शुक्रवार, फ़रवरी 13, 2009

राम की राह पर चलें या कृष्ण की राह पर..??


साभार - नीरेंद्र नागर

हिंदू माइथॉलजी में जो दो प्रधान नायक हैं - राम और कृष्ण - उनमें दो मामलों के अलावा एक खास फ़र्क है प्रेम के मामले में उनका रवैया। इस मुद्दे पर दोनों में इतना ज़्यादा अंतर है कि हैरत होती है यह सोचकर करोड़ों हिंदू इन दोनों को एकसाथ कैसे स्वीकार कर पा रहे हैं! राम एकनिष्ठ हैं। सीता के अलावा वह किसी और नारी की ओर नज़र भी नहीं उठाते। सीता का त्याग करने के बाद उन्होंने किसी और से शादी नहीं की और वाल्मीकि रामायण में वर्णन है कि सीता के विरह में उन्होंने कितना कष्ट उठाया। दूसरी तरफ कृष्ण के बारे में माना जाता है कि उनकी 16 हज़ार रानियां थीं और 8 पटरानियां। राधा जो उनकी मामी लगती थीं और जिनसे उनका विशिष्ट प्रेम संबंध था , वह इनसे अलग थीं। अगर यह मान भी लिया जाए कि 16 हज़ार का आंकड़ा कुछ ज़्यादा ही है और कपिल देव की भाषा में यह बात कुछ हज़म नहीं होती , तब भी यह तो कहा ही जा सकता है कि प्रेम के मामले में कृष्ण एक से बंधे नहीं रहे।
इन दोनों नायकों के परस्परविरोधी चरित्रों को एक ही मानने और समझाने की आध्यात्मिक कोशिशों से बचते हुए हम यहां एक ही सवाल करेंगे - क्या राम की एकनिष्ठता ही हर प्रेमी का आदर्श होना चाहिए ? दूसरे शब्दों में वही सवाल - क्या कृष्ण का कई स्त्रियों से प्रेम उनके प्यार को छिछला बना देता है ? इन प्रश्नों का आध्यात्मिक उत्तर हम नहीं खोजेंगे क्योंकि अवतारों का चरित्र विश्लेषण यहां हमारा मकसद नहीं है। कसौटी पर है हमारा मन जो राम को आदर्श और कृष्ण के यथार्थ के बीच झूलता रहता है। आगे बढ़ने से पहले हम एक सवाल का जवाब दे दें। क्या मनुष्य स्वभाव से एकनिष्ठ है ? नहीं है। क्यों नहीं है ? इसलिए नहीं है कि कोई भी इंसान पर्फेक्ट नहीं है। ऐसा कोई नहीं है कि उसमें दुनिया के सारे गुण हों - न आप ऐसे हैं न मैं न कोई और। एक व्यक्ति में कुछ गुण है तो दूसरे में कोई और गुण हैं। इसलिए आपको कभी कोई अच्छा लगता है तो कभी कोई और और इस तरह आप एकसाथ या एक के बाद एक कई लोगों से प्यार करते हैं। हां , यह सही है कि इन सभी से प्यार एक जैसी गहराई से नहीं होता और यह भी मुमकिन हो कि कोई प्रेम संबंध एक पल का हो और कोई उम्र भर का। यह निर्भर करता है उस व्यक्ति के रिस्पॉन्स पर जिसे आप प्यार करते हैं। अगर उसकी प्रतिक्रिया पॉज़िटिव रही तो प्यार परवान चढ़ता है वरना धीरे-धीरे खत्म हो जाता है।
क्यों होता है प्यार ...?
प्रेम आम तौर पर पांच कारणों से होता है - रूप , व्यवहार , गुण , साथ और ***! सभी आपको सुख देते हैं। एक सुंदर चेहरा या बदन आंखों को सुख देता है। कोई अगर कटरीना कैफ का फैन है और उसकी तस्वीरें दीवारों पर लगाता है तो उसका कारण यही है कि कटरीना का सुंदर चेहरा उसे सुख देता है। वह जवाब में कटरीना से डायरेक्टली कुछ नहीं पा रहा , यह अलग बात है लेकिन वह जो दीवानगी शो कर रहा है , वह एक तरह का प्यार ही है। ऑफिस में कुछ शक्लें हमें अच्छी लगती हैं तो इसका मतलब यह कि आप शक्ल के कारण उस व्यक्ति से प्यार करते हैं। इसी तरह राह चलते भी हमें कोई सूरत भली लग जाती है। यह एक लम्हे का प्यार है। अच्छे व्यवहार के कारण भी कोई एक या कई लोग आपको प्यारे लग सकते हैं। आप अपने पति या पत्नी से कितने ही संतुष्ट क्यों न हों लेकिन अगर दफ्तर में कोई कॉलीग आपको बिना किसी स्वार्थ के लंच टाइम में पराठा या इडली शेयर करने का ऑफर दे तो उसके व्यवहार के आकर्षण को आप किस तरह नकार पाएंगे ? उसका ऑफर बताता है कि उसे आपका साथ प्रिय है , वह आपको खुश करना चाहता/चाहती है , और इसीलिए वह आपको कुछ दे रहा/रही है।
अब अगर आप भी एक सेंसिटिव व्यक्ति हैं तो आप भी उसे कुछ देंगे ही। यह देना एक कप स्पेशल चाय के रूप में हो सकता है। लेकिन एक बात यहां ध्यान देने की है - अगर यह देना सिर्फ कर्ज़ उतारने के लिए है तो यह एक सौदा होगा। परंतु यदि आप उसकी भावना की कद्र करते हुए उसे चाय पर बुलाते हैं तो आप मानें या न मानें , आपको उससे प्यार हो गया है। गुण की वजह से भी प्यार हो सकता है बशर्ते आपको उस गुण की कद्र हो। और अगर वह गुण ऐसा हो जो आपके जीवनसाथी में नहीं है तो यह बहुत ही तगड़ा आधार बन सकता है एक्स्ट्रा-मैरिटल प्रेम का। किसी का पति अगर रात को शराब पीकर आता हो , गाली-गलौज करता हो , पत्नी और बच्चों को पीटता हो , तो वह परेशान स्त्री पड़ोस में रहनेवाले उस सज्जन पुरुष को क्यों नहीं सराहेगी जो वक्त पर घर आता हो और पत्नी और बच्चों के साथ घूमने निकलता हो ! साथ रहने से भी आत्मीयता पैदा होती है। शादी के बाद साथ रहते-रहते जो प्रेम उत्पन्न होता है , उसका एक बड़ा कारण साथ रहना भी है। वैसे साथ रहना जहां प्रेम को जन्म देता है , वहीं वह रिश्ते में उकताहट का कारण भी है। प्रेम इस वजह से कि बहुत-कुछ मिल रहा है और बोरियत इस वजह से कि नया कुछ नहीं मिल रहा है। *** के कारण आकर्षण के बारे में ज़्यादा कुछ कहने की ज़रूरत नहीं है। यह ज़्यादा तीव्र होता है क्योंकि इसके साथ बायलॉजिकल कारण जुड़े रहते हैं। लेकिन इसे हम केवल देह का मामला नहीं मान सकते। यह पूरी तरह व्यक्ति से जुड़ा है वरना इंसान प्रेम किसी से करता , *** किसी और से। ऐसा अक्सर नहीं होता। और जहां होता है , वहां हम इसे प्यार नहीं मानते। किसी में नहीं हैं सारी खासियतें प्रेम इन पांच में से किसी एक या एक से ज़्यादा कारणों से हो सकता है। किसी से हम व्यवहार के कारण प्यार कर सकते हैं तो किसी से गुणों के कारण और किसी से रूप के कारण। किसी में गुण और व्यवहार दोनों ही प्यार का कारण बन सकते हैं। लेकिन ये सारे प्यार कितने टिकाऊ होंगे , यह इस पर भी निर्भर करता है कि जिसे या जिन्हें आप प्यार करते हैं , उसे या उन्हें आपमें प्यार करने के कौनसे और कितने कारण मिलते हैं। जैसे आपको कोई किसी कारण अच्छा लग सकता है लेकिन यह भी तो ज़रूरी है कि उसे या उन्हें भी आप अच्छे / अच्छी लगें। तभी मामला जमता है वरना एकतरफा प्यार ज़्यादा दिन नहीं चलता और वह किसी और विकल्प ढूंढने में लग जाता है। कॉलीग के लंच शेयर करने का उदाहरण फिर उठाते हैं। अगर वह सहकर्मी अगले दिन किसी और के सामने वही प्रस्ताव करे तो आपका यह भ्रम टूटता है कि उसे आपका ही साथ प्रिय था। पता चलता है कि उसे साथ देने के लिए कोई व्यक्ति चाहिए था - कल आप थे , आज कोई और है। यानी उसने अपनी ज़रूरत पूरी की।
ऐसे में आप (1) किसी और टिफिन शेयर करनेवाले / वाली को ढूंढें , ( 2) अपने कॉम्पिटिटर्स से जलते रहें , ( 3) यह मान ले कि वह प्रेम करने योग्य है ही नहीं क्योंकि उसका यह व्यवहार एक्सक्लूसिवली आपके लिए नहीं है। प्रेम के लिए ज़रूरी है यह एहसास कि मुझमें कुछ खूबियां हैं जिसके कारण लाखों की भीड़ में मुझे चाहा जा रहा है। लेकिन गड़बड़ी यहीं से शुरू होती है। इंसान यह नहीं सोचता कि उसमें कुछ खासियतें हैं न कि सभी खासियतें। किसी एक खासियत के चलते यदि आपसे प्रेम किया जा सकता है तो किसी और खासियत के कारण किसी और से भी। एक लड़की एक साथ दो या तीन लड़कों से प्रेम कर सकती है अगर उसे उन तीनों के प्यार करने लायक अलग-अलग खूबियां मिलें। अगर वह लड़की भी उन तीनों से बराबर प्यार पाए तो उससे सुखी इंसान दुनिया में कोई नहीं है। लेकिन वे तीनों लड़के जो उस लड़की को प्यार कर रहे हैं , उसका पूरा प्यार नहीं पा रहे और यही उनकी ईर्ष्या का कारण बनाता है। एक से ज़्यादा लोगों से प्रेम के मामले में दिक्कत यह है कि यह गणित के नियम को मानता है। प्रेम ज्ञान की तरह बांटने से बढ़ता नहीं। यहा जितना बांटो , उतना घटेगा वाला नियम चलता है।
क्या प्यार मापने का कोई पैमाना है ? प्यार बंटने का मतलब क्या है ? क्या कोई ऐसा पैमाना है जिससे प्यार को मापा जा सके ? बिल्कुल है। और वह यह कि जो कुछ आपके पास है , उसका कितना हिस्सा आप अपने प्रिय को देने के लिए तैयार हैं। जैसे आपके पास 24 घंटे हैं - इनमें से कितने घंटे या मिनट आप अपने प्रिय के बारे में सोचने में खर्च करते हैं या कितना वक्त उसके साथ गुज़ारते हैं या गुज़ारने को तैयार हैं। आपके पास पैसा है - उसका कितना हिस्सा बिना किसी टेंशन के उसके लिए खर्च करने को तैयार हैं। आपका समाज में नाम है , इज़्ज़त है - आप अपने लवर के लिए किस हद तक उस इज़्ज़त को दांव पर लगाने को तैयार हो जाता हैं। जब आपका प्यार बंटता है तो कहने का मतलब यही है कि आपका वक्त बंटता है , आपका खर्च बंटता है , आपकी चिंताएं बंटती हैं। यदि आप किसी एक से ही प्यार करते हैं तो अपने वक्त , दौलत , चिंता का सारा खज़ाना उसी एक पर उड़ेल देते हैं। यदि आप दो या तीन लोगों से प्यार करते हैं तो सभी के हिस्से में आपका थोड़ा-थोड़ा वक्त , दौलत और चिंता आएगी। इसी कारण ऐसे रिश्ते गड़बड़ा जाते हैं जहां किसी रिलेशनशिप में पार्टनर A एकाधिक प्रेम का कृष्ण सिद्धांत अपना रहा है और पार्टनर B एकनिष्ठता का राम सिद्धांत। क्योंकि पार्टनर A - B और C का पूरा-पूरा प्यार पा रहा है लेकिन B और C को A का आधा-आधा प्यार ही मिल रहा है। मैथ की भाषा में A 100 यूनिट प्यार बांट कर 200 यूनिट प्यार पा रहा है जबकि B और C 100-100 यूनिट प्यार देकर 50-50 यूनिट प्यार पा रहे हैं। साफ है कि एक ही व्यक्ति को अपना सारा प्यार देनेवाले घाटे में रहे। अगर B और C भी A के अलावा किसी D या E से प्यार करते तो उनके जीवन में यह कमी नहीं रहती।
इस गड़बड़ी को आम घर-परिवार के खांचे में भी समझा जा सकता है जहां नई बहू आई है। पति अपनी मां , भाई , बहन , पिता आदि सबसे प्रेम करता है इसलिए पत्नी के हिस्से में पति का सेंट-परसेंट प्यार नहीं आता। दूसरी ओर पत्नी अपना सौ फीसदी प्यार पति पर ही बरसाती है क्योंकि घर के बाकी लोगों से उसके आत्मीय संबंध इतनी जल्दी पनप नहीं सकते। ऐसे में पत्नी घाटे में रहती है और वह पति से शिकायत भी करती रहती है कि जितना प्यार वह पति से करती है , उतना वह पा नहीं रही। दूसरी ओर अगर पति अपना सारा प्यार (चिंता , पैसा , वक्त) पत्नी पर ही निछावर कर दे तो मां , बहन , भाई और पिता को प्रॉब्लम होने लगती है क्योंकि उनके हिस्से का प्यार (चिंता , पैसा , वक्त) कम हो गया। इसी कारण संयुक्त परिवार में नई बहू के आते ही टेंशन उत्पन्न होने लगता है। लैला को भुलाया जा सकता है बशर्ते ... एकाधिक प्यार की थियरी से ही निकलता है सही विकल्प का सिद्धांत। इसे समझने के लिए एक उदाहरण की मदद लें। आपको पुलाव पसंद है लेकिन किसी कारण वह आपको नहीं मिल सकता। तो आप क्या करेंगे - परांठे खा लेंगे बशर्ते परांठों से आपको परहेज़ नहीं है। ज़्यादा भूख लगी हो तो परहेज़ को भी तोड़ देंगे या फुल्के खा लेंगे। प्रेम के मामले में भी ऐसा ही है। जिससे प्रेम हो , उसी स्तर का व्यक्ति अगर मिल जाए तो पहलेवाले को भूला जा सकता है। बल्कि उससे कम स्तर का व्यक्ति भी मिले तो उसे चाहा जा सकता है जैसे पुलाव की जगह रोटी से भूख मिटाई जा सकती है। चूंकि प्रेम एक भावना है जो ‘ कोई मेरा और मैं किसी का / की ’ का एहसास कराती है , इसलिए कोई और किसी का रूप बदलने से भावना नहीं बदलती - उसी तरह जैसे एक ही क्वॉलिटी के खाने के आयटम बदलने से भूख का चरित्र और स्वाद का आनंद नहीं बदलता।
प्रेम भी मानसिक भूख ही है। हां , अगर जिसे खोया और जिसे पाया , उन दोनों में स्तर का फर्क हो तो एक अभाव रह जाता है। जैसे एक युवक किसी सुंदर लड़की से प्यार करता था जिसे वह नहीं पा सका। उस लड़की में बाकी जो गुण थे , वे किसी और लड़की में भी थे , बस वह उतनी सुंदर नहीं थी। ऐसे में दूसरी लड़की से शादी करके वह खुश तो रहेगा लेकिन सुंदरता की चाहत पूरी न होने के कारण उसके मन में एक अभाव रहेगा। उस अभाव को पूरा करने के लिए वह आसपास की सुंदर शक्लों को देखकर अपनी प्यास बुझाएगा। कहने का मतलब यह कि अगर मजनूं को लैला जैसी या उससे कमतर प्रेमिका मिल जाती जो उससे उतना ही प्यार करती जितना लैला करती थी तो मजनूं लैला के बगैर भी जी लेता , और उतने ही सुख से जीता।

रविवार, जनवरी 25, 2009

मौत से ठन गई!

कहते हैं न कि ℓιƒє ιѕ тнє ρєямιѕѕιση тσ кησω ∂єαтн●•∙
बस... यही सोचते-सोचते एक दिन मैं मौत को ढूँढने चल पड़ा,
कि अचानक मुझे पंडित अटल बिहारी बाजपेयी जी की ये
कविता मिल गई और मैं बिना देर लगाए
इसे अपने ब्लॉग में समा बैठा!
आप भी पढ़ें और देखें किइन पंक्तियों में
कितनी सत्यता और सार्थकता है...

ठन गई! मौत से ठन गई!
जूझने का मेरा इरादा न था,
किसी मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था,
रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई,
यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई।
मौत की उमर क्या है?
दो पल भी नहीं,
ज़िन्दगी सिलसिला,
आज कल की नहीं।
मैं जी भर जिया,
मैं मन से मरूँ,
लौटकर आऊँगा,
कूच से क्यों डरूँ?
तू दबे पाँव,
चोरी-छिपे से न आ,
सामने वार कर फिर मुझे आज़मा।
मौत से बेख़बर,
ज़िन्दगी का सफ़र,
शाम हर सुरमई,
रात बंसी का स्वर।
बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं,
दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं।
प्यार इतना परायों से मुझको मिला,
न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला।
हर चुनौती से दो हाथ मैंने किये,
आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए।
आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है,
नाव भँवरों की बाँहों में मेहमान है।
पार पाने का क़ायम मगर हौसला,
देख तेवर तूफ़ाँ का,
तेवरी तन गई।
मौत से ठन गयी!! मौत से ठन गयी!!

देश की तस्वीर इनकी नज़र में...

साभार:-गायत्री शर्मा
वर्ष 2008 देश के लिए एक ऐसा निर्णायक वर्ष रहा, जब देश ने कई आतंकवादी धमाकों व राजनीतिक उलटफेर के रूप में कई आघात सहे परंतु इतने पर भी यह देश अपने संस्कारों व अपने जज्बे के कारण उसी हौसले से खड़ा रहा। इस दौर ने देश को जनतंत्र की एक ऐसी आवाज दी, जो शायद कहीं गुम हो चुकी थी। हर व्यक्ति ऊँच-नीच, जाति-पाति के भेदभाव को भुलाकर केवल और केवल अपने देश के बारे में सोच रहा था। इन धमाकों में हमने बहुत कुछ खोया परंतु जो पाया वह शायद खरे सोने के समान शुद्ध था और वह था देशप्रेम का जज्बा, जो हर भारतीय को अपने देश के लिए कुछ कर गुजरने को झकझोर रहा था। यदि हम इस वर्ष के मुद्दों की बात करें तो इस वर्ष आतंकवाद, आसमान छूती महँगाई, शेयर बाजार की गिरावट व भ्रष्ट राजनीति बहस का मुद्दा बनकर सुर्खियों में छाए रहे। वहीं दूसरी ओर देश की लाज बचाई उन जाँबाजों, धुरंदर खिलाडि़यों तथा कलाकारों ने दुनिया के नक्शे पर भार‍त का नाम रोशन किया। इन सभी ज्वलंत मुद्दों के संदर्भ में हमने 'वर्ष 2008 का आकलन' विषय पर देश की कुछ ख्यातनाम हस्तियों से चर्चा की तो उनका इस विषय में ये कहना था -
वर्तिका नंदा (देश की प्रख्यात युवा पत्रकार) :- मैं मानती हूँ कि हमारे देश के लिए यह वर्ष खट्टा-मीठा और नासमझीभरा रहा। इस वर्ष चर्चा का विषय बने 'आतंकवाद' ने जहाँ लोगों को संगठित होने की शिक्षा दी, वहीं आतंकवादियों के खात्मे ने हमारे होंठों पर जीत की खुशी भी दर्ज कराई। इन हमलों के पूर्व देश में जो सांप्रदायिक मतभेद गहराने लगा था वह सभी आतंकवाद की आड़ में गुम हो गया। लोगों का विरोध खुलकर सामने आया। इन हमलों में किसी हिन्दू या मुस्लिम को चुनकर नहीं मारा गया, बल्कि आम भारतीय को मारा गया। इस वर्ष की एक बहुत अच्छी उपलब्धि यह रही कि कल तक आमजन का पुलिस पर से जो विश्वास उठ गया था तथा जिस खाकी वर्दी को सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा जाता था, अब वह कौम सम्मान की अधिकारी बन गई है। आज मुसीबत के वक्त यही पुलिसकर्मी हमारे काम आए न कि कोई राजनेता। मेरे अनुसार पिछले बीस-बाईस सालों में पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था कि जनता ने सार्वजनिक स्थानों पर खुलकर विरोध प्रदर्शन किया हो। इस वर्ष पहली बार लोगों ने सिरफिरे राजनेताओं को सबक सिखाया। जिस तरह से इन धमाकों में हमारे पुलिस के कई जवान मारे गए, वह बेहद ही दु:ख की बात है। हेमंत करकरे की पत्नी का मीडिया को दिया गया बयान हो या उन्नीकृष्णन के पिता का मुख्यमंत्री को जवाब देने का ढंग, सभी हमारी सच्चाई व ताकत के परिचायक हैं। इस वर्ष की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि इस वर्ष हमने सच को कहना, अपनी गलती स्वीकारना व अपना पक्ष रखना सीखा।
पिछले बीस-बाईस सालों में पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था कि जनता ने सार्वजनिक स्थानों पर खुलकर विरोध प्रदर्शन किया हो। इस वर्ष पहली बार लोगों ने सिरफिरे राजनेताओं को सबक सिखाया।
कुलदीप नैयर (देश के जाने-माने स्तंभकार) :- 'मैं मानता हूँ कि वर्ष 2008 देश के लिए अच्छा रहा। इस वर्ष हमें चुनौतियाँ मिलीं, जिनसे हमने बहुत कुछ सीखा। यह इसी सीख का परिणाम था कि बहुत सालों बाद सार्वजनिक स्थानों पर देशवासियों की एकता देखने को मिली। मैं बहुत अरसे से कोशिश कर रहा हूँ कि भारत और पाकिस्तान के संबंधों में सुधार आए। अब तक इस संबंध में जो भी कोशिशें की गई थीं, इन धमाकों ने उन सब कोशिशों पर पानी फेर दिया। मुझे इस वर्ष एक रिपोर्ट पढ़कर बहुत बुरा लगा कि आज भी देश में गरीबी और महँगाई व्याप्त है। आज भी हमारे देश के 77 प्रतिशत लोग केवल 2 डॉलर पर जीते हैं। आखिर हमें इस गरीबी व महँगाई से कब मुक्ति मिलेगी?
चित्रा मुद्‍गल (देश की ख्यातनाम लेखिका व समाजसेविका) :- मैं हर चीज को बड़ी ही सकारात्मक दृष्टि से देखती हूँ। आतंकवाद एक चुनौती थी, जिसे इस देश के जनतंत्र ने बड़े ही साहसिक रूप में लिया है। मैं आतंकवाद से भी काफी बड़ी चुनौती महँगाई को मानती हूँ क्योंकि पेट की भूख हर किसी को सताती है तथा इस भूख ने इस बार भी कई लोगों को मौत की नींद सुला दिया। आज भी आलू इस देश में बड़ी मात्रा में पैदा होता है परंतु यहीं पर यह आलू 5 रुपए किलो बिकने के बजाय 15 से 20 रुपए किलो के महँगे दामों पर बिकता है, आखिर क्यों? आखिर क्यों सरकार इसके लिए कोई गाइड लाइन तय नहीं करती?
आज जिस तरह से समाज व देश में असंतुलन की स्थिति है वह बेहद ही चिंताजनक है क्योंकि किसी भी प्रकार का असंतुलन होने पर हम कभी किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पाएँगे।
मुझे लगता है कि यदि सरकार दामों के संबंध में एक गाइड लाइन तय कर दे तो शायद इस आसमान छूती महँगाई पर कुछ हद तक अंकुश लग सकता है। बचपन में हमने स्कूल में पढ़ा था कि भारत एक कृषिप्रधान देश है तब हमने यह नहीं सोचा था कि कल को यहाँ की ही जनता में अनाज के लिए त्राहि-त्राहि मचेगी। आज हमारे देश का माल देश में कम तथा विदेशों में अधिक बेचा जाता है। आज अमीर हो या गरीब हर व्यक्ति अपने पेट की भूख को शांत करने के लिए कमाता है। सरकार को चाहिए कि वह इस दिन-ब-दिन बढ़ती महँगाई पर अंकुश लगाए और देश को विकास की चरम सीमा पर ले जाए। आज महँगाई का तेजी से बढ़ना व नागरिक सुरक्षा के औसत का घटना बेहद ही चिंताजनक विषय है। यह देश हम सभी का है। यह किसी हिन्दू या मुस्लिम का नहीं है। वर्तमान में तुष्टीकरण को लेकर जो भी असंतोष उभर रहा है वह गुब्बारे में सूई की तरह चुभ रहा है। वर्तमान में देश की कानून-व्यवस्था बिगड़ने के जिम्मेदार केवल और केवल इस देश के राजनेता हैं, जो सत्ता की शह और मात में देशवासियों की मासूम जिंदगियों से खेल रहे हैं।
शोवना नारायणन (देश की मशहूर कथक नृत्यांगना) :- हर वर्ष चुनौतियों को लेकर लाता है। वर्ष 2008 भी चुनौतियों से ही भरा था। आज व्यक्ति सोचने पर मजबूर है कि इस देश में आखिर ये क्या हो रहा है? आखिर हम क्या चाह रहे हैं? अब हर व्यक्ति को गंभीरता से इस बारे में सोचना ही होगा क्योंकि व्यक्ति से ही समाज बनता है और समाज से ही कोई देश बनता है। आज जिस तरह से समाज व देश में असंतुलन की स्थिति है वह बेहद ही चिंताजनक है क्योंकि किसी भी प्रकार का असंतुलन होने पर हम कभी किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पाएँगे। निष्कर्ष के रूप में कहा जाए तो अब हमें गंभीरता से यह सोचना चाहिए कि हमें किस राह पर चलना है। हमें मुश्किलों का बहुत ही संजीदा ढंग से हल निकालकर उसका सामना करना चाहिए। मुश्किलें तो आती रहेंगी, उनसे घबराना कायरता होगी। आज हम सभी को इंसानियत व इस देश के बारे में सोचना होगा।

रामकृष्ण गौतम (एक अदना सा युवक) :- देश की असली तस्वीर देश के प्रधानमंत्री "मनमोहन सिंह" की "बाइपास सर्जरी" है...!!!

गुरुवार, जनवरी 22, 2009

मेरी नज़र में तमन्ना!



मेरी नज़र में तमन्ना का मतलब है एक ही दिन में आकाश छू लेने की चाहत! इससे दो फायदे हैं... एक ये कि हमें आकाश कि ऊँचाई का एहसास हो जाएगा और दूसरा हमें ख़ुद कि "औकात" भी मालूम हो जाएगी... वैसे दूसरा फायदा ज़्यादा अच्छा है... क्योंकि स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि "सबसे बड़ा ज्ञानीवही है जो ख़ुद को जानता है" सच है ख़ुद को जानना ही "तमन्ना" कि असली पहचान है...



विकसित देशों की पहचान!


(1) गुरु : विकसित देश की पहचान बताओ राम ।
राम : विकसित देश कपड़ा नहीं बनाते गुरुदेव।
गुरु : तब वे क्या बनाते हैं?
राम : वे हथियार बनाते हैं।
गुरु : तब वे अपना नंगापन कैसे ढकते हैं?
राम : हथियारों से उनकी नंगई ढक जाती है।

(2) गुरु : विकसित देश की पहचान बताओ राम ।
राम : विकसित देश में लोग खाना नहीं पकाते।
गुरु : तब वे क्या खाते हैं?
राम : वे 'फास्ट फूड` खाते हैं।
गुरु : हमारे खाने और 'फास्ट फूड` में क्या अंतर है।
राम : हम खाने के पास जाते हैं और 'फास्टर फूड` खाने वाले के पास दौड़ता हुआ आता है।

(3) गुरु : राम विकसित देश की पहचान बताओ।
राम : विकसित देशों में बच्चे नहीं पैदा होते।
गुरु : तब कहां कौन पैदा होते हैं?
राम : वहां जवान लोग पैदा होते हैं जो पैदा होते ही काम करना शुरू कर देते हैं।

(4) गुरु : विकसित देश की पहचान बताओ राम ।
राम : विकसित देशों में सच्चा लोकतंत्र है।
गुरु : कैसे हरिराम?
राम : क्योंकि वहां केवल दो राजनैतिक दल होते हैं।
गुरु : तीसरा क्यों नहीं होता?
राम : तीसरा होने से सच्चा लोकतंत्र समाप्त हो जाता है।

(5) गुरु : विकसित देश की पहचान बताओ राम ।
राम : विकसित देशों में आदमी जानवरों से बड़ा प्यार करते हैं।
गुरु : क्यों?
राम : क्योंकि जानवर आदमियों से बड़ा प्यार करते हैं।
गुरु : क्यों नहीं वहां आदमी आदमियों से और जानवरों से प्यार करते हैं?
राम : क्योंकि विकसित देशों में आदमियों को आदमी और जानवरों को जानवर नहीं मिलते।

(6) गुरु : विकसित देश की कोई पहचान बताओ राम ।
राम : विकसित देश विकासशील देशों को दान देते हैं।
गुरु : और फिर?
राम : फिर कर्ज देते हैं।
गुरु : और फिर?
राम : फिर ब्याज के साथ कर्ज देते हैं।
गुरु : और फिर?
राम : और फिर ब्याज ही कर्ज देते हैं।
गुरु : और फिर?
राम : और फिर विकसित देशों को विकसित मान लेते हैं।

(7) गुरु : विकसित देशों की पहचान बताओ राम ।
राम : विकसित देशों में बूढ़े अलग रहते हैं।
गुरु : और जवान?
राम : वे भी अलग रहते हैं।
गुरु : और अधेड़?
राम : वे भी अलग रहते हैं।
गुरु : तब वहां साथ-साथ कौन रहता है?
राम : सब अपने-अपने साथ रहते हैं।

(8) गुरु : विकसित देशों की पहचान बताओ राम ।
राम : विकसित देशों में मानसिक रोगी अधकि होते हैं।
गुरु : क्यों? शारीरिक रोगी क्यों नहीं होते?
राम : क्योंकि शरीर पर तो उन्होंने अधिकार कर लिया है मन पर कोई अधिकार नहीं हो पाया है।

(9) गुरु : विकसित देश की पहचान बताओ राम ।
राम : विकसित देशों में तलाक़ें बहुत होती हैं।
गुरु : क्यों?
राम : क्योंकि प्रेम बहुत होते हैं।
गुरु : प्रेम विवाह के बाद तलाक़ क्यों हो जाती है?
राम : दूसरा प्रेम करने के लिए।

(10) गुरु : विकसित देश की पहचान बताओ राम ।
राम : विकसित देश मानव अधिकारों के प्रति बड़े सचेत रहते हैं।
गुरु : क्यों?
राम : क्योंकि उनके पास ही विश्व की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति है।
गुरु : हरिराम सैन्य शक्ति और मानव अधिकारों का क्या संबंध?
राम : गुरुदेव, विकसित देश सैन्य बल द्वारा ही मानव अधिकारों की रक्षा करते हैं।

बुधवार, जनवरी 21, 2009

फूल खिल गए लेकिन खुशबु कहाँ..?


विश्व की सबसे ताक़तवर कंट्री अमेरिका के चवालीस वें राजा "बराक हुसैन ओबामा" ने मंगलवार को रात ग्यारह बजकर दस मिनट (भारतीय समयानुसार) पर दुनिया पर अधिपत्य की शपथ लेली... लेकिन न तो कोई धमाका हुआ, न आसमान से कोई तारे टूटे और न ही कोई पहाड़ अपनी जगह से हिला... क्यों कोई आकाशीय पिंड धरती पर नही गिरा... ये सब नही हुआ तो कोई बात नही पर कम से कम स्वर्गलोक के त्रिदेवों को तो सोचना चाहिए था कि "बराक हुसैन" के ऊपर फूलों कीवर्षा कर दें पर ऐसा भी नही हुआ... भई! ऐसा क्यों नही हुआ...? ये सोचने का मुद्दा है... जैसे हाल में "मंदी" के विषय में सोचा जा रहा है... खैर! ऊपर वाले की भी "बराक हुसैन" को लेकर कोई न कोई मंशा तो छिपी हुई है... मानो या न मानो... अरे! ऐसा क्यों नही हो सकता... भई! "बराक" दुनिया के सरताज (अमेरिका) का राजा जो ठहरा... मैंने समाचार में सुना है कि "बराक" ने ठीक उसी तरह शपथ ली जैसे कि महान "अब्राहम लिंकन" और "मार्टिन लूथर किंग" ने ली थी... भई! जो भी हो पर "बराक" पूरी दुनिया को भा गया... देखते ही देखते एक अदना सा "बराक" The 44th Precident of America हो गया... भई! लाज़वाब... मज़ा आ गया... "बराक" ने अपनी इस उपलब्धि से न जाने कितने ब्लोगर्स को लिखने का विषय दे दिया (जैसे कि मुझे)...

न जाने कितने पत्रकारों को मसालेदार समाचार और न जाने कितने "कलमघिस्सुओं" को "पेन की रिफिल" ख़तम करने की वज़ह...? चाहे जो भी हो पर अब "बराक" बन गया है... "बराक हुसैन ओबामा"! अमेरिका का चवालीस वां राष्ट्रपति...!

मंगलवार, जनवरी 20, 2009

Bharat, Obama and Terrorism

Obama says India’s democracy will win over terrorism
Washington, Friday 28 November 2008: India’s democracy ”will prove far more resilient than the hateful ideology that led to these attacks” in Mumbai, US President-elect Barack Obama said on Wednesday as the world reached out to India in sympathy and support over what American analysts described as “India’s 9/11.”
Both the incumbent Bush administration and Obama and his transition team sent out strong messages of condemnation of the attacks and their backing for India even as they coordinated their response in the transition phase in the United States. President Bush phoned Prime Minister Manmohan Singh from Camp David early on Thursday morning to offer support and US help in investigation.
Secretary of State Condoleezza Rice briefed Obama over the phone as the White House assembled its national security and intelligence chiefs for discussion and analysis and offered India any help it required.
In comments that extolled India’s institutional strength and was directed against the fundamentalist mindset in the neighbourhood, Obama also predicted the triumph of democracy over the sickening ideology of extremism even as terrorists/mujahideen earned universal disgust over the attack of Indian civilians and foreign nationals.

एक कड़वा सच अमेरिका के एतिहासिक दिन का...


बराक ओबामा संयुक्त राज्य अमेरिका के 44वें राष्ट्रपति हैं। दुनिया के सबसे शक्तिशाली पद पर आसीन होने के बाद ओबामा के सामने सबसे बड़ी और पहली चुनौती अमेरिका को आर्थिक मंदी से उबारना होगी।पूरा अमेरिका पिछले कई महीनों से आर्थिक मंदी से जूझ रहा है, कई कंपनियाँ बंद हो गई हैं, कई नौकरियाँ जा चुकी हैं तो कई जाने वाली हैं। ओबामा का शपथ ग्रहण समारोह अमेरिका के इतिहास में अब तक का सबसे महँगा समारोह है। चौंकाने वाली बात यह इस समारोह के लिए चंदा देने वाली वे कं‍पनियाँ हैं, जो पिछले काफी समय से आर्थिक मंदी का रोना रो रही हैं।एक रिपोर्ट के अनुसार ओबामा के शपथ ग्रहण समारोह का अनुमानित खर्च 170 मिलियन अमेरिकी डॉलर है। 2005 में जॉर्ज बुश के कार्यकाल में यह 42।3 मिलियन अमेरिकी डॉलर था, जबकि 1993 में बिल क्लिंटन के शपथ ग्रहण समारोह में यह 33 मिलियन अमेरिकी डॉलर था।आखिर मंदी के दौर में इतने भव्य समारोह की क्या आवश्यकता है? सवाल यह है कि मंदी से उबरने के लिए बैल आउट पैकेज के लिए आनाकानी करने वाली अमेरिकी सरकार के पास आखिर इतना धन आया कहाँ से? खबर है कि यह धन उन कंपनियों ने उपलब्ध करवाया है, जो या तो मंदी का रोना रोकर अपने यहाँ नौकरियाँ कम कर रही हैं या दिवालिया घोषित हो चुकी हैं।इन कंपनियों के पास अपने यहाँ नौकरी कर रहे लोगों को देने के लिए पैसा नहीं है, लेकिन इस भव्य समारोह के लिए 'चंदा' देने के लिए धन है। समारोह के लिए चंदा देने में पिछले दिनों हजारों नौकरियाँ खत्म करने वाली सिटी बैंक का नाम सबसे ऊपर है। सिटी बैंक ने 113000 अमेरिकी डॉलर का चंदा दिया है। दिवालिया घोषित हो चुकी कंपनी लैहमैन ब्रदर्स होल्डिंग्स भी चंदा देने के मामले में सिटी बैंक से पीछे नहीं है। लैहमैन ब्रदर्स ने 115000 डॉलर इस समारोह के लिए दिए हैं। इस तरह ओबामा के समारोह के लिए चंदा देने वालों की सूची लंबी है और इसमें गूगल, माइक्रोसॉफ्ट जैसे नाम प्रमुख हैं। जाहिर है यह चंदा ओबामा सरकार से राहत पाने की नीयत से दिया जा रहा है।

रविवार, नवंबर 30, 2008

26 नवम्बर की दर्दीली तारीख..!!!

तारीखें इतिहास में इतने दर्दनाक और मनहूस तरीके से भी दर्ज होती हैं शायद। 26 नवम्बर ऐसी ही तारीख है जिसने अपने चेहरे पर शोक, आंसू, तबाही, बरबादी, भय, बेबसी और अविश्वास की कई इबारतें लिख ली हैं। शनिवार सुबह पूरे 59 घंटे की लगातार जंग के बाद मुंबई को हालांकि सेना के जवानों और मरीन कमांडो ने आतंकियों के कब्जे से आजाद करा लिया, लेकिन इस आजादी की बहुत भारी कीमत देश ने चुकाई है। इस जंग में कई नायाब हीरे शहीद हुए हैं। मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख ने शहीदों के लिए आज मुआवजे की घोषणा की, लेकिन जो नुकसान मारे गए या घायल हुए सैकड़ों हंसते–खेलते–आबाद परिवारों ने झेला है उसे कोई मुआवजा नहीं भर सकता। आज जोर–शोर से जंग में जीत का ऐलान हुआ लेकिन यह जानना कितना विस्मयकारी अनुभव है कि बीस से तीस साल के कुल दस सिरफिरों ने 59 घंटे तक पूरी दुनिया को हिलाये रखा। ताज, आ॓बेरॉय और नरीमन भवन मुक्त करा लिए गए, लेकिन उनकी काफी दुर्दशा हो चुकी है। ताज तथा आ॓बेरॉय के जिस वैभवशाली खुशगवार परिसर में हवाएं भी कुछ देर ठहरना पसंद करती थीं, वहां से आज उन्हें गुजरने में भी डर लग रहा है। मुंबई के वैभव को विनाश की बद्दुआ में अभिशप्त छोड़ दस में से नौ आतंकी मारे गए। एक को पुलिस ने पकड़ा है। सोचिए, इकलौता पकड़ा गया आतंकवादी आजम अमीर कासव (21 वर्ष) भी मारा जाता तो कितने मायूस, लाचार और निहत्थे रह जाते हम। आतंकवादी सरगनाओं तक पहुंचने के तमाम रास्तों की दिशाएं खो जातीं अगर गिरगांव चौपाटी पर हुई मुठभेड़ में अपने साथी आतंकवादी के साथ यह आतंकवादी भी धराशाई हो जाता। 26 नवम्बर का नृशंस नरसंहार इन्हीं दो लड़कों ने शुरू किया था। इनके नरसंहार ने देश–दुनिया के अनेक महत्वपूर्ण, वैभवशाली और प्रतिभावान लोगों को भी मौत की नींद सुला दिया। जैसे-जैसे परतें उघड़ रही हैं दिमाग की सांय–सांय बढ़ रही है। शहर की वर्ली स्थित नामी ‘ताआ॓ आर्ट गैलरी’ के मालिक पंकज शाह भी इस हमले में मारे गए हैं। मशहूर आर्ट डीलर कल्पना शाह के पति पंकज अपने कुछ व्यापारिक मित्रों के साथ आ॓बेरॉय होटल के प्रतििष्ठत कंधार रेस्त्रां में डिनर ले रहे थे। उनके साथ डिनर कर रहे एकमात्र जीवित व्यक्ति अपूर्व ने खुलासा किया है कि कंधार और टिफिन रेस्त्रां में डिनर कर रहे लोगों को आतंकवादी होटल की छत पर ले गए। लाइन में खड़ा किया और गोलियों से उड़ा दिया। अपूर्व इसलिए बच गए क्योंकि उनके आगे खड़ा एक व्यक्ति गोली लगने के बाद उनके ऊपर जोर से गिर पड़ा। उसके साथ अपूर्व भी गिरे। तो भी एक गोली उनकी गर्दन को छूते हुए गुजर गई। मां रक्षमणि बेन शाह, पत्नी कल्पना शाह, बेटी संजना शाह और बेटे सृजन शाह के साथ रहने वाले पंकज शाह का आज शाम साढ़े तीन बजे बाणगंगा, बालकेश्वर में दाह संस्कार कर दिया गया। ‘धमाल‘, ‘स्पीड‘ और ‘ईएमआई‘ जैसी हिट फिल्मों में काम कर चुके युवा अभिनेता आशीष चौधरी ने अपनी बहन और बहनोई को गंवा दिया। बहन मोनिका और बहनोई अजित भी 26 नवम्बर की रात आ॓बेरॉय होटल में डिनर पर गए थे। शुक्रवार को उनकी लाशें बाहर आईं। बताया गया है कि आतंकवादियों ने पहले दोनों के पैरों पर गोली मारी फिर सिर पर वार किया। दोनों अपने पीछे अपने दो अबोध बच्चों (पांच साल की बेटी और आठ साल का बेटा) को छोड़ गए हैं। शहर के एक खेल पत्रकार ने बताया, 26 नवम्बर की रात आ॓बेरॉय होटल में खाना खा रहे कराटे के विश्वप्रसिद्ध कोच दिनशा पर भी आतंक का पहाड़ टूटा। फिटनेस और एडवेंचर पर कई किताबें लिख चुके दिनशा को अस्पताल ले जाया गया जहां 28 नवम्बर की रात उन्होंने दम तोड़ दिया। मुंबई के ठाणे इलाके में रहने वाली एक महिला को उसकी शादी की सालगिरह 27 नवम्बर को पति का शव मिला। ताज होटल में चीफ शेफ जैसी बड़ी नौकरी करने वाले फॉस्टिन मार्टिन हालांकि आतंकियों के चंगुल से निकल गए थे लेकिन इसी होटल के डेटा ऑपरेशन सेंटर में कार्यरत उनकी बेटी प्रिया वहां फंसी रह गई थी। 26 नवम्बर की रात पहली मंजिल पर फंसे फॉस्टिन को रात दो बजे के करीब बाहर निकाल लिया गया था। बाहर आकर फॉस्टिन ने बेटी को फोन किया तो बेटी ने भूख लगने और डरने की बात बताई। भोजन का पैकेट लेकर फिर होटल में घुसे इस चिंतातुर पिता को इस बार आतंकवादियों ने गोलियों से उड़ा दिया। भोजन करते लोगों को मौत की नींद सुला देने की करतूत करने वाले आतंकवादी खुद अपने लिए पूरे तीन दिन का भोजन–पानी लेकर शहर को ध्वस्त करने निकले थे। ताज होटल में फंसे शहर के सबसे बुजुर्ग दंपत्ति सुंदर थडानी (85 वर्ष) और कविता (79 वर्ष) हालांकि इस हादसे से बच निकले भाग्यशाली लोग हैं लेकिन हादसे को याद कर वह अब भी सहम जाते हैं। दोनों एक विवाह समारोह में शामिल होने 26 नवम्बर की रात ताज होटल गए थे। नौ चालीस पर हुई गोलीबारी के बाद मची भगदड़ के दौरान दोनों को सुरक्षाकर्मियों ने कुर्सियों और मेजों से ठसाठस भरे एक कमरे में पहुंचा दिया, जहां पहले से पचास के करीब स्त्री-पुरूष मौजूद थे। इनमें कुछ विदेशी भी थे। आर्थराइटिस की मरीज कविता थडानी ने बताया है, ‘कमरे में सैंडविच और कोल्ड ड्रिंक की व्यवस्था तो थी लेकिन पीने के लिए पानी नहीं था। उस कमरे में टॉयलेट जाने का कोई इंतजाम नहीं था।

गुरुवार, नवंबर 27, 2008

कुछ बातें...

दुनिया के दूसरे सफल ब्लोगर "समीर लाल" से मैंने बात की थी, और उनका साक्षात्कार किया था... जिसे मेरे अखबार ने उन्नीस नम्बर के पृष्ठ पर स्थान दिया था... यह इंटरव्यू मैंने छब्बीस नवम्बर २००८ को किया था...

उनसे बातचीत के दौरान मैंने ब्लॉग के बारे में काफी साड़ी बातें जानी! हो सकता है कुछ पाठक इसे पढने से रहे हों! पर मुझे यकीन है महोदय समीर ने इसे ज़रूर पढ़ा होगा और यह भी दावे से कह सकता हूँ कि मेरी इस पोस्टिंग को भी वो पढेंगे और अपने कमेंट्स रुपी फूल मुझ तक ज़रूर पहुंचाएंगे!

महोदय समीर का ब्लॉग वर्तमान में काफी चर्चित है और पांच हज़ार चार सौ सरसठ ब्लोग्स के मायने उनका ब्लॉग आज दूसरे नंबर पर है... उनका ब्लॉग यूआरएल http://udantashtari.blogspot.com/ है. मेरी इस पोस्टिंग को पढने वालों से मैं यही निवेदन करूंगा की महोदय का ब्लॉग विजिट करें और अपनी प्रतिक्रियाएं दें ...!!!

गौर फरमाएं...

लोग अक्सर कविताओं को पढने की चीज़ मानते हैं, पढ़ते हैं और भूल जाते हैं, फिर एक नई कविता पढ़ते हैं और फिर भूल जाते हैं! यह कविता मुझे पढने लायक तो लगी ही पर साथ ही याद रखने लायक भी लगी रचनाकार किसी की ये रचना मुझे बेहतर लगी और मैंने झट ही इसे अपने ब्लॉग में समा बैठा..!!

गौर फरमाएं...

मंगलवार, नवंबर 18, 2008

काना बाती कुर्र, चिड़िया उड़ गई फुर्र...


इधर कुछ दिनों से उसके पति पर चुनाव का भूत सवार था, उठते-बैठते, खाते-पीते, जागते-सोते, नहाते-धोते, बस चुनाव। चुनाव भी क्या, झाड़ू पार्टी का भूत सवार था। झाड़ू पार्टी का बहुमत आएगा, झाडू पार्टी की सरकार बनेगी, क्योंकि झाड़ू पार्टी के प्रधान उनकी जाति के थे। चिड़िया पार्टी तो गई समझो, वह अक्सर गुनगुनाता फिरता था।
काना बाती कुर्र
चिड़िया उड़ गई फुर्र

उसे चिड़िया पार्टी पर काफी गुस्सा था। उनके हलके के विधायक चिड़िया पार्टी के थे और उन्हीं की शिकायत पर उसका तबादला यहां हुआ था। पति उसे पिछले तीन दिन से एक डम्मी मतपत्र दिखलाकर बार-बार समझा रहा था
कि झाड़ू पर मोहर कैसे लगानी है! कागज कैसे मोड़ना है! उसने तो जूते के खाली डिब्बे की मतपेटी बनाकर उसे दिखलाया था कि वोट कैसे डालनी है! 
आज वे मतदान केन्द्र पर सबसे पहले पहुँच गए थे। फिर भी आधे घण्टे बाद ही उन्हें अन्दर बुलाया गया। चुनाव कर्मचारी उनकी उतावली पर हँस रहे थे। फिर उसका अँगूठा लगवाकर उसकी अंगुली पर निशान लगाया गया, उसका दिल कर रहा था कि अपनी ठुड्डी पर एक तिल बनवा ले, निशान लगाने वाले से।
पिछले चुनाव में उसकी भाभी ने अपने ऊपरी होठ पर एक तिल बनवाया था। हालाँकि उसका भाई बहुत गुस्साया था, इस बात पर। जब उसकी भाभी हँसती थी तो तिल मुलक-मुलक जाता था। उसकी भाभी तो मुँह भी कम धोती थी उन दिनों, तिल मिट जाने के डर से। पर वह लाज के मारे तिल न बनवा पाई। मर्द जाति का क्या भरोसा, क्या मान जाए क्या सोच ले!
अब उसके हाथ में असली का मतपत्रा था और वह सोच रही थी। यहाँ कालका जी आए उन्हें छह महीने ही तो हुए थे। वह राजस्थान के नीमका थाना की रहने वाली थी और पति महेन्द्रगढ़ जिले का। दोनों ही मरुस्थल के भाग थे। हरियाली के नाम पर खेजड़ी और बबूल बस। उसका पति वन विभाग में कुछ था। क्या था ? पता नहीं। कौन सर खपाई करे !
वह वन विभाग में था, इसकी जानकारी भी उसे यहीं आकर हुई जब वे फारेस्ट कालोनी के एक कमरे के क्वार्टर में रहने लगे। यहाँ आकर चम्पा, हाँ यही उसका नाम था न, बहुत खुश थी। यहीं उसे पता लगा कि चम्पा का फूल भी होता है और वो इतना सुन्दर और खुशबू वाला होता है। और तो और उसकी माँ, चमेली के नाम का फूल भी था, यहाँ। इतनी हरियाली, इतनी साफ-सुथरी आबो-हवा, इतना अच्छा मौसम, जिन्दगी में पहली बार मिला था, उसे। फिर सर्दियों में उसका पति उसे शिमला ले गया था। कितनी नरम-नरम रूई के फाहों जैसी बर्फ थी। देखकर पहले तो वह भौचक्क रह गई और फिर बहुत मजे ले लेकर बर्फ में खेलती रही थी। इतना खेली थी कि उसे निमोनिया हो गया था।
फिर यहाँ कोई काम-धाम भी तो नहीं था उसे। चौका-बर्तन और क्वार्टर के सामने की फुलवाड़ी में सारा दिन बीत जाता था। वहाँ सारा दिन ढोर-डंगर का काम, खेत खलिहान का काम और ऊपर से सास के न खत्म होने वाले ताने। फिर ढेर सारे ननद देवरों की भीड़ में, कभी पति से मुँह भरकर बात भी नहीं हो पाई थी, उसकी।
उसने मतपत्र मेज पर फैला दिया। हाय ! री दैया ! मरी झाडू तो सबसे ऊपर ही थी। उसने और निशान देखने शुरू किए। कश्ती, तीर कमान,। तीर कमान देखकर उसे रामलीला याद आई। उसे लगा चिड़िया उदास है, पतंग हाँ पतंग उसे हँसती नजर आई। साइकल, हवाई जहाज, हाथी सभी कितने अच्छे निशान थे और झाडू से तो सभी
अच्छे थे।
''अभी वह सोच ही रही थी कि निशान कहाँ लगाए? तभी वह बाबू जिसने उसे मतपत्र दिया था बोला-बीबी जल्दी करो और लोगों को भी वोट डालने हैं।''
उसने मोहर उठाई और मेज पर फैले मतपत्र पर झाडू को छोड़कर सब निशानों पर लगा दी और मोहर लगाते हुए वह कह रही थी कि चिड़िया जीते, साइकल जीते, कश्ती जीते पर झाड़ू न जीते।
झाड़ू को जितवाकर वह अपना संसार कैसे उजाड़ ले? हालांकि वह मन ही मन डर रही थी कि कहीं पति को पता न लग जाए। 

सब धोखा है...!!!



ये हुस्न है क्या, ये इश्क है क्या,
सब धोखा है, सब धोखा है,
ये चाँदनी शब्, ये ठंडी हवा,
सब धोखा है, सब धोखा है...

वो कैस की लैला धोखा थी,
वो हीर का राँझा धोखा था,
ये ताज महल, ये लाल किला,
सब धोखा है, सब धोखा है ....

वहां शेख ठगी में माहिर है,
यहाँ साकी चालें चलता है,
वो बुतखाना, ये मयखाना,
सब धोखा है, सब धोखा है ...

अब दरवेशों में काट उमर,
यहाँ दौलत शोहरत छोड़ भी आ,
क्या फरक हुआ, जब जान लिया,
सब धोखा है, सब धोखा है ...

रविवार, अक्टूबर 26, 2008

अभिकर्ता जुगनू हुए..!

मोर पपिहा खेजडी, करता रहा तलाश ।धीरे धीरे मिट गया, बादल एक आकाश।.टपटप टपके टापरा, पिया गये परडेर ।बरखा से काली पडी, नजर कूप मुण्डेर।.पूरनमासी शरद की, अमी पयस बरसात ।अंक यामिनी गुलमुहर, झुलसा सारी रात।.असली सूरत लापता, मुह खोटे अनगीन।जैसा ओसर सामने, मुखडे पर धर लीन।.हेम रजत झंकार नित, गूंजे जाके कान।गाली सी वाको लगे, आरती अरु अजान।.अंधियारा मावस भरा, रोशन बिन्दु प्रहार।अभिकर्ता जुगनू हुए , चंदा करे व्यापार।

रविवार, फ़रवरी 17, 2008

Lord Rama is one of the most commonly adored gods of Hindus and is known as an ideal man and hero of the epic Ramayana. He is always holding a bow and arrow indicating his readiness to destroy evils. He is also called "Shri Rama". More commonly he is pictured in a family style, (Ram Parivar) with his wife Sita, brother Lakshman and devotee Hanuman who is sitting near Lord Rama's feet.

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Ricord king!!!!!


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