कहते थे बेटे! तुम्हें नाम कमाना है...
पैसे तो सभी कमा लेते हैं...
कभी पैसा कमाने के लिए कोई ग़लत काम मत करना...
क्योंकि ग़लत काम करने से पैसा तो खूब मिलता है
पर नाम नही मिलता और तुम्हें नाम कमाना है...
चरित्र मानव का महल की तरह... गिरेगा लगेगा खंडहर की तरह... जलेगा बरसात में भीगी लकड़ी की तरह... मांगेगा, न मिलेगी मौत, जिंदगी की तरह!..
Writer रामकृष्ण गौतम पर मंगलवार, जून 16, 2009 3 Responzes
Writer रामकृष्ण गौतम पर सोमवार, जून 15, 2009 6 Responzes
माँ बेसाख़्ता आ जाती है तेरी याद
दिखती है जब कोई औरत..।
घबराई हुई-सी प्लेटफॉम पर
हाथों में डलिया लिए
आँचल से ढँके अपना सर
माँ मुझे तेरी याद आ जाती है..।
मेरी माँ की तरह
उम्र के इस पड़ाव पर भी घबराहट है
क्यों, आख़िर क्यों ?
क्या पक्षियों का कलरव
झूठमूठ ही बहलाता है हमें ..?
लेबल: उमर, दलीय, प्लेटफार्म, भ्रम(झूटमूठ), माँ, याद
Writer रामकृष्ण गौतम पर शुक्रवार, जून 12, 2009 3 Responzes

लेबल: ग़म, तक़ल्लुफ़, मैखाना, शेखजी
Writer रामकृष्ण गौतम पर शुक्रवार, जून 12, 2009 8 Responzes

लेबल: इम्तिहानो, उड़ान, उदासी, ख्वाब, बेजुबान, मकानों, मोहब्बत, वीरानिया
Writer रामकृष्ण गौतम पर बुधवार, जून 10, 2009 3 Responzes
लेबल: ..?, क्या, जाता, मेरा, है
Writer रामकृष्ण गौतम पर रविवार, जून 07, 2009 2 Responzes
लेबल: बेटा, माँ, माँ पर कविता, मेरे लाल
Writer रामकृष्ण गौतम पर रविवार, जून 07, 2009 2 Responzes
Writer रामकृष्ण गौतम पर गुरुवार, जून 04, 2009 2 Responzes
Writer रामकृष्ण गौतम पर गुरुवार, जून 04, 2009 5 Responzes
मन की इक बात
मन ही में रह जाती है...
रोज़ कहता हूँ खुद से
कि
आज कहकर ही दम लूँगा...
झूठा साबित होता हूँ
जब...
Writer रामकृष्ण गौतम पर सोमवार, मार्च 16, 2009 1 Responzes
मैं तो लोगों के लिए
एक सीढ़ी हूँ
जिस पर पैर रखकर
उन्हें ऊपर पहुँचना है
तब सीढ़ी का क्या अधिकार
कि वह सोचे
कि किसने धीरे से पैर रखा
और कौन उसे
रौंदकर चला गया।
Writer रामकृष्ण गौतम पर शनिवार, फ़रवरी 28, 2009 1 Responzes
हमने अपने जीवन में कई ऐसे उदाहरण देखे हैं जिनसे हमें काफी कुछ सीखने को मिलता है...
रामायण तो हम सभी ने देखी है... हाँ! ज़रूर देखी है... उसमे हमने देखा है कि श्रीराम अपने कर्मों के बल पर मर्यादापुरुषोत्तम कि उपाधी से नवाजे जाते हैं... " रघुकुल रीति सदा चली आई, प्राण जाये पर वचन न जाई! " वाली बात शायद उन्ही के जीवनकाल से चरितार्थ हुई... उन्होंने अपनी आने वाली पीढी के लिए कई मील के पत्थर स्थापित किये... और सन्देश दिया कि जिंदगी मिली है तो इसका सदुपयोग करो... मानव जीवन ऐसे ही नहीं मिलता... उसके मिलने के पीछे बहुत बड़ा उद्देश्य छिपा होता है... पिता के आदेश के पालन के लिए उन्होंने अपना जीवन बलिदान करने की ठान ली... और चल पड़े चौदह साल का बनवास काटने... एक ही पत्नी को लेकर पूरा जीवन काट दिया... पत्नी दूर हो गयी फिर भी दूसरी शादी नहीं की... भाई भी बने तो बेमिसाल... कहने का मतलब है कि उन्होंने हर क्षेत्र में मिसाल कायम किया... बचपन से लेकर जवानी के सुनहरे युग तक उन्होंने कभी अपने मन को नहीं सुना... सदा ही माता-पिता, पत्नी-भाई और प्रजा कि सुनते रहे... कभी भी अपना जीवन नहीं जिया... अपना जीवन उन्होंने दूसरों के नाम कर दिया... तभी तो इतने महान बने कि दुनिया ने उन्हें भगवान् कहना शुरू कर कर दिया... और अब तो उनकी पूजा भी होने लगी है (मैंने जब से अनुभव किया है तब की बात कर रहा हूँ, इससे पहले का मुझे नहीं पता, मैं खुद उन्हें अपना इष्ट मानता हूँ!)... इतना सब बताकर मैं ये नहीं कहना चाहता कि दुनिया हर इंसान भगवान् बनने की कोशिश में लग जाए... ऐसा कतई संभव नहीं है... प्रकृति का नियम टूट जाएगा... मेरे कहने का मतलब है कि जीवन का सदुपयोग होना चाहिए... हम सभी को अपने अन्दर छिपी शक्ति को पहचानना चाहिए...एक उदाहरण देता हूँ... आज की युवा वर्ग का (उनमे मैं खुद भी शामिल हूँ)... अक्सर ऐसा देखने में आया है कि हम युवा जितनी फिक्र अपनी गर्लफ्रेंड या पत्नी की करते हैं... उसका दस फीसदी भी अपने माता-पिता या परिवार की फिक्र करते हैं...?? शायद नही! पापा या भैया का काल यदि गर्लफ्रेंड के सामने आ जाता है तो उठाते ही नहीं... और यदि गर्लफ्रेंड ने पूरे परिवार के सामने काल किया तो उसका काल काटकर उसे कालबेक करेंगे और बड़ी ही बेशर्मी के साथ घर वालों के सामने उससे बात करने लगेंगे... क्या यह घर के संस्कारों का नतीजा है? कतई नहीं! यह हमारी दूषित मानसिकता और अपने अन्दर छिपे SplitPersonality (दोहरा स्वाभाव) को अपने पर हावी होने देने का परिणाम है... यह सब देखकर मुझे शर्म आती है कि मैं भी आज की युवा पीढी में गिना जाता हूँ... मुझे जब कोई युवा या जवान कहता है तो मुझे लगता है मानो कोई मेरे "मानव" होने का मजाक उड़ा रहा है... धिक्कार है ऐसी ज़वानी पर जो माँ की आँचल और पिता के स्नेह से विमुख होकर पत्नी या गर्लफ्रेंड की पल्लू से चिपका रहता है... धिक्कार है ऐसे जीवन पर जो भाई के प्यार को छोड़कर किसी गार्डन में एक अजनबी लड़की के कंधे पर हाथ डालकर बैठा है... छी!! क्या करना ऐसे जीवन और ऐसी जवानी का॥ जो खुद के परिवार को छोड़कर कहीं और अपना दुःख-सुख बाँट रहा है...?? अरे रामजी भी तो जवान थे... और वो तो कुछ भी कर सकते थे... राजा के बेटे थे... उनके पास अपार सम्पत्ति भी थी... पर उन्होंने हमेशा ही अपने परिवार को लेकर चलना उचित समझा... अब कुछ लोग कहेंगे कि भाई! वो तो भगवान् थे... उन्हें तो रावन का नाश करके अपना काम करना था... लीला कर रहे थे वो... ऐसा सोचने वालों को एक बात बता दूं कि वो भगवान् बनकर पैदा नहीं हुए थे... उन्होंने खुद में ऐसे गुण पैदा किये जिनसे उन्हें भगवान् कहा जाने लगा... हम भी ऐसा कर सकते है॥ पर गर्लफ्रेंड से बतियाने से फुरसत मिले तब न... मैं किसी युवा भाई पर आक्षेप नही कर रहा हूँ... अगर किसी युवा भाई को मेरे इस लेख से दुःख हो तो मैं क्षमा चाहूँगा... मैं तमाम युवा बंधुओं से गुजारिश करूंगा की मेरे प्यारे! भाइयो गर्लफ्रेंड के बीस मिनट के प्यार के लिए माँ की बीस साल की ममता को मत ठुकराओ... अगर अपनी माँ, अपने पिता को ही नहीं मानोगे तो ऐसे जीवन का करना ही क्या..??
ऐसे जीवन से मौत ही भली...!!!
लेबल: जीवन, पिता, भाई, मर्यादापुरुषोत्तम, माता, रामायण, श्रीराम
Writer रामकृष्ण गौतम पर शनिवार, फ़रवरी 28, 2009 2 Responzes
इंसान की जिंदगी में कई बार ऐसे पल आते हैं, जब उसे काफी कुछ सोचना पड़ता है... यहाँ तक कि वह खुद को भूल जाता है... यकीन मानिए ऐसा होता है... ऐसा वाकई होता है...वह इतना सोचता है कि सोचने के अलावा उसके पास कोई और रास्ता ही नहीं होता...कभी सोचता है कि मैं क्या सोच रहा हूँ, कभी सोचता है कि मैं इतना क्यों सोचता हूँ...और कभी वह सोचता है कि मुझे क्या सोचना है॥? किसके बारे में सोचना है..?और इन्ही सब के चलते उसकी सोच ही बदल जाती है... कभी-कभी तो वह सोचने में इतना मशगूल हो जाता है कि सोचना ही भूल जाता है...इसे मानवीय प्रकृति कहते हैं... वैसे ऐसा हर किसी के साथ नहीं होता...ऐसा उनके साथ होता है जो सोचना जानते हैं... ऐसा एक जीता जागता उदाहरण भी मैंने देखा है...मेरे बड़े भाई के रूप में... वैसे उनको "बड़ा भाई" इसलिए कहा रहा हूँ क्योंकि उनका परिचय देने के लिए कोई न कोई संबोधन तो देना ही पड़ेगा... और उनको "बड़ा भाई" कहने में मैं फक्र महसूस करता हूँ... अगर उनको मैं अपना खुदा कहूं तो अतिसंयोक्ति नहीं होगी... वो वाकई में मेरे लिए किसी खुदा से कम नहीं हैं... कहते हैं न कि "खुदा" हमेशा अपने बन्दों के लिए "खुद" से ज्यादा सोचते हैं... उन्होंने हमेशा अपने छोटे भाई किशन (वो मुझे प्यार से किशन कहते हैं) के लिए खुद से कहीं ज्यादा सोचा है और किया है... पर मेरे खुदा कि एक बात मुझे ठीक नहीं लगती..! उनका मेरे बारे में इतना ज्यादा सोचना! जब वो भोजन करते हैं तो सोचते हैं कि मेरे किशन ने भोजन किया होगा कि नहीं..? वो कहीं भूखा तो नहीं होगा..? जब वो सोते हैं तो सोचते हैं कि मेरा किशन अभी भी अपने ऑफिस में काम पर लगा होगा... जब वो कहीं घुमते हैं तो सोचते हैं कि मेरे किशन के क्या हाल होंगे..? मैं जब उनके पास होता हूँ तो मुझे हमेशा एक पिता कि तरह समझाते हैं... वो मुझे हमेशा मार्गदर्शित करते हैं... मेरे भैया दिल्ली में हैं और वो "आईएएस" के मेन एग्जाम की तयारी कर रहे हैं... मैंने अपने जीवन में उनकी तरह महत्वकांक्षी व्यक्ति नहीं देखा..! सच कहता हूँ... नहीं देखा... वो मुझे बहुत प्यार करते हैं... ये केवल कहने की बात नहीं... सच में ऐसा ही है...वो मेरे बारे में इतना सोचते हैं... ये मेरे लिए बहुत ही सौभग्य की बात है... अब मैं भी सोचने लगा हूँ... मैं सोचता हूँ की जब वो मेरे बारे में इतना सोचता हैं तो मुझे किसी के बारे में सोचने की कोई ज़रुरत नहीं है... "सोचता हूँ सोचना अब बंद ही कर दूं!"
लेबल: आइएएस, किशन, दिल्ली, पिता, बड़े भइया, सोचना
Writer रामकृष्ण गौतम पर रविवार, फ़रवरी 22, 2009 5 Responzes
लेबल: "जिंदगी", अंत, कहानी, किरदार, पात्र
Writer रामकृष्ण गौतम पर शनिवार, फ़रवरी 21, 2009 5 Responzes

लेबल: अभिलाषा, ख्वाहिश, जीवन, बच्चन जी, मजबूरी, संघर्ष
Writer रामकृष्ण गौतम पर रविवार, फ़रवरी 15, 2009 1 Responzes
लेबल: कटरीना, कृष्ण, क्वालिटी, पत्रानियाँ, प्रेम, रानियाँ, राम, राह
Writer रामकृष्ण गौतम पर शुक्रवार, फ़रवरी 13, 2009 1 Responzes
लेबल: इरादा, जीवन, पंडित जी, मैं, मौत, रास्ता, वादा, सत्यता और सार्थकता
Writer रामकृष्ण गौतम पर रविवार, जनवरी 25, 2009 5 Responzes
साभार:-गायत्री शर्मा
वर्ष 2008 देश के लिए एक ऐसा निर्णायक वर्ष रहा, जब देश ने कई आतंकवादी धमाकों व राजनीतिक उलटफेर के रूप में कई आघात सहे परंतु इतने पर भी यह देश अपने संस्कारों व अपने जज्बे के कारण उसी हौसले से खड़ा रहा। इस दौर ने देश को जनतंत्र की एक ऐसी आवाज दी, जो शायद कहीं गुम हो चुकी थी। हर व्यक्ति ऊँच-नीच, जाति-पाति के भेदभाव को भुलाकर केवल और केवल अपने देश के बारे में सोच रहा था। इन धमाकों में हमने बहुत कुछ खोया परंतु जो पाया वह शायद खरे सोने के समान शुद्ध था और वह था देशप्रेम का जज्बा, जो हर भारतीय को अपने देश के लिए कुछ कर गुजरने को झकझोर रहा था। यदि हम इस वर्ष के मुद्दों की बात करें तो इस वर्ष आतंकवाद, आसमान छूती महँगाई, शेयर बाजार की गिरावट व भ्रष्ट राजनीति बहस का मुद्दा बनकर सुर्खियों में छाए रहे। वहीं दूसरी ओर देश की लाज बचाई उन जाँबाजों, धुरंदर खिलाडि़यों तथा कलाकारों ने दुनिया के नक्शे पर भारत का नाम रोशन किया। इन सभी ज्वलंत मुद्दों के संदर्भ में हमने 'वर्ष 2008 का आकलन' विषय पर देश की कुछ ख्यातनाम हस्तियों से चर्चा की तो उनका इस विषय में ये कहना था -
वर्तिका नंदा (देश की प्रख्यात युवा पत्रकार) :- मैं मानती हूँ कि हमारे देश के लिए यह वर्ष खट्टा-मीठा और नासमझीभरा रहा। इस वर्ष चर्चा का विषय बने 'आतंकवाद' ने जहाँ लोगों को संगठित होने की शिक्षा दी, वहीं आतंकवादियों के खात्मे ने हमारे होंठों पर जीत की खुशी भी दर्ज कराई। इन हमलों के पूर्व देश में जो सांप्रदायिक मतभेद गहराने लगा था वह सभी आतंकवाद की आड़ में गुम हो गया। लोगों का विरोध खुलकर सामने आया। इन हमलों में किसी हिन्दू या मुस्लिम को चुनकर नहीं मारा गया, बल्कि आम भारतीय को मारा गया। इस वर्ष की एक बहुत अच्छी उपलब्धि यह रही कि कल तक आमजन का पुलिस पर से जो विश्वास उठ गया था तथा जिस खाकी वर्दी को सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा जाता था, अब वह कौम सम्मान की अधिकारी बन गई है। आज मुसीबत के वक्त यही पुलिसकर्मी हमारे काम आए न कि कोई राजनेता। मेरे अनुसार पिछले बीस-बाईस सालों में पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था कि जनता ने सार्वजनिक स्थानों पर खुलकर विरोध प्रदर्शन किया हो। इस वर्ष पहली बार लोगों ने सिरफिरे राजनेताओं को सबक सिखाया। जिस तरह से इन धमाकों में हमारे पुलिस के कई जवान मारे गए, वह बेहद ही दु:ख की बात है। हेमंत करकरे की पत्नी का मीडिया को दिया गया बयान हो या उन्नीकृष्णन के पिता का मुख्यमंत्री को जवाब देने का ढंग, सभी हमारी सच्चाई व ताकत के परिचायक हैं। इस वर्ष की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि इस वर्ष हमने सच को कहना, अपनी गलती स्वीकारना व अपना पक्ष रखना सीखा।
पिछले बीस-बाईस सालों में पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था कि जनता ने सार्वजनिक स्थानों पर खुलकर विरोध प्रदर्शन किया हो। इस वर्ष पहली बार लोगों ने सिरफिरे राजनेताओं को सबक सिखाया।
कुलदीप नैयर (देश के जाने-माने स्तंभकार) :- 'मैं मानता हूँ कि वर्ष 2008 देश के लिए अच्छा रहा। इस वर्ष हमें चुनौतियाँ मिलीं, जिनसे हमने बहुत कुछ सीखा। यह इसी सीख का परिणाम था कि बहुत सालों बाद सार्वजनिक स्थानों पर देशवासियों की एकता देखने को मिली। मैं बहुत अरसे से कोशिश कर रहा हूँ कि भारत और पाकिस्तान के संबंधों में सुधार आए। अब तक इस संबंध में जो भी कोशिशें की गई थीं, इन धमाकों ने उन सब कोशिशों पर पानी फेर दिया। मुझे इस वर्ष एक रिपोर्ट पढ़कर बहुत बुरा लगा कि आज भी देश में गरीबी और महँगाई व्याप्त है। आज भी हमारे देश के 77 प्रतिशत लोग केवल 2 डॉलर पर जीते हैं। आखिर हमें इस गरीबी व महँगाई से कब मुक्ति मिलेगी?
चित्रा मुद्गल (देश की ख्यातनाम लेखिका व समाजसेविका) :- मैं हर चीज को बड़ी ही सकारात्मक दृष्टि से देखती हूँ। आतंकवाद एक चुनौती थी, जिसे इस देश के जनतंत्र ने बड़े ही साहसिक रूप में लिया है। मैं आतंकवाद से भी काफी बड़ी चुनौती महँगाई को मानती हूँ क्योंकि पेट की भूख हर किसी को सताती है तथा इस भूख ने इस बार भी कई लोगों को मौत की नींद सुला दिया। आज भी आलू इस देश में बड़ी मात्रा में पैदा होता है परंतु यहीं पर यह आलू 5 रुपए किलो बिकने के बजाय 15 से 20 रुपए किलो के महँगे दामों पर बिकता है, आखिर क्यों? आखिर क्यों सरकार इसके लिए कोई गाइड लाइन तय नहीं करती?
आज जिस तरह से समाज व देश में असंतुलन की स्थिति है वह बेहद ही चिंताजनक है क्योंकि किसी भी प्रकार का असंतुलन होने पर हम कभी किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पाएँगे।
मुझे लगता है कि यदि सरकार दामों के संबंध में एक गाइड लाइन तय कर दे तो शायद इस आसमान छूती महँगाई पर कुछ हद तक अंकुश लग सकता है। बचपन में हमने स्कूल में पढ़ा था कि भारत एक कृषिप्रधान देश है तब हमने यह नहीं सोचा था कि कल को यहाँ की ही जनता में अनाज के लिए त्राहि-त्राहि मचेगी। आज हमारे देश का माल देश में कम तथा विदेशों में अधिक बेचा जाता है। आज अमीर हो या गरीब हर व्यक्ति अपने पेट की भूख को शांत करने के लिए कमाता है। सरकार को चाहिए कि वह इस दिन-ब-दिन बढ़ती महँगाई पर अंकुश लगाए और देश को विकास की चरम सीमा पर ले जाए। आज महँगाई का तेजी से बढ़ना व नागरिक सुरक्षा के औसत का घटना बेहद ही चिंताजनक विषय है। यह देश हम सभी का है। यह किसी हिन्दू या मुस्लिम का नहीं है। वर्तमान में तुष्टीकरण को लेकर जो भी असंतोष उभर रहा है वह गुब्बारे में सूई की तरह चुभ रहा है। वर्तमान में देश की कानून-व्यवस्था बिगड़ने के जिम्मेदार केवल और केवल इस देश के राजनेता हैं, जो सत्ता की शह और मात में देशवासियों की मासूम जिंदगियों से खेल रहे हैं।
शोवना नारायणन (देश की मशहूर कथक नृत्यांगना) :- हर वर्ष चुनौतियों को लेकर लाता है। वर्ष 2008 भी चुनौतियों से ही भरा था। आज व्यक्ति सोचने पर मजबूर है कि इस देश में आखिर ये क्या हो रहा है? आखिर हम क्या चाह रहे हैं? अब हर व्यक्ति को गंभीरता से इस बारे में सोचना ही होगा क्योंकि व्यक्ति से ही समाज बनता है और समाज से ही कोई देश बनता है। आज जिस तरह से समाज व देश में असंतुलन की स्थिति है वह बेहद ही चिंताजनक है क्योंकि किसी भी प्रकार का असंतुलन होने पर हम कभी किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पाएँगे। निष्कर्ष के रूप में कहा जाए तो अब हमें गंभीरता से यह सोचना चाहिए कि हमें किस राह पर चलना है। हमें मुश्किलों का बहुत ही संजीदा ढंग से हल निकालकर उसका सामना करना चाहिए। मुश्किलें तो आती रहेंगी, उनसे घबराना कायरता होगी। आज हम सभी को इंसानियत व इस देश के बारे में सोचना होगा।
रामकृष्ण गौतम (एक अदना सा युवक) :- देश की असली तस्वीर देश के प्रधानमंत्री "मनमोहन सिंह" की "बाइपास सर्जरी" है...!!!
मेरी नज़र में तमन्ना का मतलब है एक ही दिन में आकाश छू लेने की चाहत! इससे दो फायदे हैं... एक ये कि हमें आकाश कि ऊँचाई का एहसास हो जाएगा और दूसरा हमें ख़ुद कि "औकात" भी मालूम हो जाएगी... वैसे दूसरा फायदा ज़्यादा अच्छा है... क्योंकि स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि "सबसे बड़ा ज्ञानीवही है जो ख़ुद को जानता है" सच है ख़ुद को जानना ही "तमन्ना" कि असली पहचान है...
Writer रामकृष्ण गौतम पर गुरुवार, जनवरी 22, 2009 3 Responzes

(1) गुरु : विकसित देश की पहचान बताओ राम ।
राम : विकसित देश कपड़ा नहीं बनाते गुरुदेव।
गुरु : तब वे क्या बनाते हैं?
राम : वे हथियार बनाते हैं।
गुरु : तब वे अपना नंगापन कैसे ढकते हैं?
राम : हथियारों से उनकी नंगई ढक जाती है।
(2) गुरु : विकसित देश की पहचान बताओ राम ।
राम : विकसित देश में लोग खाना नहीं पकाते।
गुरु : तब वे क्या खाते हैं?
राम : वे 'फास्ट फूड` खाते हैं।
गुरु : हमारे खाने और 'फास्ट फूड` में क्या अंतर है।
राम : हम खाने के पास जाते हैं और 'फास्टर फूड` खाने वाले के पास दौड़ता हुआ आता है।
(3) गुरु : राम विकसित देश की पहचान बताओ।
राम : विकसित देशों में बच्चे नहीं पैदा होते।
गुरु : तब कहां कौन पैदा होते हैं?
राम : वहां जवान लोग पैदा होते हैं जो पैदा होते ही काम करना शुरू कर देते हैं।
(4) गुरु : विकसित देश की पहचान बताओ राम ।
राम : विकसित देशों में सच्चा लोकतंत्र है।
गुरु : कैसे हरिराम?
राम : क्योंकि वहां केवल दो राजनैतिक दल होते हैं।
गुरु : तीसरा क्यों नहीं होता?
राम : तीसरा होने से सच्चा लोकतंत्र समाप्त हो जाता है।
(5) गुरु : विकसित देश की पहचान बताओ राम ।
राम : विकसित देशों में आदमी जानवरों से बड़ा प्यार करते हैं।
गुरु : क्यों?
राम : क्योंकि जानवर आदमियों से बड़ा प्यार करते हैं।
गुरु : क्यों नहीं वहां आदमी आदमियों से और जानवरों से प्यार करते हैं?
राम : क्योंकि विकसित देशों में आदमियों को आदमी और जानवरों को जानवर नहीं मिलते।
(6) गुरु : विकसित देश की कोई पहचान बताओ राम ।
राम : विकसित देश विकासशील देशों को दान देते हैं।
गुरु : और फिर?
राम : फिर कर्ज देते हैं।
गुरु : और फिर?
राम : फिर ब्याज के साथ कर्ज देते हैं।
गुरु : और फिर?
राम : और फिर ब्याज ही कर्ज देते हैं।
गुरु : और फिर?
राम : और फिर विकसित देशों को विकसित मान लेते हैं।
(7) गुरु : विकसित देशों की पहचान बताओ राम ।
राम : विकसित देशों में बूढ़े अलग रहते हैं।
गुरु : और जवान?
राम : वे भी अलग रहते हैं।
गुरु : और अधेड़?
राम : वे भी अलग रहते हैं।
गुरु : तब वहां साथ-साथ कौन रहता है?
राम : सब अपने-अपने साथ रहते हैं।
(8) गुरु : विकसित देशों की पहचान बताओ राम ।
राम : विकसित देशों में मानसिक रोगी अधकि होते हैं।
गुरु : क्यों? शारीरिक रोगी क्यों नहीं होते?
राम : क्योंकि शरीर पर तो उन्होंने अधिकार कर लिया है मन पर कोई अधिकार नहीं हो पाया है।
(9) गुरु : विकसित देश की पहचान बताओ राम ।
राम : विकसित देशों में तलाक़ें बहुत होती हैं।
गुरु : क्यों?
राम : क्योंकि प्रेम बहुत होते हैं।
गुरु : प्रेम विवाह के बाद तलाक़ क्यों हो जाती है?
राम : दूसरा प्रेम करने के लिए।
(10) गुरु : विकसित देश की पहचान बताओ राम ।
राम : विकसित देश मानव अधिकारों के प्रति बड़े सचेत रहते हैं।
गुरु : क्यों?
राम : क्योंकि उनके पास ही विश्व की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति है।
गुरु : हरिराम सैन्य शक्ति और मानव अधिकारों का क्या संबंध?
राम : गुरुदेव, विकसित देश सैन्य बल द्वारा ही मानव अधिकारों की रक्षा करते हैं।
Writer रामकृष्ण गौतम पर गुरुवार, जनवरी 22, 2009 1 Responzes