रविवार, जुलाई 26, 2009

अब न आरजू है, न तमन्ना है कोई...

न आरजू है न तमन्ना है कोई।
अब इस दिल को दिल मिल गया कोई॥


इंतज़ार था सदियों का मेरे जीवन में।
उसे एक झटके में पूरा कर गया कोई॥

अक्सर सोचता रहता था मैं तन्हाई में।
मैं तन्हा क्यों हूँ, मुझे आज तक क्यों नही मिला कोई॥

वो क्या आई ज़िन्दगी में फूल खिल गए लाखों।
सूखे बाग़ में एक प्यार का पौधा लगा गया कोई॥

अब अगर ये सपना है तो ये सदा रहे मेरा।
जो भी हो पर प्यार का मुझे खाब दिखा गया कोई॥

आज इस दिल की धडकनों को धड़कना सिखा गया कोई॥
मेरी आंखों में मोहब्बत के प्यारे ख्वाब सज़ा गया कोई॥

6 Responzes:

"अर्श" ने कहा…

bhav achhe hai magar shilpkaari to shikhni hi hogi.... guru dev ke samparke me aayen ... aap shilp hai shalpkaari jarur sikhen...



arsh

Mithilesh dubey ने कहा…

आज इस दिल की धडकनों को धड़कना सिखा गया कोई॥
मेरी आंखों में मोहब्बत के प्यारे ख्वाब सज़ा गया कोई

बहुत खुब सुन्दर रचना।

venus kesari ने कहा…

अर्श की कही "baat" पर ध्यान दीजिये

आप वास्तव में अच्छा लिखते है बस थोडा गजल का व्याकरण जान लीजिये फिर तो कमाल धमाल हो जायेगा

आनन्द वर्धन ओझा ने कहा…

जज्बातों को जरा बांध के चलिए हुज़ूर, फिर मज़े हैं शेरो-सुखन के !

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत उम्दा!! आनन्द आ गया!!

Dinesh Rohilla ने कहा…

बहुत खूब ! अति सुंदर रचना !

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