहीं का..!

मन की इक बात

मन ही में रह जाती है...

रोज़ कहता हूँ खुद से

कि

आज कहकर ही दम लूँगा...

झूठा साबित होता हूँ

जब...

सामने तू आती है...!!!

शनिवार, फ़रवरी 28, 2009

जेहन में कौंधती एक सोच!

मैं तो लोगों के लिए

एक सीढ़ी हूँ

जिस पर पैर रखकर

उन्हें ऊपर पहुँचना है

तब सीढ़ी का क्या अधिकार

कि वह सोचे

कि किसने धीरे से पैर रखा

और कौन उसे

रौंदकर चला गया।

ऐसे जीवन से मौत भली!

हमने अपने जीवन में कई ऐसे उदाहरण देखे हैं जिनसे हमें काफी कुछ सीखने को मिलता है...
रामायण तो हम सभी ने देखी है... हाँ! ज़रूर देखी है... उसमे हमने देखा है कि श्रीराम अपने कर्मों के बल पर मर्यादापुरुषोत्तम कि उपाधी से नवाजे जाते हैं... " रघुकुल रीति सदा चली आई, प्राण जाये पर वचन न जाई! " वाली बात शायद उन्ही के जीवनकाल से चरितार्थ हुई... उन्होंने अपनी आने वाली पीढी के लिए कई मील के पत्थर स्थापित किये... और सन्देश दिया कि जिंदगी मिली है तो इसका सदुपयोग करो... मानव जीवन ऐसे ही नहीं मिलता... उसके मिलने के पीछे बहुत बड़ा उद्देश्य छिपा होता है... पिता के आदेश के पालन के लिए उन्होंने अपना जीवन बलिदान करने की ठान ली... और चल पड़े चौदह साल का बनवास काटने... एक ही पत्नी को लेकर पूरा जीवन काट दिया... पत्नी दूर हो गयी फिर भी दूसरी शादी नहीं की... भाई भी बने तो बेमिसाल... कहने का मतलब है कि उन्होंने हर क्षेत्र में मिसाल कायम किया... बचपन से लेकर जवानी के सुनहरे युग तक उन्होंने कभी अपने मन को नहीं सुना... सदा ही माता-पिता, पत्नी-भाई और प्रजा कि सुनते रहे... कभी भी अपना जीवन नहीं जिया... अपना जीवन उन्होंने दूसरों के नाम कर दिया... तभी तो इतने महान बने कि दुनिया ने उन्हें भगवान् कहना शुरू कर कर दिया... और अब तो उनकी पूजा भी होने लगी है (मैंने जब से अनुभव किया है तब की बात कर रहा हूँ, इससे पहले का मुझे नहीं पता, मैं खुद उन्हें अपना इष्ट मानता हूँ!)... इतना सब बताकर मैं ये नहीं कहना चाहता कि दुनिया हर इंसान भगवान् बनने की कोशिश में लग जाए... ऐसा कतई संभव नहीं है... प्रकृति का नियम टूट जाएगा... मेरे कहने का मतलब है कि जीवन का सदुपयोग होना चाहिए... हम सभी को अपने अन्दर छिपी शक्ति को पहचानना चाहिए...एक उदाहरण देता हूँ... आज की युवा वर्ग का (उनमे मैं खुद भी शामिल हूँ)... अक्सर ऐसा देखने में आया है कि हम युवा जितनी फिक्र अपनी गर्लफ्रेंड या पत्नी की करते हैं... उसका दस फीसदी भी अपने माता-पिता या परिवार की फिक्र करते हैं...?? शायद नही! पापा या भैया का काल यदि गर्लफ्रेंड के सामने आ जाता है तो उठाते ही नहीं... और यदि गर्लफ्रेंड ने पूरे परिवार के सामने काल किया तो उसका काल काटकर उसे कालबेक करेंगे और बड़ी ही बेशर्मी के साथ घर वालों के सामने उससे बात करने लगेंगे... क्या यह घर के संस्कारों का नतीजा है? कतई नहीं! यह हमारी दूषित मानसिकता और अपने अन्दर छिपे SplitPersonality (दोहरा स्वाभाव) को अपने पर हावी होने देने का परिणाम है... यह सब देखकर मुझे शर्म आती है कि मैं भी आज की युवा पीढी में गिना जाता हूँ... मुझे जब कोई युवा या जवान कहता है तो मुझे लगता है मानो कोई मेरे "मानव" होने का मजाक उड़ा रहा है... धिक्कार है ऐसी ज़वानी पर जो माँ की आँचल और पिता के स्नेह से विमुख होकर पत्नी या गर्लफ्रेंड की पल्लू से चिपका रहता है... धिक्कार है ऐसे जीवन पर जो भाई के प्यार को छोड़कर किसी गार्डन में एक अजनबी लड़की के कंधे पर हाथ डालकर बैठा है... छी!! क्या करना ऐसे जीवन और ऐसी जवानी का॥ जो खुद के परिवार को छोड़कर कहीं और अपना दुःख-सुख बाँट रहा है...?? अरे रामजी भी तो जवान थे... और वो तो कुछ भी कर सकते थे... राजा के बेटे थे... उनके पास अपार सम्पत्ति भी थी... पर उन्होंने हमेशा ही अपने परिवार को लेकर चलना उचित समझा... अब कुछ लोग कहेंगे कि भाई! वो तो भगवान् थे... उन्हें तो रावन का नाश करके अपना काम करना था... लीला कर रहे थे वो... ऐसा सोचने वालों को एक बात बता दूं कि वो भगवान् बनकर पैदा नहीं हुए थे... उन्होंने खुद में ऐसे गुण पैदा किये जिनसे उन्हें भगवान् कहा जाने लगा... हम भी ऐसा कर सकते है॥ पर गर्लफ्रेंड से बतियाने से फुरसत मिले तब न... मैं किसी युवा भाई पर आक्षेप नही कर रहा हूँ... अगर किसी युवा भाई को मेरे इस लेख से दुःख हो तो मैं क्षमा चाहूँगा... मैं तमाम युवा बंधुओं से गुजारिश करूंगा की मेरे प्यारे! भाइयो गर्लफ्रेंड के बीस मिनट के प्यार के लिए माँ की बीस साल की ममता को मत ठुकराओ... अगर अपनी माँ, अपने पिता को ही नहीं मानोगे तो ऐसे जीवन का करना ही क्या..??
ऐसे जीवन से मौत ही भली...!!!

एक बात समझ लो दोस्तों
" माता-पिता के अलावा;
न माया चाहिये;
न काया चाहिये;
हमें तो बस माँ का साया चाहिये॥
न इज्जत न शोहरत
न कुछ और चाहिए॥
हमें तो बस माँ की
आँचल का छाया चाहिए॥"

रविवार, फ़रवरी 22, 2009

सोचता हूँ, सोचना अब बंद ही कर दूं!

इंसान की जिंदगी में कई बार ऐसे पल आते हैं, जब उसे काफी कुछ सोचना पड़ता है... यहाँ तक कि वह खुद को भूल जाता है... यकीन मानिए ऐसा होता है... ऐसा वाकई होता है...वह इतना सोचता है कि सोचने के अलावा उसके पास कोई और रास्ता ही नहीं होता...कभी सोचता है कि मैं क्या सोच रहा हूँ, कभी सोचता है कि मैं इतना क्यों सोचता हूँ...और कभी वह सोचता है कि मुझे क्या सोचना है॥? किसके बारे में सोचना है..?और इन्ही सब के चलते उसकी सोच ही बदल जाती है... कभी-कभी तो वह सोचने में इतना मशगूल हो जाता है कि सोचना ही भूल जाता है...इसे मानवीय प्रकृति कहते हैं... वैसे ऐसा हर किसी के साथ नहीं होता...ऐसा उनके साथ होता है जो सोचना जानते हैं... ऐसा एक जीता जागता उदाहरण भी मैंने देखा है...मेरे बड़े भाई के रूप में... वैसे उनको "बड़ा भाई" इसलिए कहा रहा हूँ क्योंकि उनका परिचय देने के लिए कोई न कोई संबोधन तो देना ही पड़ेगा... और उनको "बड़ा भाई" कहने में मैं फक्र महसूस करता हूँ... अगर उनको मैं अपना खुदा कहूं तो अतिसंयोक्ति नहीं होगी... वो वाकई में मेरे लिए किसी खुदा से कम नहीं हैं... कहते हैं न कि "खुदा" हमेशा अपने बन्दों के लिए "खुद" से ज्यादा सोचते हैं... उन्होंने हमेशा अपने छोटे भाई किशन (वो मुझे प्यार से किशन कहते हैं) के लिए खुद से कहीं ज्यादा सोचा है और किया है... पर मेरे खुदा कि एक बात मुझे ठीक नहीं लगती..! उनका मेरे बारे में इतना ज्यादा सोचना! जब वो भोजन करते हैं तो सोचते हैं कि मेरे किशन ने भोजन किया होगा कि नहीं..? वो कहीं भूखा तो नहीं होगा..? जब वो सोते हैं तो सोचते हैं कि मेरा किशन अभी भी अपने ऑफिस में काम पर लगा होगा... जब वो कहीं घुमते हैं तो सोचते हैं कि मेरे किशन के क्या हाल होंगे..? मैं जब उनके पास होता हूँ तो मुझे हमेशा एक पिता कि तरह समझाते हैं... वो मुझे हमेशा मार्गदर्शित करते हैं... मेरे भैया दिल्ली में हैं और वो "आईएएस" के मेन एग्जाम की तयारी कर रहे हैं... मैंने अपने जीवन में उनकी तरह महत्वकांक्षी व्यक्ति नहीं देखा..! सच कहता हूँ... नहीं देखा... वो मुझे बहुत प्यार करते हैं... ये केवल कहने की बात नहीं... सच में ऐसा ही है...वो मेरे बारे में इतना सोचते हैं... ये मेरे लिए बहुत ही सौभग्य की बात है... अब मैं भी सोचने लगा हूँ... मैं सोचता हूँ की जब वो मेरे बारे में इतना सोचता हैं तो मुझे किसी के बारे में सोचने की कोई ज़रुरत नहीं है... "सोचता हूँ सोचना अब बंद ही कर दूं!"

शनिवार, फ़रवरी 21, 2009

जिंदगी, जिंदगी!!

  • "जिंदगी!" सुनने में यह शब्द बहुत ही कर्णप्रिय लगता है,
  • पर कभी सोचा है की ये "जिंदगी" है क्या..?
  • किसे कहते है "जिंदगी"..?
  • हाँ! पहले कुछ बुद्धिजीविओं की इसके बारे में परिभाषाएं
  • ज़रूर पढ़ी है... उनके मुताबिक "जिंदगी" एक संघर्ष है...
  • "जिंदगी" कुछ कर दिखने का नाम है...
  • "जिंदगी" खुलकर जीने को कहते हैं... वगैरह, वगैरह!
  • पर सही मायनों में "जिंदगी" की परिभाषा इनमे से कुछ भी नही है...
  • ये मैं नही कह रहा हूँ और न ही इतनी बड़ी बात कहने की मुझमे क्षमता है,
  • ये मेरा अब तक का निष्कर्ष कहता है!
  • मैंने अपनी बाईससाल की "जिंदगी" में ऐसे कई उदाहरण देखे हैं॥
  • जिनसे मैने यह निष्कर्ष निकाला है! वैसे इस निष्कर्ष के बाद भी मुझे कई ऐसे
  • उदाहरण देखने को मिले हैं, जिनसे मैं एक और निष्कर्ष पर पहुँचा!
  • और वो यह है "जिंदगी" न तो कोई जंग है और ही कोई संघर्ष!
  • "जिंदगी" एक कहानी है और हम उसके पात्र ! कोई माँ के किरदार में है
  • तो कोई पिता के, कोई भाई बना है तो कोई दोस्त!
  • किसी ने पत्नी की भूमिका में है तो कोई बेटा या बेटी के रोल में!
  • सबके डायलौग भी फिक्स हैं!
  • जिसे विलेन का किरदार मिला है उसका संवाद निगेटिव है और जो हीरो है या
  • हीरो के सहायक हैं उनका संवाद ऐसा है जो दर्शकों को पसंद आए!
  • बाकि सब तो ठीक है पर दर्शक कौन हैं...?
  • दर्शक! दर्शक भी हम में से ही होते हैं...
  • कुछ दर्शक हीरो के पक्ष में होते हैं तो कुछ विलेन के!
  • कहानी चलती रहती है और एक वक्त ऐसा आता है जब कहानी अपने अन्तिम
  • स्टेप की ओर यानी पूर्णता की ओर अग्रसर होती है...
  • अब शुरू होता है कहानी का क्लाईमेक्स...
  • बेटे को पिता की याद आती है... माँ अपने बेटे को पहचानती है और
  • पत्नी को पति की याद आती है...
  • बस! इन्ही सारी बातों के इर्द-गिर्द घूमती "जिंदगी" की कहानी ख़त्म हो जाती है...
  • और फ़िर शुरू होता है एक नया अध्याय "जिंदगी" का...!!!

रविवार, फ़रवरी 15, 2009

जीवन की आपाधापी में!!

जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला,
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला,
जिस दिन मेरी चेतना जगी मैंने देखा
मैं खड़ा हुआ हूँ इस दुनिया के मेले में,
हर एक यहाँ पर एक भुलाने में भूला
हर एक लगा है अपनी अपनी दे-ले में,
कुछ देर रहा हक्का-बक्का, भौचक्का-सा
आ गया कहाँ, क्या करूँ यहाँ, जाऊँ किस जा?
फिर एक तरफ से आया ही तो धक्का-सा
मैंने भी बहना शुरू किया उस रेले में,
क्या बाहर की ठेला-पेली ही कुछ कम थी,
जो भीतर भी भावों का ऊहापोह मचा,
जो किया, उसी को करने की मजबूरी थी,
जो कहा, वही मन के अंदर से उबल चला,
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।
मेला जितना भड़कीला रंग-रंगीला था,
मानस के अन्दर उतनी ही कमज़ोरी थी,
जितना ज़्यादा संचित करने की ख़्वाहिश थी,
उतनी ही छोटी अपने कर की झोरी थी,
जितनी ही बिरमे रहने की थी अभिलाषा,
उतना ही रेले तेज ढकेले जाते थे,
क्रय-विक्रय तो ठण्ढे दिल से हो सकता है,
यह तो भागा-भागी की छीना-छोरी थी;
अब मुझसे पूछा जाता है क्या बतलाऊँ
क्या मान अकिंचन बिखराता पथ पर आया,
वह कौन रतन अनमोल मिला ऐसा मुझको,
जिस पर अपना मन प्राण निछावर कर आया,
यह थी तकदीरी बात मुझे गुण दोष न दो
जिसको समझा था सोना, वह मिट्टी निकली,
जिसको समझा था आँसू, वह मोती निकला।
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।
मैं कितना ही भूलूँ, भटकूँ या भरमाऊँ,
है एक कहीं मंज़िल जो मुझे बुलाती है,
कितने ही मेरे पाँव पड़े ऊँचे-नीचे,
प्रतिपल वह मेरे पास चली ही आती है,
मुझ पर विधि का आभार बहुत-सी बातों का।
पर मैं कृतज्ञ उसका इस पर सबसे ज़्यादा
नभ ओले बरसाए, धरती शोले उगले,
अनवरत समय की चक्की चलती जाती है,
मैं जहाँ खड़ा था कल उस थल पर आज नहीं,
कल इसी जगह पर पाना मुझको मुश्किल है,
ले मापदंड जिसको परिवर्तित कर देतीं
केवल छूकर ही देश-काल की सीमाएँ
जग दे मुझ पर फैसला उसे जैसा भाए
लेकिन मैं तो बेरोक सफ़र में जीवन के
इस एक और पहलू से होकर निकल चला।
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।
♥♪ रचनाकार - डॉक्टर हरिवंश राय बच्चन

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