मंगलवार, दिसंबर 01, 2009

इन आंखों की मस्ती के...









जिनकी ये ख़ूबसूरत आँखें हैं, उन्हें आप सब बहुत बेहतरी से जानते हैं। अब जानना ये है कि क्या आप इन खूबसूरत आंखों की मलिका-ऐ-हुस्न का नाम बता पाते हैं या नही..?

शनिवार, नवंबर 28, 2009

जो मिला उससे मुहब्बत ना हुई...

कुछ तबीयत ही मिली थी ऐसी चैन से जीने की सूरत ना हुई!
जिसको चाहा उसे अपना ना सके जो मिला उससे मुहब्बत ना हुई!!

जिससे जब तक मिले दिल ही से मिले दिल जो बदला तो फसाना बदला!
रस्में दुनिया की निभाने के लिए हमसे रिश्तों की तिज़ारत ना हुई!!

दूर से था वो कई चेहरों में पास से कोई भी वैसा ना लगा!
बेवफ़ाई भी उसी का था चलन फिर किसीसे भी शिकायत ना हुई!!

वक्त रूठा रहा बच्चे की तरह राह में कोई खिलौना ना मिला!
दोस्ती भी तो निभाई ना गई दुश्मनी में भी अदावत ना हुई!...

पहचानों तो जानें!...










हिंट : ये तस्वीर एक ख्यात फिल्म कलाकार की है!...








रविवार, नवंबर 15, 2009

बाप की कमाई...

मेरा एक दोस्त है, मेरे ही नाम का... सीधा-सादा... कोई तड़क भड़क नहीं... एकदम साधारण... अगर कोई व्यसन है तो वो है उसका सीधापन... वो उसे छोड़ ही नहीं पाता... कपडे भी एकदम साधारण ही पहनता है... अभी हाल ही में मेरे ही प्रयासों से उसने मोबाईल रखना शुरू किया है... दरअसल उसके पिताजी या उसके भैया मेरे ही नंबर पर काल करके उससे बात किया करते थे... चूंकि मैं हर वक़्त उसके साथ नहीं होता था इसलिए उससे उसके घर वालों को बात करा पाना संभव नहीं हो पाता था... हालाँकि उसका सम्बन्ध एक समृद्ध घर से है... लेकिन उसे इससे चिढ है कि वो अपनी समृद्धता जग ज़ाहिर करे... इसलिए एकदम साधारण ही रहता है... हम दोनों एक बात पर बिलकुल Similar हैं... और वो ये है कि हमारी सोच, हमारे विचार एकदम मेल खाते हैं... इसलिए इतने दिनों से साथ रहते हुए भी हम दोनों के बीच कभी वैचारिक टकराव नहीं हुआ... घर, परिवार, भविष्य, रिश्ते-नाते, दोस्ती, दुनिया, टीम इंडिया, भारत की अर्थव्यवस्था, डॉ. मनमोहन सिंह का दोबारा प्रधानमंत्री बनना, राहुल का युवा ब्रिगेड... ये ऐसे मुद्दे हैं जिस पर हम दोनों बेहद बहस करते हैं... ताज्जुब की बात तो ये है कि इन मुद्दों पर हम दोनों घंटों बातें करते रहते हैं और नतीजा जब आता है तो उस पर हम दोनों की जुबान एक ही शब्द कहती है... यानि निष्कर्ष पर दोनों के विचार एक जैसे होते हैं... एक दिन हम दोनों अपने-अपने घर और परिवार के सदस्यों की चर्चा कर रहे थे... उसे अक्सर अपने बड़े भाई से शिकायत रहती है कि वो आज भी अपने "पिता की कमाई" पर ही निर्भर हैं... पत्नी और दो बच्चे होने के बाद भी... और तो और... घर से अलग रहते हुए... उसके पिता जी उनके और उनके परिवार के खर्च के लिए हर महीने 12,000 रूपए देते हैं... ऐसा उसने मुझे बताया... उसने मुझे यह भी बताया की भाभी को ये सब कतई पसंद नहीं है... उसकी भाभी उसके भैया को हमेशा कहती हैं अब पिता की ज़िम्मेदारी पूरी हो गई है... अब तो आप कमाना धमाना शुरू करो... अगर उनको कुछ दे नहीं सकते तो कम से कम लो तो मत... वो आपके पिता हैं... उनके बुढापे का कुछ तो ख्याल रखो... उसकी भाभी के ये ख्याल मुझे बेहद पसंद आए... इसी कारण मैं उनसे मिल भी आया हूँ... खैर! आगे सुनिए... मेरे हमनाम को अपने बड़े भैया की ये बात रास नहीं आती... वैसे उसका उसके बड़े भैया के प्रति ये रवैया उचित भी है... मैं उसकी जगह होता तो मैं भी शायद यही कहता... एक बात तो है... मेरे हमनाम का यह कहने मुझे तब आश्चर्य में डाल देता है जब मुझे ये पता चलता है कि वह अपना खर्च अपने पिताजी से नहीं लेता... और उसका मासिक खर्च मात्र... 200 रूपए है... माकन किराया और खाना छोड़कर... आप भी आश्चर्य में पड़ गए न... कि आज के समय में एक ज़वान लड़के का खर्च मात्र 200 रूपए महिना... वैसे ये सच है... मैं गवाह हूँ इसका... उसने अपने घर किसी से भी नहीं बताया है कि वो Part Time Job करता है... उसके पिता एक सहकारी बैंक के मैनेजर हैं... इसके बावजूद भी वह से घर से कोई आर्थिक सहयोग नहीं लेता... वैसे वो बताता है कि जॉब करने कि प्रेरणा उसे मुझसे मिली... क्या पाता सच कह रहा है या... हाँ! पर एक बात है कि मुझसे मिलने के कुछ समय तक वह किसी जॉब में नहीं था... मुझसे मिलने के बाद ही उसने एक प्राइवेट बैंक में काम करना शुरू किया... Well... उसके विचार मुझे बेहद अच्छे लगते है... हालाँकि उम्र में मुझसे एक साल छोटा है... लेकिन हम दोनों का एक दूसरे के प्रति व्यवहार दोस्ताना है... वो मुझे नाम लेकर पुकारता है और मैं भी उसे उसके नाम के आगे "जी" लगाकर संबोधित करता हूँ... एक दिन मैंने उससे कहा कि यार तू इतना साधारण सी ज़िन्दगी क्यों जीता है जबकि तेरा परिवार तो संपन्न है... तू कम से कम ज़रुरत की चीज़ें तो बढ़िया तरह से रख... कपडे ठीकठाक पहन... एक अच्छा सा मोबाइल लेले... जूते बढ़िया से लेले... इस पर उसने जो कहा उसे सुनकर मैं आज तक दंग हूँ... उसने मुझसे कहा... "यार... बाप के पैसों पर तो सब ऐश करते हैं... पर मेरी राय कुछ अलग है... मैं जब तक खुद अपने पैरों पर खडा नहीं हो जाता... ठाटबाट से नहीं रह सकता... क्योंकि ठाटबाट से रहने के लिए पैसे चाहिए... और ये सब मैं अपने पिता के पैसों से नहीं कर सकता... उनके पैसे इस तरह खर्च करना मुझे गंवारा नहीं..." वाह! दोस्त क्या बात कही थी तुमने... आपको सुनकर ताज्जुब होगा कि महज़ 21 साल की उम्र में उसने मुझसे वो बात कह दी... जो शायद एक बुजर्ग या अनुभवी व्यक्ति मुझे समझा पाता... आपको पाता है उसकी इस बात से मैं भी प्रेरित हुआ और मैंने अब हर महीने मुझे मिलने वाली रक़म से 2000 रूपए महीने बचाने शुरू कर दी हैं... जब भी घर जाता हूँ... कुल बचाई हुए रक़म मम्मी के हाथ में देकर पैर पड़ता हूँ... उस वक़्त मम्मी की आँखों में आंसू आ जाते हैं... लेकिन पैसों को देखकर नहीं मुझे देखकर... वो देखती हैं जिस बच्चे को हमने गोद में खिलाया है... आज वही इतना बड़ा हो गया है... वो ये भी कहती हैं कि "किशन! तू बड़ा सयाना हो गया है..."

गुलमुहर है ज़िन्दगी...

आप कहते हैं सरापा गुलमुहर है ज़िन्दगी
हम ग़रीबों की नज़र में इक क़हर है ज़िन्दगी
भुखमरी की धूप में कुम्हला गई अस्मत की बेल
मौत के लम्हात से भी तल्ख़तर है ज़िन्दगी
डाल पर मज़हब की पैहम खिल रहे दंगों के फूल
ख़्वाब के साये में फिर भी बेख़बर है ज़िन्दगी
रोशनी की लाश से अब तक जिना करते रहे
ये वहम पाले हुए शम्सो-क़मर है ज़िन्दगी
दफ़्न होता है जहां आकर नई पीढ़ी का प्यार
शहर की गलियों का वो गन्दा असर है ज़िन्दगी।

रविवार, नवंबर 08, 2009

यादें...

बात आज से लगभग पंद्रह साल पुरानी है। तब मैं महज़ आठ साल का था। उस वक़्त मैं अपने होम टाऊन (डिंडोरी) में अपने पिताजी के साथ रहता था। पिताजी के साथ था इसलिए सुबह जल्दी उठ जाता था या यूँ कही कि उठना पड़ना था। एक दिन तडके हमारा दूध वाला दूध देने आया। उस दिन उसका बिल भी पेड करना था। इसलिए उसने पिताजी को आवाज़ लगाई- महाराज, ओ! महाराज (हमारे यहाँ ब्राह्मणों को महाराज बुलाते हैं, और महाराज बुलाने की दूसरी वज़ह यह भी है कि मेरे दादा जी अपने समय के ज़मींदार थे।) पिता जी स्नान के लिए नर्मदा जी गए हुए थे इसलिए दूध वाले से मैं ही रु-ब-रु हुआ। उसने मुझसे पूछा "छोट महाराज, तुम्हार बाप कहाँ हैं?" (ये हमारे गाँव की बोली है) मुझे ये बात कुछ ठीक नहीं लगी इसलिए मैंने उससे कहा- क्या हुआ? इस बार तो उसने हद कर दी और कहा -डुक्कर को बुलाओ, आज हिसाब करना है। इतना सुनते ही मैं गुस्से से आगबबूला हो गया। मुझे कुछ न सूझा सो मैंने वहीँ पर रखा हुआ दूध का डिब्बा उठाया और उसके सिर पर जोर से दे मारा। पलभर में उसका सिर खून से लाल हो गया। वो तुरंत ही सबकुछ छोड़कर वहां से भागा। कुछ देर बाद पिताजी आए। मैंने उनसे कुछ नहीं बताया। जब उन्होंने मुझसे चाय बनाने को कहा तो मैंने ज़वाब दिया कि काली चाय बनाऊं? पिताजी ने कहा -क्यों, दूध नहीं आया क्या? मैंने कहा- नहीं! ऐसी बात नहीं है, दूध वाला आया था लेकिन...
इतना कहना हुआ ही था, सामने से दूध वाला सर पर पट्टी बांधे चला आ रहा था. मुझे देखकर थोडा ठिठका लेकिन पिताजी के बैठे होने से उसकी हिम्मत बनी रही. पिताजी ने उसकी चोट का कारण पूछा तो उसने झूठ कह दिया कि भैंस ने लात मार दी. इसके बाद मैंने भी कुछ नहीं कहा. उसने दूध का हिसाब किया और अपने इलाज के लिए पिताजी कुछ अतिरिक्त रूपए लिए, फिर वहा से चला गया. तकरीबन नौ साल तक ये बात पिताजी से छिपी रही. न मैंने बताया और न ही उस दूध वाले ने. वो आज भी हमारे यहाँ दूध पहुंचाता है. नौ साल बाद उसकी चोट देखकर अचानक पिताजी ने वो वाकया पूछ लिया. इत्तेफाक देखिए कि उस वक़्त भी मैं वहीँ था. इस बार उससे पहले मैंने ही अपनी जुबान खोल दी और सब सच-सच बता दिया. पहले पिताजी काफी नाराज़ हुए, खूब फटकारा उन्होंने, फिर उन्होंने मेरी उस नादानी के लिए दूध वाले से माफ़ी मांगी. जब दूध वाला चला गया तो उन्होंने मुझसे कहा कि "बेटा! ऐसा करना ठीक नहीं, अब मेरी इतना उम्र ही इतनी हो गई है तो कोई भी मुझे बूढा या सयाना कहेगा." इसके बाद मैंने कभी पिताजी से उस मुद्दे पर बात नहीं की. अब सोचता हूँ कि अगर सही मायनों में देखा जाए तो मेरा बचपना मेरी आज की अवस्था से काफी बेहतर था. आज मैं अपने पिताजी से, अपनी माँ से, अपने परिवार से कोसों दूर हूँ... मैं चाह कर भी उनके साथ हरपल नहीं गुजार सकता...

तुम याद आए...

जब दिन निकला
तुम याद आए
जब सांझ ढली
तुम याद आए
जब चलूँ अकेले
तन्हा मैं
सुनसान सड़क के
बीचों बीच
धड़कन भी जोरों
से भागे
लगता मुझको
कि यहीं कहीं
अब भी तुम हो
मेरे आसपास
जब कोयल
मेरे कानों में
एक मधुर सी तान
सुना जाए
लगता मुझको ऐसा जैसे
तुम याद आए
तुम याद आए

ज़िन्दगी अब एक अधूरी प्यास बनकर रह गई

ज़िन्दगी अब एक अधूरी प्यास बनकर रह गई
हो सकी जो न वो मेरी आस बनकर रह गई
कुछ दिनों तक ये थी मेरी बंदगी
अब महज़ एक अनकही एहसास बनकर रह गई
जुस्तजूं थी ये मेरी उम्मीद थी
गुनगुनाता था जिसे वो गीत थी
अब तमन्नाओं के फूल भी मुरझा गए
नाउम्मीदी की झलक विश्वास बनकर रह गई
सोचता हूँ तोड़ दूँ रश्में ज़माने ख़ास के
ज़िन्दगी भी लेकिन इनकी दास बनकर रह गई
एक अज़नबी मिला था मुझको
राह-ऐ-महफ़िल में कहीं
ज़िन्दगी भर साथ रहने का सबब वो दे गया
एक दिन ऐसे ही उसने मुझसे नाता तोड़कर
संग किसी अनजान के वो हँसते-हँसते हो गया
अब फ़क़त इस टूटे दिल में याद उसकी रह गई
ज़िन्दगी अब एक अधूरी प्यास बनकर रह गई

मंगलवार, नवंबर 03, 2009

इस जहाँ में मेरे सिवा पागल कई और भी हैं...

इस जहाँ में मेरे सिवा पागल कई और भी हैं
खामोशियाँ हैं कहीं तो कहीं कहीं शोर भी हैं
मनचला या आवारा बन जाऊँ ये सोचता हूँ
लेकिन मेरे इस दिल में किसी और का ज़ोर भी है
तन्हाइयों से टूटना शायद मैंने सीखा ही नहीं
इसीलिए शायद मेरा ये दिल कठोर भी है
हर रोज़ उसी चिलमन का आड़ है नज़रों पर
वही मेरी दुल्हन है और वही मेरी चितचोर भी है
आ गले लगा लूं तुझे सभी ग़मों को भुलाकर
मैं जितना पागल हूँ मेरा दिल उतना कमज़ोर भी है
अहसास तेरी चाहत का मेरी धड़कनों में अब भी है
मगर तू क्यों समझेगी इसे तू तो मग़रूर भी है!

शनिवार, अक्टूबर 31, 2009

मुझे कुछ और कहना था...


वो सुनता तो मैं कुछ कहता, मुझे कुछ और कहना था।
वो पल को जो रुक जाता, मुझे कुछ और कहना था।


कहाँ उसने सुनी मेरी, सुनी भी अनसुनी कर दी।
उसे मालूम था इतना, मुझे कुछ और कहना था।


रवां था प्यार नस-नस में, बहुत क़ुर्बत थी आपस में।
उसे कुछ और सुनना था, मुझे कुछ और कहना था।


ग़लतफ़हमी ने बातों को बढ़ा डाला यूँही वरना
कहा कुछ था, वो कुछ समझा, मुझे कुछ और कहना था।
मुझे कुछ और कहना था...

गुरुवार, अक्टूबर 22, 2009

बोले तो! एकदम झक्कास...!

बहुत दिनों से सोच रहा था कि क्या लिखूं? कुछ सूझ ही नहीं रहा था. अभी कुछ दिन पहले ही मैंने रेडियो पर एफएम सुनना शुरू किया. जबसे सुन रहा हूँ तबसे दिन भर मज़े के साथ बस सुनता ही रहता हूँ. कभी रेड एफएम पर "बड़बोले चाचा" की "चाचा बतोले" सुनाई देता है तो कभी धमाल पर दे दना दन गाने. कभी रेडियो मिर्ची पर "बड्डा भैया" के साथ होता हूँ तो कभी माई एफएम पर बढ़िया संगीत का तड़का लगाता हूँ. वैसे एफएम's के मामले में मैंने कोई दायरा नहीं बनाया है कि कौन सा एफएम चैनल मेरा सबसे प्रिय चैनल है या किसे सर्वाधिक सुनता हूँ लेकिन फिर भी इससे हटकर मैंने रेड एफएम को चुना है. रेड एफएम मेरी पहली पसंद है. वो इसलिए क्योंकि जब यह पहले पहल हमारे शहर में एस एफएम के नाम से आया था तब इसके लिए आरजे's की व्यवस्था की जा रही थी यानि Interview चल रहा था और इस एक शुरूआती दौर का मैं भी हिस्सा बना था यानि मैंने भी Interview दिया था. इसलिए यह तो मेरा Favorite रहेगा ही. दूसरे इसे मैं इसलिए भी पसंद करता हूँ क्योकि इसमें मेरे बड़े भाई (जैसे) भी हैं. हालाँकि एफएम सुनते मुझे अभी ज्यादा वक़्त नहीं हुआ है लेकिन सुनने में ऐसा लगता है कि जैसे मेरा इनसे बहुत पुराना नाता है. हालाँकि ऐसा नहीं है कि मनोरंजन की गाड़ियों को लगातार खींचते रहने वाले इन एफएम's को सुनने के केवल फायदे ही हैं. इनके नुकसान भी बराबर हैं. मैं भी एक श्रोता हूँ और श्रोता होने के नाते मैंने इसकी समीक्षा की है. उस समीक्षा में ये सामने आया है कि इनमे पेश किये जाने वाले कई प्रोग्राम's कहीं न कहीं आम जन को कु-प्रभावित करती हैं. मेरे सर्वाधिक प्रिय एफएम के एक प्रोग्राम का ज़िक्र करना चाहूँगा. इसमें रात के वक़्त एक शो आता है जिसका सम्बन्ध लोगों के "सीक्रेट" से है. इस शो में लोगों के सीक्रेट's शहरवासियों के सामने उजागर किये जाते हैं और इस शो को होस्ट करने वाली आरजे मोहतरमा अपनी आकर्षक अंदाज़ में चुटकियाँ लेते हुए उस सीक्रेट को ठीक उसी अंदाज़ में पेश करती हैं जैसे कि वह है. हालाँकि मैं उन मोहतरमा की इस अदा का इस्तकबाल करता हूँ. यह एक बेहतर आरजे का परिचय भी है. लेकिन जिस चैनल को मैं सुनता हूँ उसके और भी बहुत से श्रोता होंगे. अन्य श्रोताओं ने भी यह चीज़ महसूस कि होगी जिसे मैं अपने ब्लॉग पर लिख रहा हूँ. ये शो या इस तरह के तमाम ऐसे शो'z हैं जिससे आम लोगों के बीच फूहड़ता भरा सन्देश जाता है. हालाँकि हर दिन ऐसा सन्देश नहीं जाता लेकिन कई प्रस्तुतियां ऐसी भी होती हैं जिन्हें सुनने के बाद हंसी कम क्रोध अधिक आता है. अब हंसने वाले सीक्रेट's पर क्रोध क्यों आता है ये बताना तो मुस्किल है लेकिन आता है. हालाँकि शो के दौरान ये ऐलान ज़रूर किया जाता है कि "इन तमाम फूहड़ताओं का उद्देश्य महज़ मनोरंजन के अतिरिक्त और कुछ नहीं है. लेकिन आप ही बताइए कि सिगरेट के पैकेट में "Its Injirious to Health" लिख देने से क्या सिगरेट का कु-प्रभाव कम हो जाता है. नहीं न? ठीक इसी तरह इन प्रोग्राम्स के सम्बन्ध में भी सम्पुट नहीं बैठता. अगर ऐसा कुछ होता है तो मैं भी लिख देता हूँ कि "मेरे इस लेख से अगर किसी व्यक्ती या एक समूह को ज़रा भी कष्ट हुआ हो तो मैं अपने दोनों हाथ जोड़कर माफ़ी चाहता हूँ."

दिल की बात...

मैंने ज़माने के एक बीते दौर को देखा है,
दिल के सुकून और गलियों के शोर को देखा है,

मैं जानता हूँ की कैसे बदल जाते हैं इंसान अक्सर,
मैंने कई बार अपने अंदर किसी और को देखा है!!!

बुधवार, अक्टूबर 14, 2009

गिरीश जी का आभार...

आज से कुछ महीने पहले तक में अपने ब्लॉग पर एकदम निष्क्रिय सा हो गया था. ये कहा जा सकता है कि मैने ब्लॉगिंग लगभग बंद ही कर दी थी. एक दिन अचानक गिरीश जी (गिरीश बिल्लोरे 'मुकुल') मेरे दफ़्तर आए. उन्होने मुझसे मुलाक़ात की और मेरे ब्लॉग पर निष्क्रियता का कारण पूछा! मैने कहा कि दफ़्तर के काम व्यस्तताओं के कारण में ब्लॉग परा समय नही दे पा रहा हूँ. इस पर उन्होने मुझे ब्लॉग और ब्लॉगिंग का महत्‍व बताते हुए कहा कि मैं हर दिन भले एक पोस्ट ही करूँ, पर लगातार ब्लॉग पर बना रहूं. साथ ही मुझे उन्होंने मुझे आने वेल समय मे ब्लॉग के महत्‍व से भी अवगत कराया. उन्होने ही मुझे लगातार ब्लॉग पर बने रहने के लिए प्रेरित किया था. तब से मैं लगातार अपने ब्लॉग पर सक्रिय हूँ. मैं सदा उनका आभारी रहूँगा कि उन्होने मुझे इस बात के लिए प्रेरित किया और हमेशा ही कुछ न कुछ सिखाते रहते हैं. धन्यवाद गिरीश जी!

रविवार, अक्टूबर 11, 2009

चार दिन की ज़िन्दगी...

ये माना ज़िन्दगी है चार दिन की
बहुत होते हैं यारों चार दिन भी

खुदा को पा गया वाईज़, मगर है
जरुरत आदमी को आदमी की

मिला हूं मुस्कुरा कर उस से हर बार
मगर आंखों में भी थी कुछ नमी सी

मोहब्बत में कहें क्या हाल दिल का
खुशी ही काम आती है ना गम ही

भरी महफ़िल में हर इक से बचा कर
तेरी आंखों ने मुझसे बात कर ली

रकीब-ए-गमजदा अब सब्र कर ले
कभी उस से मेरी भी दोस्ती थी



बुधवार, अक्टूबर 07, 2009

न अब हौसला है न अब रस्ते हैं

रुखसत होकर बैठे हैं ऐसे
के खुशियाँ मिली हों ज़माने की जैसे,
नुमाइश भी कोई नहीं करने वाला
सूरत भी नहीं मेरी दीवाने के जैसे,
मैं चुपचाप सहमा हूँ बैठा कहीं पे
कोई भी नहीं है मुझे सुनने वाला,
सभी पूछते हैं हुआ क्या है तुझको
तेरी शक्ल क्यों है रुलाने के जैसे,
जब निकला था घर से बहुत हौसला था
के पा लूँगा मंजिल डगर चलते-चलते,
न अब हौसला है न अब रस्ते हैं
सफर भी लगे अब फसाने के जैसे!

सोमवार, अक्टूबर 05, 2009

ज़हन में कौंधती एक सोच...

कहते हैं कि दुनिया में इंसानों को कभी भी मन माफ़िक चीज़ें नहीं मिलतीं क्योंकि इंसान एक सामाजिक प्राणी है. सामाजिक प्राणी होने का इंसानों के लिए यह दायरा बहुत सोच समझकर बनाया गया है. अगर इंसानों को उनकी मांग के हिसाब से चीज़ें मिलने लगें तो यह दायरा सिमटने लगता है और शायद यह सही नहीं है इसलिए ऐसा नहीं होता कि इंसान अपनी मन मांगी चीज़ पा ले. इंसान ही एक ऐसा प्राणी है जो सोच सकता है और उस सोच को सच में बदलने के लिए प्रयास कर सकता है. इसलिए उसके मन में कुछ या शायद बहुत सारी तमन्नाएं पनपती हैं. उन्ही इच्छाओं की पूर्ति के लिए उसे सारे अच्छे या बुरे या फिर या फिर दोनों काम करने पड़ते हैं. गणितीय अवधारणा के मुताबिक अच्छी सोच या तमन्ना अच्छे काम के और बुरी तमन्ना बुरे काम के समानुपाती होते हैं. इसी तरह अच्छी सोच और बुरे काम एक-दूसरे के व्युत्क्रमानुपाती होंगे. यही वज़ह है कि चोरी करने वाले को सज़ा और कहीं पर पड़ी मिली रक़म को उसके मालिक तक पहुँचने वाले को तारीफें या संभवतः इनाम मिलता है. हालाँकि अच्छी सोच के साथ काम करने में बुरी सोच के साथ किए गए काम की अपेक्षा ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है. लेकिन अच्छे काम के बाद के सुकून और बुरे काम के बाद के सुकून में भी भारी फर्क होता है. जैसे अच्छे काम के बाद हमारी नज़रें आसमान की ओर होती हैं जबकि बुरे काम के बाद हम शायद ही आँखें खोलना पसंद करेंगे..? जो हमेशा से ही नीम के स्वाद का आदी होता है उसे शक्कर की मिठास का पता तक नहीं होता. ठीक इसी तरह हमेशा गुड़ की खान में रहने वाला कड़वाहट पसंद नहीं करेगा. कहने का अर्थ स्पस्ट है कि अच्छाई और बुराई में ज़मीन और आसमान का फासला तो है, साथ ही ये दोनों एक-दूसरे के विरोधी भी हैं. मुझे नहीं पता कि मैं इनमे से किसके साथ जीवन बिता रहा हूँ लेकिन इतना ज़रूर जानता हूँ कि कोई भी काम खत्म करने के बाद मुझे बेहद आश्चर्यजनक और अद्वितीय सुकून मिलता है..!!!

किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी...

इन आँखों से दिन-रात बरसात होगी
अगर ज़िंदगी सर्फ़-ए-जज़्बात होगी

मुसाफ़िर हो तुम भी, मुसाफ़िर हैं हम भी
किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी

सदाओं को अल्फाज़ मिलने न पायें
न बादल घिरेंगे न बरसात होगी

चराग़ों को आँखों में महफूज़ रखना
बड़ी दूर तक रात ही रात होगी

अज़ल-ता-अब्द तक सफ़र ही सफ़र है
कहीं सुबह होगी कहीं रात होगी


रचनाकार: बशीर बद्र

देखा है ज़िन्दगी को...

देखा है ज़िन्दगी को कुछ इतना क़रीब से ।

चेहरे तमाम लगने लगे हैं अजीब से ।।


कहने को दिल की बात जिन्हें ढूंढ़ते थे हम,

महफ़िल में आ गए हैं वो अपने नसीब से ।


नीलाम हो रहा था किसी नाज़नीं का प्यार,

क़ीमत नहीं चुकाई गई एक ग़रीब से ।


तेरी वफ़ा की लाश पर ला मैं ही डाल दूँ,

रेशम का यह कफ़न जो मिला है रक़ीब से ।


रचनाकार: साहिर लुधियानवी

रविवार, अक्टूबर 04, 2009

मौत तू एक कविता है...

मौत तू एक कविता है...
मुझसे एक कविता का वादा है मिलेगी मुझे
डूबती नब्ज़ों में जब दर्द को नींद आने लगे
ज़र्द सा चेहरा लेकर जब चाँद उफ़क़ तक पहुंचे
दिन अभी पानी में हो, रात किनारे के क़रीब
न अँधेरा न उजाला हो, न अभी रात न दिन
ज़िस्म जब ख़त्म हो और रूह को जब सांस आये
मुझसे एक कविता का वादा है मिलेगी मुझे!!!

(इस कविता को हिन्दी फ़िल्म "आनंद" में डा. भास्कर बैनर्जी नामक चरित्र के
लिये लिखा गया था। इस चरित्र को फ़िल्म में अमिताभ बच्चन ने निभाया था)

शनिवार, अक्टूबर 03, 2009

कभी ख़ुद पे, कभी हालात पे रोना आया...

कभी ख़ुद पे, कभी हालात पे रोना आया ।

बात निकली तो हर एक बात पे रोना आया ॥


हम तो समझे थे कि हम भूल गए हैं उन को ।

क्या हुआ आज, यह किस बात पे रोना आया ?


किस लिए जीते हैं हम, किसके लिए जीते हैं ?

बारहा ऐसे सवालात पे रोना आया ॥


कौन रोता है किसी और की ख़ातिर, ऐ दोस्त !

सब को अपनी ही किसी बात पे रोना आया ॥


रचनाकार: साहिर लुधियानवी

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